कपिल सिब्बल का विवादित बयान, सुप्रीम कोर्ट से कोई उम्मीद नहीं बची, ...ऐसी अदालत कभी स्वतंत्र नहीं हो सकती
कपिल सिब्बल ने कहा, सुप्रीम कोर्ट से कोई आशा बाकी नहीं। उन्होंने न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर टिप्पणी कर कहा, ऐसी अदालत स्वतंत्र नहीं हो सकती। kapil sibal supreme court no hope independence of judiciary
नई दिल्ली, 8 अगस्त : वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने सुप्रीम कोर्ट से पारित कुछ फैसलों पर नाराजगी जाहिर की है। सिब्बल ने कहा, अगर आपको लगता है कि आपको सुप्रीम कोर्ट से राहत मिलेगी, तो आप बहुत गलत हैं। मैं यह बात सुप्रीम कोर्ट में 50 साल वकालत पूरी करने के बाद कह रहा हूं। उन्होंने कहा कि देश की सबसे बड़ी अदालत से अब "कोई उम्मीद नहीं बची" है।
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ऐतिहासिक फैसले हुए, लेकिन जमीनी हकीकत अलग
बता दें कि सिब्बल वकील होने के अलावा राज्यसभा सांसद भी हैं। उन्होंने सोमवार को सुप्रीम कोर्ट के कुछ हालिया फैसलों पर नाराजगी व्यक्त की। उन्होंने कहा कि भले ही शीर्ष अदालत ने कोई ऐतिहासिक फैसला सुनाए हों, लेकिन इससे जमीनी हकीकत शायद ही कभी बदलेगी। बकौल सिब्बल, इस साल वे सुप्रीम कोर्ट में वकालत के 50 साल का पूरे कर लेंगे। 50 साल बाद उन्हें लगता है कि इस संस्थान से कोई उम्मीद नहीं है। सिब्बल ने कहा, आप सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए प्रगतिशील निर्णयों के बारे में बातें करते हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर जो होता है, उसमें बहुत बड़ा अंतर होता है। सिब्बल ने सवाल कियया, सुप्रीम कोर्ट ने निजता पर फैसला दिया और ईडी के अधिकारी आपके घर आ गए... आपकी निजता कहां है?"
याचिका खारिज करने पर आलोचना
सिब्बल ने शनिवार को दिल्ली में न्यायिक जवाबदेही और सुधार अभियान (सीजेएआर), पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (पीयूसीएल) और नेशनल अलायंस ऑफ पीपुल्स द्वारा "नागरिक स्वतंत्रता के न्यायिक रोलबैक" पर आयोजित एक पीपुल्स ट्रिब्यूनल में ये बातें कहीं। सिब्बल ने 2002 के गुजरात दंगों में प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी और कई अन्य लोगों को विशेष जांच दल (एसआईटी) द्वारा दी गई क्लीन चिट को चुनौती देने वाली कांग्रेस के पूर्व सांसद एहसान जाफरी की विधवा जकिया जाफरी द्वारा दायर याचिका को खारिज करने के लिए सुप्रीम कोर्ट की आलोचना की।
सिब्बल की दलीलें खारिज, SC में याचिका अस्वीकार
उन्होंने कहा कि धन शोधन निवारण अधिनियम के प्रावधानों को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी गई। इन प्रावधानों से प्रवर्तन निदेशालय को व्यापक अधिकार मिलते हैं। बकौल सिब्बल, 2009 में दायर छत्तीसगढ़ में नक्सल विरोधी अभियानों के दौरान सुरक्षा बलों की फायरिंग में 17 आदिवासियों की गैर-न्यायिक हत्याओं की कथित घटनाओं की स्वतंत्र जांच की मांग वाली याचिका को भी खारिज कर दिया। बता दें कि सुप्रीम कोर्ट में न्यायमूर्ति एएम खानविलकर की अध्यक्षता वाली पीठ ने ये सभी फैसले पारित किए थे। जस्टिस खानविलकर अब सेवानिवृत्त हो चुके हैं। बता दें कि सुप्रीम कोर्ट में सिब्बल जकिया जाफरी और पीएमएलए अधिनियम के प्रावधानों को चुनौती देने वाले याचिकाकर्ताओं की ओर से पैरवी करने के लिए अदालत में पेश हुए थे।
50 साल वकालत की, हम नहीं तो कौन बोलेगा ?
सिब्बल ने यह भी कहा कि "संवेदनशील मामले" केवल चुनिंदा न्यायाधीशों को सौंपे जाते हैं और कानूनी बिरादरी आमतौर पर पहले से जानती है कि फैसले का परिणाम क्या होगा। उन्होंने कहा, "... मैं ऐसी अदालत के बारे में बात नहीं करना चाहता जहां 50 साल वकालत की है लेकिन समय आ गया है। अगर हम इस बारे में नहीं बोलते हैं, तो कौन बोलेगा ?" उन्होंने कहा, वास्तविकता ऐसी है कि संवेदनशील मामले कुछ ही न्यायाधीशों की पीठ में सुने जाते हैं। ऐसे मामलों में हमें समस्या पता होती है और हम परिणाम भी जानते हैं।
चीफ जस्टिस तय करते हैं, ...ऐसी अदालत आजाद नहीं हो सकती
राज्य सभा सांसद सिब्बल ने न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा, "समझौता की प्रक्रिया के माध्यम से जिस कोर्ट में जज बिठाए जाते हों, एक अदालत जहां यह निर्धारित करने की कोई व्यवस्था नहीं है कि किस मामले की सुनवाई किस बेंच में की जाएगी। जहां भारत के मुख्य न्यायाधीश यह तय करते हैं कि किस मामले को किस पीठ में और कब सुना जाएगा, वह अदालत कभी भी स्वतंत्र नहीं हो सकती।"
भारत में माई-बाप संस्कृति, अब अधिकारों की लड़ाई का वक्त
वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल के अनुसार, अगर लोग अपनी मानसिकता नहीं बदलेंगे तो स्थिति नहीं बदलेगी। उन्होंने कहा, "भारत में हमारी माई-बाप संस्कृति है, लोग शक्तिशाली के चरणों में गिरते हैं। लेकिन समय आ गया है कि लोग बाहर आएं और अपने अधिकारों की सुरक्षा की मांग करें।" बकौल सिब्बल, "स्वतंत्रता तभी संभव है जब हम अपने अधिकारों के लिए खड़े हों और उस स्वतंत्रता की मांग करें।
पहले गिरफ्तारी में देर, फिर दो दिन में रिहाई !
उन्होंने शीर्ष अदालत में लंबित धर्म संसद मामले का भी उल्लेख करते हुए कहा कि अदालत ने मामले की सुनवाई की और सरकारों से जवाब मांगा। उन्होंने कहा कि आरोपियों को गिरफ्तार नहीं किया गया। अगर गिरफ्तार भी किया गया, तो उन्हें 1-2 दिनों में जमानत पर रिहा कर दिया गया। फिर दो सप्ताह के अंतराल के बाद धर्म संसद की बैठकें जारी रहीं।
2018 में 4 SC जजों ने की प्रेस कॉन्फ्रेंस
गौरतलब है कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता को लेकर सिब्बल पहले शख्स नहीं हैं, जिन्होंने मुखरता से आवाज उठाई है। इससे पहले इसी अदालत के चार न्यायाधीशों ने सार्वजनिक तौर पर प्रेस कॉन्फ्रेंस कर सिस्टम में बदलाव की जरूरत बताई थी। जनवरी 2018 की इस सनसनीखेज घटना में पूर्व CJI रंजन गोगोई, रिटायर्ड जस्टिस चेलमेश्वर, जस्टिस मदन बी लोकुर और जस्टिस कुरियन जोसेफ शामिल थे। इनमें तीन लोगों की रिटायरमेंट 2018 में ही हो गई, जबकि रंजन गोगोई नवंबर 2019 में बतौर CJI सेवानिवृत्त हुए। इन चार जजों ने गुजरात में सोहराबुद्दीन शेख एनकाउंटर केस की सुनवाई कर रहे स्पेशल सीबीआई कोर्ट के जज लोया की संदिग्ध मौत के मामले का जिक्र कर मामले की सुनवाई जस्टिस अरुण मिश्रा की पीठ में होने पर टिप्पणी की थी। जस्टिस चेलमेश्वर ने कहा था, कभी-कभी सुप्रीम कोर्ट का प्रशासन ठीक नहीं होता। पिछले कुछ महीनों में कई चीजें ऐसी हुई हैं जो नहीं होनी चाहिए। इस प्रेस वार्ता के अलावा सुप्रीम कोर्ट से रिटायरमेंट के बाद जस्टिस गोगोई का राज्य सभा सांसद बनना भी सुर्खियों में रहा था।
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