"टीम तो है, लेकिन साथ नहीं"- कर्नाटक के IT प्रोफेशनल की पोस्ट ने छेड़ा ऑफिस वर्क कल्चर को लेकर नई बहस

Karnataka IT Professional viral post: कल्पना कीजिए-आप एक नई नौकरी में शामिल होते हैं, नए माहौल में उम्मीदें लेकर कदम रखते हैं, सोचते हैं कि धीरे-धीरे नए लोग मिलेंगे, दोस्त बनेंगे, काम के साथ थोड़ी बहुत गुफ्तगू होगी, और आप एक टीम का हिस्सा महसूस करेंगे। लेकिन हफ्तों बीत जाते हैं और कोई आपसे बात तक नहीं करता-सिर्फ इसलिए क्योंकि आप उस 'भाषाई घेरे' का हिस्सा नहीं हैं, जिसमें बाकी लोग सहज महसूस करते हैं।

ऐसा ही एक अनुभव हाल ही में कर्नाटक से ताल्लुक रखने वाले एक आईटी प्रोफेशनल ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म Reddit पर साझा किया है। इस भावनात्मक और बेहद निजी पोस्ट ने लोगों को झकझोर कर रख दिया है और वर्कप्लेस पर भाषाई और क्षेत्रीय भेदभाव को लेकर एक बड़ी, जरूरी और समयानुकूल बहस को जन्म दिया है।

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क्या है पूरा मामला?

महज कुछ ही दिनों में वायरल हुई इस पोस्ट ने उस 'इनविज़िबल वॉल' को उजागर किया है, जो देश के कॉर्पोरेट दफ्तरों में अकसर अनजाने में खड़ी हो जाती है-जहां भाषा, क्षेत्रीय पहचान और सामाजिक व्यवहार किसी को भीतर आने देता है, तो किसी को बाहरी ही बनाए रखता है। इस पोस्ट को पढ़ने के बाद सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया की बाढ़ सी आ गई-कई लोगों ने व्यक्तिगत अनुभव साझा किए, कुछ ने सहानुभूति जताई, तो कुछ ने यह सवाल उठाया कि क्या कार्यस्थलों में अब भी समावेशिता एक आदर्श मात्र है, या इसे सच में व्यवहार में लाया जा रहा है?

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इस प्रोफेशनल ने अपनी पोस्ट में लिखा, "मैं एक कन्नड़िगा हूँ और हाल ही में कंपनी बदली है। दो हफ्ते हो चुके हैं, लेकिन अब तक मैं ऑफिस में एक भी दोस्त नहीं बना पाया हूँ। मेरे बगल में बैठने वाले लोग भी तब तक 'हाय' नहीं कहते जब तक मैं खुद बात शुरू न करूं। उन्होंने आगे लिखा कि "मेरे अधिकतर सहयोगी उत्तर भारत से हैं। कभी-कभी मुझे लगता है कि शायद यही वजह है कि मैं इस नए माहौल में अलग-थलग महसूस कर रहा हूँ।" हालांकि उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि पिछली कंपनी में भी उत्तर भारतीय सहकर्मी थे, लेकिन वहां ऐसा अनुभव नहीं हुआ।

सोशल मीडिया की प्रतिक्रिया

यह पोस्ट सामने आते ही सोशल मीडिया पर भाषा, क्षेत्रीय पहचान और कार्यस्थल पर समावेशिता को लेकर गहन चर्चा शुरू हो गई। कई यूजर्स ने इस प्रोफेशनल के साथ सहानुभूति जताई, तो कुछ ने इसे सामान्य सामाजिक व्यवहार बताया।

एक यूजर ने लिखा, "मैं कर्नाटक से नहीं हूँ, लेकिन जब मैं बेंगलुरु शिफ्ट हुआ था, तब मुझे भी कन्नड़ सहयोगियों से यही अनुभव हुआ था। आपको शांति से रहकर ऑफिस से बाहर भी कनेक्शन बनाने होंगे।"

वहीं एक अन्य ने सकारात्मक रवैया अपनाने की सलाह दी और कहा, "अपना व्यवहार अच्छा रखें, जैसे आप हमेशा रहते हैं। आपके पिछले ऑफिस में भी अच्छे संबंध बने थे, जो समय के साथ बने थे। नए ऑफिस में भी ऐसा होगा, बस थोड़ा वक्त लगेगा।"

एक तीसरे यूजर ने बेहद दिल को छू जाने वाला अनुभव साझा किया, "जब लोग एक ही भाषा या स्थान से होते हैं, तो जल्दी घुल-मिल जाते हैं। मैं खुद कन्नड़िगा हूँ, लेकिन मेरी टीम में अधिकांश लोग आंध्र प्रदेश से हैं। ऑफिस में हर समय वो लोग तेलुगू में ही बात करते हैं। हर बार मैं ही बातचीत शुरू करता हूँ, चाय या ब्रेक के लिए पूछता हूँ। कभी-कभी खुद ही कह देता हूँ कि एसी की वजह से ठंड लग रही है और बाहर जा रहा हूँ, मुझे बताना जब ब्रेक पर जा रहे हो। लेकिन अब तक उन्होंने कभी मुझे साथ नहीं बुलाया। वे साथ आते हैं, साथ जाते हैं - बिना मुझे बताए। मैं आपकी भावना को अच्छे से समझ सकता हूँ।"

एक चौथे यूजर ने ऑफिस फ्रेंडशिप को लेकर एक अलग दृष्टिकोण रखा और कहा, "आप वहाँ काम करने और पैसा कमाने के लिए हैं। दोस्त बाहर बनाइए। ज्यादातर ऑफिस फ्रेंडशिप बनावटी होती है और जैसे ही आप कंपनी छोड़ते हैं, सब खत्म हो जाता है।"

कार्यस्थल पर समावेशिता की चुनौती

इस पूरी बहस ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या भारत जैसे विविध भाषाई और सांस्कृतिक देश में कंपनियाँ अपने कर्मचारियों के लिए समावेशी वातावरण बनाने में विफल हो रही हैं? क्या कर्मचारियों को भाषा और क्षेत्रीयता के आधार पर अनजाने में बाहर किया जाता है?

भले ही इस Reddit पोस्ट ने व्यक्तिगत अनुभव को साझा किया हो, लेकिन इससे यह स्पष्ट होता है कि भारतीय कॉर्पोरेट संस्कृति में "इनक्लूजन" अब भी एक अधूरी प्रक्रिया है। ऐसे अनुभव हमें यह सोचने पर मजबूर करते हैं कि किसी कार्यस्थल पर सिर्फ कौशल और योग्यता ही नहीं, बल्कि सामाजिक अपनापन और परस्पर संवाद भी उतना ही महत्वपूर्ण है। क्या भारतीय ऑफिस कल्चर में अब वक्त आ गया है कि "विविधता में एकता" को सिर्फ पोस्टर तक सीमित न रखकर वास्तविकता में भी उतारा जाए?

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