Caste census: नींद से जागने की तैयारी में कांग्रेस सरकार, विवादों में फंसे सिद्दारमैया ले सकते हैं बड़ा फैसला

कर्नाटक सरकार जल्द ही जाति जनगणना को लेकर बहुत बड़ा कदम उटा सकती है। इस बात का संकेत सिद्दारमैया सरकार में गृहंमंत्री जी परमेश्वरा ने रविवार को दी है। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार ने बहुप्रतीक्षित सामाजिक-आर्थिक और शिक्षा सर्वेक्षण रिपोर्ट (जाति जनगणना) के को कैबिने में रखने का फैसला किया है। यहीं इस पर चर्चा होगी और तय किया जाएगा कि इसे विधानसभा में पेश किया जाए या सीधे सार्वजनिक कर दिया जाए।

29 फरवरी को मुख्यमंत्री सिद्धारमैया को कर्नाटक राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग की ओर से प्रस्तुत की गई इस रिपोर्ट की वोक्कालिगा और लिंगायत समुदायों ने आलोचना की है। उन्होंने इसे "अवैज्ञानिक" करार दिया है और नए सर्वेक्षण की मांग कर रहे हैं।

Siddaramaiah

जाति जनगणना को लेकर विवाद
रिपोर्ट प्रस्तुत किए जाने पर न केवल समाज के विभिन्न वर्गों से, बल्कि कांग्रेस पार्टी के भीतर से भी आपत्तियां आई हैं। ये समुदाय इसे खारिज करने के लिए दबाव बना रहे हैं। प्रभावशाली सामुदायिक नेताओं और अखिल भारतीय वीरशैव महासभा जैसे संगठन इसका जोरदार विरोध कर रहा है। जबकि, दलितों और ओबीसी जैसे समुदायाओं की ओर से इसे सार्वजनिक रूप से जारी करने की मांग की जा रही है।

परमेश्वरा ने बताया कि अगर रिपोर्ट को विधानसभा में पेश करना अनावश्यक है, तो इसे ऐसे ही जारी किया जा सकता है। अगर केंद्र सरकार की संभावित जाति जनगणना के साथ कोई ओवरलैप होता है, तो इसमें सुधार की भी संभावना है।

वरिष्ठ कांग्रेस नेता बीके हरिप्रसाद ने रिपोर्ट को सार्वजनिक रूप से जारी करने और लागू करने का आग्रह किया है, उन्होंने व्यापक विकास के लिए इसके महत्व का हवाला दिया है। उन्होंने तर्क दिया कि पार्टी को किसी भी सरकारी नतीजों का डर नहीं होना चाहिए। हरिप्रसाद ने जोर देकर कहा कि चूंकि जनगणना का वित्तपोषण सार्वजनिक धन से किया गया था और यह उनके घोषणापत्र का हिस्सा था, इसलिए इसे बिना किसी हिचकिचाहट के लागू किया जाना चाहिए।

हालांकि, उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार के भाई डीके सुरेश जैसे लोगों ने सतर्कता बरतने की सलाह दी है। इस बीच राज्य भाजपा अध्यक्ष बीवाई विजयेंद्र ने आरोप लगाया है कि जाति जनगणना विषय पर फिर से विचार करना सिद्धारमैया से जुड़े MUDA घोटाले जैसे अन्य राजनीतिक मुद्दों से ध्यान भटकाने वाला हो सकता है।

यह सर्वेक्षण 2015 में सिद्धारमैया सरकार द्वारा 170 करोड़ रुपये की अनुमानित लागत से शुरू करवाया गया था। लेकिन, इसके निष्कर्ष अभी तक सार्वजनिक नहीं किए गए हैं।

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