कर्नाटक में कांग्रेस अब क्या करेगी, केंद्र के फैसले से मुफ्त चावल योजना पर ग्रहण?
कर्नाटक में कांग्रेस ने जो पांच गारंटियों का वादा कर रखा है, उनमें गरीबी रेखा के नीचे (बीपीएल) के परिवार के हर सदस्य को हर महीने 10 किलो मुफ्त चावल देने की (अन्न भाग्य) योजना भी शामिल है। लेकिन, केंद्र सरकार के एक फैसले से सिद्दारमैया सरकार की यह योजना मुश्किल में पड़ सकती है।
केंद्र सरकार ने कह दिया है कि फूड कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया (एफसीआई) के पास जो चावल और गेहूं का स्टॉक है, वह पूरे देश की जरूरतों को पूरा करने के साथ-साथ महंगाई पर काबू रखने के लिए है। इसलिए वह राज्यों को इस स्टॉक से अनाज खरीदने की अनुमति नहीं देगी।

कर्नाटक सरकार कहां से बांटेगी मुफ्त चावल ?
केंद्र सरकार के इस फैसले से कर्नाटक सरकार के पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई है। उसके सामने संकट ये है कि वह अपने चुनावी वादे के लिए अनाज का जुगाड़ कहां से करेगी। इसलिए उसने केंद्र सरकार पर फौरन ही उसकी मुफ्त चावल योजना को खटाई में डालने के लिए 'साजिश रचने' का आरोप लगा दिया है।
केंद्र सरकार 80 करोड़ लोगों को हर महीने देती है मुफ्त अनाज
गौरतलब है कि केंद्र की मोदी सरकार राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून के तहत देशभर के लगभग 80 करोड़ गरीबों को हर महीने 5 किलो अनाज मुफ्त मुहैया करवाती है। केंद्र के ताजा फैसले से कर्नाटक के अलावा तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल और तेलंगाना जैसे राज्यों की भी ऐसी योजनाएं प्रभावित हो सकती हैं। ये राज्य उन लोगों को मुफ्त अनाज उपलब्ध करवाते हैं, जो दावे के मुताबिक राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून के दायरे में नहीं आ पाते।
ऐलान से पहले सलाह क्यों नहीं लेते?
कर्नाटक के आरोपों के विपरीत केंद्र सरकार के अधिकारियों का कहना है कि राज्य सरकारें मुफ्त अनाज बांटने की घोषणा से पहले 'केंद्र सरकार से संपर्क नहीं करते हैं'। जबकि, केंद्र सरकार को यह देखना होता है कि सेंट्रल पूल के तहत जरूरतों के हिसाब से अनाजों का प्रबंध कैसे करना है।
ओपन मार्केट सेल स्कीम के तहत अनाज बिक्री बंद
एक अधिकारी ने कहा, 'कोई भी राज्य सलाह नहीं लेता या पूछता नहीं है कि आप इस योजना के लिए खाद्यान सप्लाई करेंगे या नहीं। राज्य अपने मन से ऐलान कर देते हैं और केंद्र सरकार अपने स्टॉक के आधार पर घोषणा करती है।' गौरतलब है कि खाद्य मंत्रालय ने मंगलवार को पूर्वोत्तर, पहाड़ी राज्यों और विशेष परिस्थिति का सामना करने वाले कुछ राज्यों को छोड़कर ओपन मार्केट सेल स्कीम के तहत गेहूं और चावल बेचना बंद कर दिया है।
यह फैसला अचानक नहीं लिया गया-खाद्य मंत्रालय
इस फैसले पर उठ रहे सवालों को लेकर खाद्य मंत्रालय के अतिरिक्त सचिव सुबोध कुमार सिंह ने कहा, 'यह फैसला अचानक नहीं लिया गया। यह जानबूझकर नहीं था। लंबे समय के अंतर-मंत्रालय चर्चाओं के बाद 13 जून को आदेश आया। इसलिए, यह किसी एक राज्य के लिए अचानक लिया गया फैसला नहीं था, यह पूरे देश के लिए था।'
हम पूरे देश में कीमतों पर नियंत्रण कैसे करंगे?- खाद्य मंत्रालय
उनके मुताबिक केंद्र सरकार को बाजार की आवश्यकताओं के अनुसार एफसीआई के स्टॉक की जरूरत पड़ती है। 'अगर तीन-चार राज्य ही अपनी योजनाओं के लिए ज्यादा अनाज की मांग करेंगे तो पूरा स्टॉक इन्हीं तीन-चार राज्यों को देना पड़ जाएगा। तब हम पूरे देश में कीमतों पर नियंत्रण कैसे करंगे? इससे समस्या पैदा हो जाएगी।'
चुनावी साल में केंद्र के लिए महंगाई होगी बड़ी चुनौती
गौरतलब है कि इस साल कई राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं। अगले साल लोकसभा चुनाव भी होगा। ऐसे में राजनीतिक रूप से भी केंद्र सरकार के लिए कीमतों को काबू में रखने की चुनौती होगी। ऊपर से मानसून के खराब लक्षण ने खरीफ सीजन के लिए भी चिंता बढ़ानी शुरू कर दी है।
एफसीआई चेयरमैन और एमडी अशोक कुमार मीणा के मुताबिक 'एनएफएसए के तहत बड़ी आबादी को मुफ्त अनाज के लिए बड़े स्टॉक की आवश्यकता है, सरकार को यह भी देखना है कि बाकी जनसंख्या को भी गेहूं और चावल सस्ती कीमतों पर उपलब्ध हो जाए।' सरकार पहली बार कीमतों पर नियंत्रण के लिए बाजार पर इतना ज्यादा नजर रख रही है। इसके लिए उसे पर्याप्त स्टॉक की आवश्यकता है।
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