PROFILE: हुकुम सिंह के बाद उनकी बेटी पर भी भारी पड़ीं तबस्सुम हसन

नई दिल्ली। उत्तर प्रदेश की कैराना लोकसभा सीट पर महागठबंधन की प्रत्याशी तबस्सुम हसन 2009 में सांसद रह चुकी हैं लेकिन उनको क्षेत्र के बाहर इस उपचुनाव ने बड़ी पहचान दी है। कैराना का उपचुनाव जीतने के बाद रालोद नेता तबस्सुम हसन चर्चा में हैं। सत्तारूढ़ भाजपा की मृगांका सिंह से उनका सीधा मुकाबला था और उन्होंने मृगांका को बड़े अंतर से हराया। मृगांका और तबस्सुम के परिवार लंबे समय से राजनीतिक प्रतिद्वंदी हैं और खास बात ये हैं कि तबस्सुम ने दो बार इस लोकसभा का चुनाव लड़ा है और दोनों बार जीती हैं।

हुकुम सिंह के बाद उनकी बेटी को हराया

हुकुम सिंह के बाद उनकी बेटी को हराया

पिछले 30 साल से ज्यादा से हुकुम सिंह और हसन परिवार के बीच कौराना की राजनीति रही है। 2009 के लोकसभा में कैराना से तबस्सुम हसन बसपा की उम्मीदवार थीं और मृगांका के पिता हुकुम सिंह भाजपा के निशान पर मैदान में थे। तब भी इन्हीं दोनों के बीच मुकाबला हुआ और तबस्सुम ने चुनाव जीता। 2014 में तबस्सुम के बेटे नाहिद हुकुम सिंह से हार गए। हुकुम सिंह की मौत के बाद सीट खाली हुई और उपचुनाव में तबस्सुम ने मृगांका को हरा दिया।

2007 में पहली बार आई थी घर से बाहर

2007 में पहली बार आई थी घर से बाहर

तबस्सुम के ससुर अख्तर हसन 1984 में कैराना से सांसद रहे तो उनके पति मुनव्वर हसन 1990 से 2003 तक चारों सदनों के सदस्य रह चुके थे। इसके बावजूद तबस्सुम की जिंदगी घर तक ही ज्यादा रही। तबस्सुम पहली बार 2007 में राजनीति में आईं, जब लोकदल के टिकट पर वो सरधना से चुनाव लड़ीं। हालांकि चुनाव में कागजों पर ही उनका नाम था, चुनाव उनके पति मुनव्वर ही लड़ रहे थे। ये वो चुनाव हार गईं। 2007 के विधानसभा के बाद मुनव्वर बसपा में आ गए और एक सड़क हादसे में उनकी मौत हो गई। 2009 में बसपा ने तबस्सुम को कैंडिडेट बनाया और वो जीतीं।

उपचुनाव ने पति-बेटे की छाया से निकाला

उपचुनाव ने पति-बेटे की छाया से निकाला

2009 में तबस्सुम जीतीं लेकिन उनसे ज्यादा सक्रियता उनके बेटे नाहिद की क्षेत्र में रही। 2012 के विधानसभा तक नाहिद ही परिवार की विरासत संभालने को आगे आ चुके थे। 2014 में नाहिद और तबस्सुम सपा में आ चुके थे और नाहिद ने इलेक्शन लड़ा। जिसके बाद माना गया कि तबस्सुम राजनीति से दूर ही रहेंगी। कैराना में विधानसभा का उपचुनाव और 2017 का विधानसभा भी नाहिद ने ही लड़ा। लेकिन हुकुम सिंह के बाद सपा से इस्तीफा दे जिस तरह से रालोद के टिकट पर गठबंधन की उम्मीदवार बनाए जाने के बाद वो देशभर में चर्चा में आ गईं। इस उपचुनाव में जिस तरह से उनको मीडिया में जगह मिली है, उससे वो पति और पुत्र की छाया से इतर एक सशक्त नेता के तौर पर खुद को स्थापित कर रही हैं।

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