Kargil Diwas 2025: ‘मेरे लाल का लहू मां भारती के चरणों का महावर’– हिमाचल का लव कैसे बना कारगिल का शेरशाह?
Kargil Diwas 2025, Vikram Batra Story: 'लगता है कि वो आसपास कहीं हैं, अभी आकर मुझसे कहेगा, मां भूख लगी है, राजमा-चावल खिला दो ना... मुझे पहले ही लग गया था कि शायद अब वो नहीं है और फिर खबर आई कि वो देश की रक्षा के लिए शहीद हो गया, मेरे रहते ही मेरा बेटा चला गया लेकिन गर्व है कि मेरे लाल का लहू मां भारती के पैर का महावर बन गया', ये शब्द उस महान मां के हैं, जिनके बेटे का नाम विक्रम बत्रा था और पूरा भारत उन्हें 'कारगिल के शेरशाह' के नाम से पुकारता है।
तीन साल पहले दैनिक भास्कर से बात करते हुए विक्रम बत्रा की मां कमल कांत बत्रा ने अपने बेटे के बारे में कहा था कि 'उनके बेटे को खाने-पीने का बेहद शौक था, घर आता था तो आचार, चिप्स सब लेकर जाता था, चिकन को बहुत पसंद करता था। मैं तो उसे भगवान का प्रसाद मानती थी।'

कमला बत्रा को दो बेटियों के बाद जुड़वा बेटे हुए थे
आपको बता दें कि कमला कांत बत्रा को दो बेटियों के बाद जुड़वा बेटे हुए थे, जिनका नाम उन्होंने लव-कुश रखा रखा था, जो कि बड़े होकर विक्रम (लव ) और विशाल (कुश) कहलाए। कमलकांत को बेटे के खोने का दर्द जरूर था लेकिन उन्हें इस बात का गर्व भी था कि उनके बेटे की वजह से देश की करोड़ों माओं की गोद सुरक्षित है। साल 2024 में इस वीर की मां ने दुनिया से विदाई ली लेकिन ताउम्र वो अपने बेटे की वीरता की कहानी सुनाती रहीं लेकिन इस कहानी में एक जोश, ताकत और संतुष्टी थी, जो कि शायद एक शहीद की मां के अंदर ही हो सकती थी।
'परमवीर चक्र' से सम्मानित Vikram Batra
जोश-जुनून, दिलेरी और नेतृत्व क्षमता से 24 साल की उम्र में ही सबको अपना दीवाना बना देने वाले विक्रम बत्रा को 15 अगस्त 1999 को वीरता के सबसे बड़े पुरस्कार 'परमवीर चक्र' से सम्मानित किया गया था। उनका स्लोगन 'ये दिल मांगे मोर' आज भी देशभक्ति का प्रतीक है।
Vikram Batra का चयन सीडीएस में हुआ
9 सितंबर, 1974 को कांगड़ा जिले के पालमपुर से सटे बंदला में जीएल बत्रा और कमल कांत बत्रा के घर जन्मे विक्रम ने डीएवी कॉलेज चंडीगढ़ में विज्ञान विषय में स्नातक की पढ़ाई की थी और यहीं से सीडीएस की भी तैयारी शुरू कर दी थी, उन्हें उस वक्त हाई वेतन में मर्चेन्ट नेवी की जॉब मिल रही थी लेकिन देश से प्रेम करने वाले विक्रम बत्रा ने उस जॉब को ठुकरा दिया। साइंस में स्नातक करने के बाद विक्रम का चयन सीडीएस में हुआ।
1 जून 1999 को उनकी टुकड़ी को कारगिल युद्ध में भेजा गया
6 दिसंबर 1997 को कैप्टन विक्रम बत्रा भारतीय सेना की 13 जम्मू-कश्मीर राइफल्स में लेफ्टिनेंट के रूप में शामिल हुए। अपने साहस, तेज बुद्धि और नेतृत्व क्षमता के कारण उन्हें जल्दी ही प्रमोशन मिला। 1 जून 1999 को उनकी टुकड़ी को कारगिल युद्ध में भेजा गया , जहां उन्होंने हम्प और राकी पर जीत दर्ज की और इसी दौरान उन्हें 5,140 चोटी को पाकिस्तान से मुक्त कराने की जिम्मेदारी दी गई, उन्हें कैप्टन बनाया गया था और 20 जून 1999 को सुबह तीन बजकर 30 मिनट पर इस कैप्टन ने इस चोटी पर फतेह हासिल करके 'तिरंगा' लहरा दिया।
अपने संदेश में विक्रम बत्रा ने कहा था - 'ये दिल मांगे मोर'
इस चोटी को जीतने के बाद रेडियो के जरिए दिए अपने संदेश में विक्रम बत्रा ने कहा था - 'ये दिल मांगे मोर', इसके बाद उन्होंने चोटी 4,875 को भी कब्जे में लेने का अभियान शुरू किया, जिसमें वो सफल भी हुए लेकिन लेकिन 7 जुलाई 1999 को, जब वह घायल साथी अधिकारी को बचा रहे थे, तभी उन्हें गोली लगी और वे वीरगति को प्राप्त हुए।
'पता नहीं कब वापस आऊंगा, तुम मां-पापा का ख्याल रखना'
5,140 चोटी को जीतने के बाद उन्होंने अपने जुड़वा भाई विशाल को एक चिठ्ठी लिखी थी, जिसमें उन्होंने लिखा था- 'प्रिय कुशु, पाकिस्तानियों से लड़ रहा हूं, जिंदगी खतरे में है। यहां कुछ भी हो सकता है। गोलियां चल रही हैं। मेरी बटालियन के एक अफसर आज शहीद हो गए। नार्दन कमांड में सभी की छुट्टी कैंसिल हो गई है। पता नहीं कब वापस आऊंगा, तुम मां-पापा का ख्याल रखना।'
अडिग इच्छाशक्ति और अखंड राष्ट्रप्रेम
आपको बता दें कि कारगिल युद्ध में 500 से अधिक भारतीय जवान वीरगति को प्राप्त हुए और 1300 से अधिक घायल हुए थे। यह युद्ध न केवल सैन्य विजय था, बल्कि यह भारतीय सेना की अडिग इच्छाशक्ति और अखंड राष्ट्रप्रेम का परिचायक भी बना।
एक नजर Vikram Batra के सफर पर
- जन्म: 9 सितंबर 1974
- जन्मस्थान: घुग्गर गांव, पालमपुर, हिमाचल प्रदेश
- पिता: जी. एल. बत्रा (स्कूल प्रिंसिपल)
- माता: कमलकांता बत्रा (स्कूल शिक्षिका)
- प्रारंभिक शिक्षा पालमपुर में
- डी.ए.वी. कॉलेज, चंडीगढ़ से बी.एस.सी.
- बाद में सीडीएस परीक्षा पास कर IMA देहरादून से सेना में भर्ती
- मरणोपरांत उन्हें परमवीर चक्र, भारत का सर्वोच्च युद्धकालीन वीरता पुरस्कार दिया गया।
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