जयंत चौधरी: कैराना में जिनके सामने पस्त हुई योगी और उनके मंत्रियों की फौज
नई दिल्ली। उत्तर प्रदेश की कैराना लोकसभा सीट पर राष्ट्रीय लोकदल की तबस्सुम हसन ने भाजपा प्रत्याशी मृगांका सिंह को बड़े अंतर से हरा दिया है। इस चुनाव पर देशभर की निगाह थी, एक तरफ विपक्ष ने एकजुटता दिखाते हुए रालोद को समर्थन किया था तो हीं भाजपा ने भी चुनाव में जान झोंक रखी थी। रालोद के लिए जहां पार्टी के उपाध्यक्ष जयंत चौधरी ने प्रचार की कमान संभाली तो भाजपा की तरफ से कई केंद्रीय मंत्री, विधायक और सांसद क्षेत्र में डेरा डाले रहे। मुख्यमंत्री आदित्यनाथ ने भी दो रैलियां यहां की लेकिन सत्तापक्ष पर कोई भारी पड़ा तो वो हैं जयंत चौधरी।

विपक्ष की ओर से अकेला बड़ा चेहरा थे जयंत
कैराना में लोकदल की तबस्सुम हसन को भले ही कांग्रेस, सपा, कांग्रेस, आप, बसपा और पीस पार्टी का समर्थन हो लेकिन जमीन पर जयंत चौधरी ही चुनाव प्रचार संभाले हुए थे। किसी भी दूसरी पार्टी के नेता ने कोई रैली नहीं की लेकिन भाजपा के लिए मुख्यमंत्री आदित्यनाथ ने रैलियां कीं। भाजपा की केंद्र और राज्य में सरकार है, ऐसे में रालोद के लिए इलेक्शन आसान नहीं था। जयंत ने जमीन पर मेहनत की और जाट बाहुल्य गांवों में लगातार लोगों से मिले, जिसका असर ये हुआ कि वो लोगों का दिल जीतने में कामयाब रहे।

जाटों को रालोद की तरफ लाने में कामयाब रहे जयंत
2013 में मुजफ्फरनगर और शामली में जाटों और मुसलमानों के बीच दंगा के बाद जाट भाजपा के पाले में चले गए और मुसलमानों का रुख सपा की तरफ देखा गया। इसका नतीजा ये हुआ कि 2014 में रालोद का एक भी एमपी नहीं आया तो 2017 के विधानसभा में सिर्फ एक विधायक जीत सका। उपचुनाव में जयंत के सामने जाटों को रालोद के पाले में वापस लाने की चुनौती थी, जिसे रोकने के लिए भाजपा ने पूरी वेस्ट यूपी के जाट नेताओं को कैराना बुला रखा था। इसके बावजूद जयंत अपनी जाति के लोगों में विश्वास भरने में कामयाब रहे। रालोद ने गन्ना भुगतान, बिजली के बिल और दूसरे मुद्दों पर चुनाव लड़ा और जीता।

गांव-गांव जाकर लोगों से मिले
जयंत बिना किसी सुरक्षा और काफिले के चार-चार, पांच-पांच कार्यकर्ताओं को साथ लेकर लगातार गांव-गांव जाकर लोगों से मिलते रहे। जयंत ने ट्रैक्टर को कमर्शियल व्हीकल की श्रेणी में रखने पर सवाल किए, बिजली के बिल बढ़ने पर सवाल किए, इस सरकार के आने के बाद पशुओं की खरीद फरोख्त कम होने के चलते आवारा पशुओं के फसल को नुकसान पहुंचाने पर सवाल किए। ये सब मुद्दे भले दूर से छोटे लगें लेकिन क्षेत्र के लोगों ने इस सब पर वोट किया।

लंदन स्कूल ऑफ इकॉनोमिक्स से पढ़े हैं जयंत
जयंत चौधरी लंदन स्कूल ऑफ इकॉनोमिक्स से पढ़े हैं। भारत लौटने के बाद 2009 में उन्होंने चुनाव में कदम रखा और मथुरा से सांसद चुने गए। हालांकि 2014 में वो मथुरा से हार गए। वो भले ही लंदन में पढ़े हों लेकिन गांव में मतदाताओं के बीच वो एकदम देसी अंदाज में ही जाते हैं। उनका ट्रैक्टर पर प्रचार के लिए आना और सुरक्षा या ज्यादा तामझाम से दूर रहना लोगों को भाया और वो चुनाव में भाजपा पर भारी पड़े। कैराना की इस जीत के बाद 2019 में जो विपक्ष का गठबंधन होगा, उसमें भी जयंत चौधरी और रालोद की अहमियत बढ़ेगी।
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