Karnataka: शिवकुमार को राहत देने के पीछे कर्नाटक सरकार का क्या है मकसद? जानें मायने
कर्नाटक की सिद्धारमैया सरकार 74 करोड़ रुपये की आय से अधिक संपत्ति मामले में राज्य कांग्रेस प्रमुख और उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार को लगातार राहत देने के लिए जुगाड़ लगाने में लगी है। इसी का सबूत है कि पिछले हफ्ते एक कैबिनेट बैठक में कर्नाटक सरकार ने उस मंजूरी को वापस ले लिया था, जिसे पिछली बीजेपी के नेतृत्व वाली सरकार ने 25 सितंबर, 2019 को शिवकुमार के खिलाफ जांच सीबीआई को दी थी।
कैबिनेट ने फैसला लिया कि मंजूरी 'कानून के अनुरूप नहीं'थी। क्योंकि शिवकुमार(2019 में सिर्फ एक विधायक) के खिलाफ जांच की अनुमति देने के लिए विधानसभा अध्यक्ष से मंजूरी नहीं ली गई थी। सरकार का यह कदम कर्नाटक हाई कोर्ट द्वारा अप्रैल में यह कहे जाने के बावजूद आया है कि सहमति एक कार्यकारी आदेश था, जिसने सीबीआई को जांच करने के लिए सामान्य सहमति दी थी। न कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत।

वहीं, मामले में अब 29 नवंबर (बुधवार) को कर्नाटक हाई कोर्ट शिवकुमार द्वारा अप्रैल में उस आदेश के खिलाफ दायर अपील पर सुनवाई करने वाला है। सरकार के फैसले से शिवकुमार को मामले में राहत मिलने की उम्मीद है, जिसमें जल्द ही आरोप पत्र दाखिल होने की संभावना है।
टाइमलाइन में समझें शिवकुमार के खिलाफ CBI की दलीलें?
- मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, अगस्त 2017 में, आयकर (आईटी) विभाग ने शिवकुमार से जुड़ी संपत्तियों की तलाशी ली। उस समय, वह गुजरात के 42 कांग्रेस विधायकों के साथ बेंगलुरु के पास एक रिसॉर्ट में थे। जिसे वरिष्ठ कांग्रेस नेता अहमद पटेल को पश्चिमी राज्य से राज्यसभा चुनाव जीतने में मदद करने और विधायकों को लुभाने के बीजेपी के कथित प्रयासों को विफल करने के प्रयास के रूप में देखा गया था।
- आईटी विभाग ने शिवकुमार के सहयोगियों से जुड़ी दिल्ली की 4 संपत्तियों पर कथित तौर पर 8.59 करोड़ रुपये नकद मिलने के बाद 2018 में उनके खिलाफ टैक्स चोरी और झूठे सबूत की शिकायत दर्ज की थी। निष्कर्षों के बाद प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने कांग्रेस नेता के खिलाफ मनी लॉन्ड्रिंग का मामला दर्ज किया।
- सितंबर 2019 में ईडी ने शिवकुमार को गिरफ्तार कर लिया और अक्टूबर महीने में उन्हें जमानत पर रिहा कर दिया गया। ईडी ने सितंबर में कर्नाटक की बीजेपी सरकार को पत्र लिखकर कहा था कि उन्हें मनी लॉन्ड्रिंग जांच के दौरान सामने आए भ्रष्टाचार के शक की सीबीआई जांच का आदेश देना चाहिए। इसके बाद सरकार ने सीबीआई को सहमति दे दी।
- अक्टूबर 2020 में आईटी विभाग के निष्कर्षों के आधार पर सीबीआई ने शिवकुमार के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप में एफआईआर दर्ज की। सीबीआई ने आरोप लगाया है कि शिवकुमार ने कांग्रेस के नेतृत्व वाली कर्नाटक सरकार में ऊर्जा मंत्री रहते हुए अप्रैल 2013 और अप्रैल 2018 के बीच आय के ज्ञात स्रोतों से अधिक 74.93 करोड़ रुपये जमा किए हैं।
सीबीआई जांच की क्या स्थिति है?
सीबीआई ने दो महीने पहले कर्नाटक हाई कोर्ट को बताया था कि वह जांच के अंतिम चरण में है। कोर्ट ने 19 अक्टूबर को एजेंसी को तीन महीने के अंदर जांच पूरी करने का निर्देश दिया। शिवकुमार ने पहले मामले को रद्द करने की याचिका के साथ हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।
20 अप्रैल को एकल-न्यायाधीश पीठ ने बीजेपी सरकार की सीबीआई को मंजूरी के खिलाफ शिवकुमार की याचिका खारिज कर दी। हाई कोर्ट में दी गई दलीलों में, सीबीआई ने कहा कि उसकी जांच को सुविधाजनक बनाने का आदेश केवल एक सामान्य सहमति आदेश था और कोई औपचारिक मंजूरी नहीं थी, जिसके लिए स्पीकर की मंजूरी की आवश्यकता होगी।
शिवकुमार के लिए इसका क्या मकसद?
भविष्य में कर्नाटक का मुख्यमंत्री बनने की किसी भी संभावना के लिए शिवकुमार को भ्रष्टाचार के आरोपों से मुक्त होने की जरूरत है। शिवकुमार को उम्मीद है कि उन्हें 2025 में सीएम बनाया जाएगा, जब कांग्रेस सरकार अपने पांच साल के कार्यकाल का आधा समय पूरा कर लेगी।
कांग्रेस, कैबिनेट के फैसले के बचाव में एकजुट हो गई है। शिवकुमार, जो शीर्ष पद की दौड़ में सिद्धारमैया से हार गए, और समझौते के तहत पार्टी ने उन्हें एकमात्र डिप्टी सीएम नियुक्त किया, आने वाले दिनों में राज्य के वरिष्ठ नेताओं के लिए और अधिक अनुकूल बन सकते हैं।
शिवकुमार, जो ईडी मामले में जमानत पर रिहा होने के छह महीने बाद मार्च 2020 में राज्य कांग्रेस प्रमुख बने। अब उम्मीद की जा रही है कि वह कर्नाटक में 28 लोकसभा सीटों में से अधिकतम संख्या में जीत हासिल करने के लिए कांग्रेस के प्रयासों का पूरा समर्थन करेंगे।











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