केदारनाथ सैलाब में बहे थे सैकड़ों इंसान, हरिद्वार से इलाहाबाद तक गंगा में लाशें ही लाशें
दिल्ली। 15 जून 2013 में केदारनाथ में भारी बारिश शुरू हुई तो किसी को अंदाजा नहीं था कि यह एक भयावह त्रासदी का संकेत था। एक ऐसी त्रासदी जिसे इतिहास कभी भुला नहीं सकता। बारिश नहीं रूकी और 16 जून को रात होते-होते केदारनाथ के आसपास पहाड़ों में लैंडस्लाइड हुआ। रात 8.30 बजे के करीब पहाड़ों के ऊपर जमा पानी मलबे के साथ तेजी से केदारनाथ बस्ती के किनारों को छूता हुआ निकला जिसमें कई लोग बाल-बाल बच गए। अब केदारनाथ बस्ती चारों तरफ से तेज रफ्तार से बहती नदियों से घिर चुकी थी। सुबह होते-होते महाप्रलय आ गया।

केदारनाथ के ठीक ऊपर चोराबाड़ी ताल टूटा और चट्टानों को साथ लेकर केदारनाथ बस्ती के बीच से होकर गुजरा। रास्ते में जो भी आया, वो इस सैलाब की भेंट चढ़ गया। होटल, मकान, रेस्ट हाउस सब मिट्टी में मिल गए। बच गया सिर्फ केदारनाथ मंदिर जिसके पीछे एक बड़ा चट्टान आकर रुका और सैलाब को किनारे से गुजरने पर मजबूर कर दिया। इस प्रलय में कई लोग बह गए जिनकी लाशें एक सप्ताह बाद दूर इलाकों में निकलनी शुरू हो गईं।
मांडा की गंगा में कई शव बहते दिखे
त्रासदी के करीब एक सप्ताह बाद इलाहाबाद में मांडा की गंगा में एक साथ कई शव बहते दिखे तो लोगों ने इसकी जानकारी पुलिस-प्रशासन को दी। इनमें से छह शवों को निकाला गया जिनमें तीन पुरुष और तीन महिलाएं थीं। इससे पता चला था कि इस त्रासदी में न जाने कितने लोग बहे होंगे जिनकी आज तक गिनती नहीं हो पाई है। इसके बाद झूंसी के गंगा घाट पर पांच शव मिले। इसके बाद अलग-अलग इलाकों में गंगा से शवों से मिलने का सिलसिला जारी रहा।
हरिद्वार से इलाहाबाद तक मिले कई शव
केदारनाथ से बहकर ये सभी लाशें पूर्वांचल तक पहुंच गईं। हरिद्वार से इलाहाबाद तक कई शव मिले। अनूपशहर, बिजनौर, मुजफ्फरनगर समेत कई जगहों पर गंगा से लाशें निकाली गईं। इन सभी लाशों से डीएनए सैंपल लेकर इनका अंतिम संस्कार कर दिया गया। इन शवों में अधिकांश की शिनाख्त नहीं हो पाई।












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