Kannada Kannadiga First : कर्नाटक के बिल से 'भाषा विवाद' की आशंका, नौकरियों में बड़े बदलाव की तैयारी !

कर्नाटक में विधानसभा चुनाव से कुछ महीनों पहले सीएम बसवराज बोम्मई की सरकार ने एक विधेयक प्रस्तावित किया है। बोम्मई सरकार के बिल को लेकर कन्नड़ समर्थक कार्यकर्ता आशंकित हैं। जानिए पूरा मामला Kannada Kannadigas First

बेंगलुरु, 21 सितंबर : कर्नाटक की बसवराज बोम्मई की सरकार ने विधेयक प्रस्तावित किया है। इस विधेयक को लेकर कन्नड़ समर्थक कार्यकर्ता आशंकित हैं। शिक्षा और संचार में भाषा को महत्व देने के अलावा, मसौदा विधेयक राज्य में काम करने वाले गैर-कन्नड़ लोगों को कन्नड़ बोलना और लिखना सिखाने पर जोर देता है। इस प्रस्ताव के चालू मानसून सत्र में पारित होने की उम्मीद है। इस पर विवाद गहराने की आशंका है। दरअसल, कन्नड़ भाषा को बढ़ावा देने के लिए, भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली कर्नाटक सरकार ने प्रस्ताव दिया है कि जो कंपनियां नौकरियों में कन्नड़ (डोमिसाइल या कर्नाटक निवासी कन्नड़ भाषा बोलने वाले) को पहली वरीयता नहीं देतीं, ऐसी कंपनियां छूट और प्रोत्साहन का पात्र नहीं होंगी।

क्या है विधेयक

क्या है विधेयक

दरअसल, बोम्मई सरकार ने कन्नड़ भाषा व्यापक विकास विधेयक (Kannada Language Comprehensive Development Bill) प्रस्तावित किया है। विधेयक के प्रस्ताव में कन्नड़ भाषा को बढ़ावा देने के लिए कुछ चौंकाने वाले प्रावधान किए गए हैं। कर्नाटक विधानसभा के मानसून सत्र में इस विधेयक को पेश और पारित कराए जाने की उम्मीद है।

बोम्मई सरकार में मंत्री ने की पुष्टि

बोम्मई सरकार में मंत्री ने की पुष्टि

Kannada Language Bill पर न्यूज18 डॉटकॉम की रिपोर्ट के मुताबिक कर्नाटक के एक वरिष्ठ मंत्री ने पुष्टि की, "प्रस्तावित विधेयक को आगामी कैबिनेट बैठक में पेश किए जाने की उम्मीद है और इसे पारित किया जाएगा।" गौरतलब है कि शिक्षा और संचार में भाषा को महत्व देने के अलावा, Kannada Language Bill का मसौदा राज्य में काम करने वाले गैर-कन्नड़ लोगों को कन्नड़ बोलना और लिखना सिखाने पर जोर देता है।

कन्नड़ या कन्नडिगा कौन है ?

कन्नड़ या कन्नडिगा कौन है ?

विधेयक पर हो रही चर्चा के बीच ये जानना भी दिलचस्प है कि कन्नड़ या कन्नडिगा कहलाने के योग्य कौन हैं ? प्रस्तावित विधेयक में, कन्नड़ या 'कन्नडिगा' (Kannadiga) को ऐसे व्यक्ति के रूप में परिभाषित किया गया है जो "कम से कम 15 वर्ष" के लिए एक अधिवासित नागरिक (domiciled citizen) है। यानी कर्नाटक में रहना और डोमिसाइल सर्टिफिकेट धारक होना। साथ ही ऐसे लोगों ने कक्षा 10 तक कन्नड़ को एक भाषा के रूप में पढ़ना, लिखना और बोलना सीखा हो। यह 38 साल पहले दिए गए सुझाव पर आधारित है। 1984 में सरोजिनी महिषी रिपोर्ट में कन्नड़ और कन्नडिगा की रक्षा के लिए 58 सिफारिशें की गई थीं।

नौकरियों में 100 फीसद तक आरक्षण !

नौकरियों में 100 फीसद तक आरक्षण !

महिषी रिपोर्ट में कर्नाटक में संचालित केंद्र सरकार और सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (पीएसयू) में ग्रुप 'सी' और ग्रुप 'डी' नौकरियों में सभी सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों में कन्नड़ भाषी लोगों के लिए नौकरियों में 100% आरक्षण की सिफारिश भी की है। सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों, निजी कंपनियों और बहुराष्ट्रीय कंपनियों में भी कुल नौकरियों का एक निश्चित प्रतिशत कन्नड़ लोगों को देने की सिफारिश की है।

कर्नाटक के इस बिल में क्या प्रस्ताव है?

कर्नाटक के इस बिल में क्या प्रस्ताव है?

बिल के महत्व, कन्नड़ लोगों को विशेष ध्यान देने की जरूरत क्यों है, और नियमों को लागू करना क्यों आवश्यक हो गया है ? इन सवालों पर कन्नड़ विकास प्राधिकरण (KDA) के अध्यक्ष टीएस नागभरण ने कहा, 'यह बिल पूरे राज्य में कन्नड़ के कार्यान्वयन को सुनिश्चित करने की अधिकारियों को ताकत देता है। पहले KDA के आदेशों का पालन नहीं करने वालों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई होती थी, लेकिन अब बिल में उल्लंघन होने पर दंड का प्रावधान किया गया है। इससे अधिक प्रभावी नियम बनेंगे।

Kannada Language Bill के ड्राफ्ट में कई बदलाव-

Kannada Language Bill के ड्राफ्ट में कई बदलाव-

बोम्मई सरकार ने कन्नड़ भाषा व्यापक विकास विधेयक (Kannada Language Comprehensive Development Bill) प्रस्तावित किया है। इसमें कई अहम बदलाव का प्रस्ताव है। एक नजर बिंदुवार--

  • विधेयक कन्नड़ को राज्य की आधिकारिक भाषा के रूप में उपयोग करने का प्रस्ताव करता है। राज्य विधानमंडल में प्रस्तुत किए जाने वाले सभी संचार और बिलों के अलावा कर्नाटक के राज्यपाल द्वारा प्रख्यापित सभी अध्यादेश, सरकार, विभागों, उद्योगों और सहकारी समितियों द्वारा जारी आदेश कन्नड़ में ही होने चाहिए।
  • Kannada Language Comprehensive Development Bill में कहा गया है, "यह अनिवार्य है कि सभी निचली अदालतों, राज्य न्यायाधिकरणों और अर्ध-न्यायिक निकायों को कन्नड़ भाषा में कार्यवाही संचालित करनी चाहिए। आदेश भी कन्नड़ भाषआ में जारी करना चाहिए। विधेयक में कानूनी कार्यवाही के दौरान अंग्रेजी के इस्तेमाल का प्रावधान भी किया गया है।
  • पूरे कर्नाटक में सभी नेमप्लेट कन्नड़ में होने चाहिए। साथ ही सरकार और उसके वित्त पोषित संगठनों के कार्यक्रम, ब्रोशर और बैनर भी राज्य की भाषा यानी कन्नड़ में प्रिंट होने चाहिए।
शिक्षा में कन्नड़ भाषा पर जोर

शिक्षा में कन्नड़ भाषा पर जोर

शिक्षा में भी कन्नड़ को प्रमुखता देने का प्रस्ताव है। Kannada Language Comprehensive Development Bill के मुताबिक ऐसे छात्र जिन्होंने कक्षा 10 (एसएसएलसी) तक कन्नड़ को एक विषय के रूप में नहीं लिया है, ऐसे सभी लोगों को तकनीकी और व्यावसायिक शिक्षा के छात्रों को 'कार्यात्मक कन्नड़' पढ़ाने पर जोर दिया जाना चाहिए। जिन छात्रों ने अपनी स्कूली शिक्षा के हिस्से के रूप में कन्नड़ नहीं सीखी है, उन्हें "कन्नड़ संस्कृति और लोकाचार" को समझने के लिए अतिरिक्त कक्षाएं दी जानी चाहिए।

कन्नड़ सिखाने के लिए वर्कशॉप

कन्नड़ सिखाने के लिए वर्कशॉप

बिल में प्रस्ताव है कि यदि सरकारी नौकरी के लिए आवेदन करने वाला व्यक्ति 10वीं कक्षा में कन्नड़ को पहली या दूसरी भाषा के रूप में नहीं लेता है, तो उसे राज्य लोक सेवा आयोग द्वारा आयोजित समकक्ष कन्नड़ परीक्षा देनी होगी। मसौदा विधेयक में सिफारिश की गई है कि 100 से अधिक कर्मचारियों वाले सभी राज्य और केंद्रीय प्रतिष्ठानों में गैर-कन्नड़ भाषियों को कन्नड़ सिखाने के लिए वर्कशॉप आयोजित किए जाएं।

मोहनदास पाई ने CM को आड़े हाथ लिया, पीएम को भी टैग किया- नीचे देखें ट्वीट--

विधेयक पर लोगों की प्रतिक्रियाएं--

इंफोसिस के पूर्व निदेशक और आरिन कैपिटल के अध्यक्ष मोहनदास पाई ने ट्विटर पर सीएम बोम्मई को टैग कर लिखा, ...भाषाई भेद के बिना सभी नागरिक टैक्स देते हैं। इन्सेंटिव और किसी को खुश करने के लिए दी जाने वाली कोई वस्तु (incentives and sops) इनसे ही मिलते हैं। ऐसा कहना बहुत गलत और भेदभावपूर्ण है। नियोक्ता नौकरी में भेदभाव नहीं करते ! मोहनदास पाई ने पीएम मोदी को टैग कर लिखा कि नागरिकों को प्रशिक्षित करने पर कृपया इस तरह पैसा खर्च नहीं करें। बता दें कि पाई बेंगलुरु में आम लोगों से जुड़े मुद्दों पर सक्रिय रूप से काम कर रहे हैं।

Kannada Language Bill भेदभाव नहीं करता

Kannada Language Bill भेदभाव नहीं करता

पाई के ट्वीट पर जवाब में, कन्नड़ विकास प्राधिकरण के अध्यक्ष टीएस नागभरण ने कहा कि यह कदम भेदभाव करने के लिए नहीं बल्कि भाषा उन्मुख नागरिकों की सुरक्षा के लिए उठाया गया है। उन्होंने कहा कि हर नागरिक टैक्स चुका रहा है, इसमें कोई शक नहीं है, लेकिन कर्नाटक में एक कन्नडिगा को क्या लाभ मिलता है जब वह अपने राज्य में कर चुकाता है ? बकौल टीएस नागभरण कन्नडिगाओं की ओर से दिए गए टैक्स के प्रतिशत की गणना करें। साथ ही उन के टैक्स भुगतान की भी गणना करें जो कर्नाटक में दूसरे राज्यों से आए हैं। क्या केवल वही लोग टैक्स देते हैं जो कन्नड़ नहीं हैं ? नागभरण ने कहा, Kannada Language Comprehensive Development Bill भेदभाव नहीं करता। यह भाषा और भाषा-उन्मुख नागरिकों की रक्षा करेगा। ऐसा न होने पर भाषाई आधार पर राज्यों का सीमांकन करने का उद्देश्य विफल हो जाएगा।

बेंगलुरु में 107 बोलियां, भाषा कैसे बचेगी ?

बेंगलुरु में 107 बोलियां, भाषा कैसे बचेगी ?

नागभरण ने कहा कि बेंगलुरु एक ऐसा शहर है जहां 107 बोलियां बोली जाती हैं। उन्होंने सवाल किया, जब भाषा में ही इतनी विविधता है तो हम भाषा की रक्षा कैसे करेंगे ? सिर्फ आईटी वाले ही टैक्स दे रहे हैं, ऐसी धारणा गलत है। एक छोटा किसान भी टैक्स देता है। क्या मूल रूप से कन्नड़ व्यक्ति और उसने जो टैक्स चुकाया, उसकी गिनती पैसे के रूप में नहीं होगी ?

क्या सरकार का बिल काम करेगा ?

क्या सरकार का बिल काम करेगा ?

Kannada Language Comprehensive Development Bill पर एक ओर जहां सरकारी क्षेत्र में कोटा की सिफारिशें की गई हैं। सरकारी नौकरियों में कोटा का पालन होता है। कन्नड़ लोगों को वरीयता मिलती है, लेकिन प्राइवेट नौकरियों में कंपनियों पर कन्नड़ लोगों को वरीयता नहीं देने के आरोप लगते हैं। कर्नाटक सरकार में उद्योग मंत्री मुरुगेश निरानी ने नियमों का उल्लंघन करने वाले उद्योगों के खिलाफ कार्रवाई की चेतावनी दी है। निरानी ने हाल ही में कहा, 2020-25 की औद्योगिक नीति में एक खंड के अनुसार, व्यक्तिगत इकाइयों (individual units) को ग्रुप डी की नौकरी में 100% नौकरियां देने का नियम है। ऐसी कुल नौकरियों का 70% कन्नडिगों को मिलना चाहिए। डॉ सरोजिनी महिषी की रिपोर्ट के अनुसार, राज्य में 85% नौकरियों में कन्नड़ लोगों की नियुक्ति होनी चाहिए। यदि उद्योग इस खंड का उल्लंघन करते हैं तो सरकार कार्रवाई करेंगी।

नियम ठीक नहीं तो अदालत में हार !

नियम ठीक नहीं तो अदालत में हार !

बोम्मई सरकार द्वारा प्रस्तावित विधेयक को लेकर कन्नड़ समर्थक कार्यकर्ता भी आशंकित हैं। उन्हें लगता है कि अगर बिल को 'ठीक तरीके से' (watertight) नहीं बनाया गया, तो कन्नड़ के कार्यान्वयन के खिलाफ कोई भी मामला अदालत में विफल हो सकता है। न्यूज18 की रिपोर्ट के अनुसार एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर अरुण जवागल ने सभी भाषाओं की समानता पर जोर दिया। जवागल कर्नाटक रक्षा वेदिके (Karnataka Rakshana Vedike-KRV) के संगठन सचिव भी हैं। उन्होंने कहा कि इस तरह के कई कदम उठाए गए हैं, लेकिन कार्यान्वयन असंतोषजनक है।

नेमप्लेट पर कन्नड़ का फैसला नहीं टिका

नेमप्लेट पर कन्नड़ का फैसला नहीं टिका

जवागल ने समझाया, अगर सरकार कन्नड़ को अनिवार्य बनाने की योजना बना रही है, तो उन्हें इसे सही तरीके से करना चाहिए। इसे कानूनी रूप से मजबूती से खड़ा होना चाहिए। उदाहरण के लिए, नेमप्लेट पर कन्नड़ का प्रयोग करने का नियम। इसे संभालने की जिम्मेदारी कर्नाटक श्रम विभाग को दी गई थी। एक दूरसंचार कंपनी ने इसके खिलाफ मामला दायर किया और सरकार अदालतों में मामला हार गई क्योंकि यह देखा गया कि उक्त नियम को लागू करने में श्रम विभाग की कोई भूमिका नहीं थी।

सरकार को नसीहत, राजनीति से दूर रहें

सरकार को नसीहत, राजनीति से दूर रहें

उन्होंने आगाह किया और कहा, हम कह रहे हैं कि सरकार को सावधानी से चलना चाहिए और यह सुनिश्चित करके प्रभावी कानून बनाना चाहिए जिसमें कोई खामियां न हों। अगर सही तरीके से किया जाए तो Kannada Language Comprehensive Development Bill बहुत मददगार होगा। सरकार को इसे राजनीतिक कदम नहीं बनाना चाहिए। सरकार को ऐसा नियम कर्नाटक के लोगों की समृद्धि के लिए बनाना चाहिए।

'कन्नड़' की परिभाषा और पूर्व CM एचडी कुमारस्वामी

'कन्नड़' की परिभाषा और पूर्व CM एचडी कुमारस्वामी

'कन्नडिगाओं' को फिर से परिभाषित करने का श्रेय कर्नाटक के पूर्व CM और जनता दल सेकुलर (JDS) नेता एचडी कुमारस्वामी के नेतृत्व वाली गठबंधन सरकार को जाता ह। 2019 में एचडी कुमारस्वामी 'कन्नडिगों' को फिर से परिभाषित करने के लिए एक मसौदा अधिसूचना का प्रस्ताव लाए थे। इसके तहत कन्नड़ को एक विषय के रूप में पढ़ना और कक्षा 10वीं पास की परीक्षा करने की जरूरत को पूरी तरह समाप्त कर दिया गया था। डोमिसाइल की अवधि भी कम कर दी गई थी। प्रयास इस बात का हुआ था कि अनिवार्य कोटे के तहत कन्नडिगा के रूप में नौकरी पर कौन दावा कर सकता है, इसका दायरा बढ़ाया जाए। लोगों से सुझाव मांगे गए, अधिसूचना सार्वजनिक की गई, लेकिन यह कदम अधर में ही लटका रहा, कुमारस्वामी कार्यकाल पूरा नहीं कर सके। कई कन्नड़ कार्यकर्ताओं और संगठनों ने इस कदम का विरोध किया। उन्हें लगा कि सरकार का प्रस्ताव न केवल सरोजिनी महिषी रिपोर्ट में की गई सिफारिशों को कमजोर करेगा, बल्कि 'मूल कन्नड़' के अवसरों को भी कम करेगा।

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