CJI बीआर गवई के कार्यकाल में बचे सिर्फ तीन दिन, अब कौन संभालेंगे सुप्रीम कोर्ट की कमान?
53rd CJI: भारत की न्यायपालिका एक बड़े बदलाव की ओर बढ़ रही है। देश जल्द ही ऐसे न्यायाधीश को अपना सर्वोच्च न्यायिक पद सौंपने जा रहा है, जिनकी पहचान न सिर्फ संवैधानिक समझ और गहरी कानूनी पकड़ से है, बल्कि सादगी, ईमानदारी और जन-सरोकार वाले फैसलों से भी है। हरियाणा के एक साधारण परिवार से निकलकर सर्वोच्च न्यायालय तक का सफर तय करने वाले जस्टिस सूर्यकांत अब भारत के 53वें मुख्य न्यायाधीश बनने जा रहे हैं।
जस्टिस सूर्यकांत जब शपथ लेंगे, तो यह सिर्फ पदभार ग्रहण करने का दिन नहीं होगा, बल्कि भारतीय न्यायव्यवस्था के एक नए अध्याय की शुरुआत भी मानी जाएगी। उनके कार्यकाल से न्यायिक सुधारों, पारदर्शिता और बड़े संवैधानिक मामलों पर स्पष्ट दिशा मिलने की उम्मीद जताई जा रही है। भारत के वर्तमान चीफ जस्टिस बीआर गवई के कार्यकाल के आखिरी 3 दिन बाकी हैं। 52वें CJI गवई 23 नवंबर को रिटायर हो रहे हैं।

जस्टिस सूर्यकांत कब संभालेंगे पद?
जस्टिस सूर्यकांत 24 नवंबर 2025 को मुख्य न्यायाधीश के रूप में शपथ लेंगे। मौजूदा CJI जस्टिस बी. आर. गवई 23 नवंबर को रिटायर हो रहे हैं। परंपरा के अनुसार, जस्टिस गवई ने ही अपने उत्तराधिकारी के तौर पर जस्टिस सूर्यकांत का नाम सुझाया था, जिसे केंद्र सरकार ने मंज़ूरी दे दी।
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जस्टिस सूर्यकांत का कार्यकाल लगभग 15 महीने का होगा। वह 9 फरवरी 2027 को सेवानिवृत्त हो जाएंगे। इस दौरान उनसे न्यायपालिका में पारदर्शिता और आम लोगों से जुड़े मामलों पर तेज़ गति से सुनवाई सुनिश्चित करने जैसी उम्मीदें की जा रही हैं।
कहां से हैं जस्टिस सूर्यकांत?
जस्टिस सूर्यकांत का जन्म 10 फरवरी 1962 को हरियाणा के हिसार जिले में हुआ। वह एक साधारण परिवार से आते हैं। सीमित साधनों के बीच पढ़ाई करने वाले सूर्यकांत हमेशा अपनी मेहनत और ईमानदारी के लिए जाने जाते हैं। वकील के रूप में अपनी शुरुआत करने के बाद उन्होंने लगातार प्रगति की और आगे चलकर पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के जज बने। उनकी सरलता और सहज स्वभाव ने उन्हें आम लोगों के बीच भी लोकप्रिय बनाया।
न्यायिक सफर और बड़े फैसले
दो दशकों से अधिक समय के न्यायिक अनुभव में जस्टिस सूर्यकांत कई महत्वपूर्ण संवैधानिक मामलों में शामिल रहे हैं। उनके फैसलों का प्रभाव देशभर में महसूस किया गया है।
अनुच्छेद 370 मामला: जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने के फैसले को बरकरार रखने वाली पांच जजों की संविधान पीठ का वह हिस्सा रहे। यह फैसला हाल के वर्षों में सबसे चर्चित और संवैधानिक रूप से महत्वपूर्ण निर्णयों में से एक था।
राजद्रोह कानून पर रोक: वह उस पीठ में भी शामिल थे जिसने औपनिवेशिक जमाने के राजद्रोह कानून को अस्थायी रूप से रोकने का आदेश दिया। अदालत ने कहा था कि सरकार समीक्षा पूरी होने तक इस कानून के तहत कोई नई FIR दर्ज न करे। यह फैसला अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़े मामलों में मील का पत्थर माना गया।
अन्य महत्वपूर्ण मामले: उन्होंने पर्यावरण संरक्षण, भ्रष्टाचार रोकथाम, लोकतांत्रिक अधिकारों, मीडिया स्वतंत्रता और लैंगिक समानता से जुड़े कई बड़े मामलों में भी अहम भूमिका निभाई। उनके फैसलों में हमेशा आम नागरिकों के हित और संवैधानिक मूल्यों की झलक दिखाई देती है।
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