क्या झारखंड चुनाव में निर्णायक साबित होगा स्थानीयता का मुद्दा ? किसको फायदा किसको नुकसान ?
नई दिल्ली। झारखंड विधानसभा चुनाव में आदिवासी-मूलवासी का मुद्दा सबसे अधिक गरमाया हुआ है। रघुवर सरकार एक तरफ स्थानीय नीति को लागू करने का श्रेय लेकर खुद को आदिवासियों का असली हमदर्द बता रही है। तो दूसरी तरफ झारखंड मुक्ति मोर्चा के कार्यकारी अध्यक्ष हेमंत सोरेन ने घोषणा की है कि अगर उनकी सरकार बनी तो सबसे पहले रघुवर सरकार की स्थानीय नीति बदलेंगे। रघुवर का कहना है कि स्थानीयता को परिभाषित कर हमारी सरकार ने 90 फीसदी आदिवासियों- मूलवासियों को नौकरी दी है। जबकि हेमंत सोरेन का कहना है कि स्थानीय नीति में कई गड़बड़ियां हैं जिसे बदलने की जरूरत है। स्थानीयता के नाम पर झारखंड में खूब राजनीति हुई है। वोट बैंक की राजनीति ने स्थानीय और बाहरी की लड़ाई को इस कदर उलझा दिया कि यह झारखंड का सबसे संवेदनशील मुद्दा बन गया।

क्या है स्थानीय नीति ?
झारखंड का मूल निवासी कौन? इसी सवाल पर झारखंड की राजनीति उलझी हुई है। झारखंड में जमीन का अंतिम सर्वे 1932 में हुआ था। आदिवासी संगठनों की मांग है कि इस सर्वे के मुताबिक खतियान में जिनका नाम है उसे ही स्थानीय माना जाए। लेकिन झारखंड जैसे औद्योगिक और खनिज सम्पदा से भरपूर राज्य में जो लोग नौकरी और कारोबार के लिए बस गये उनका क्या होगा ? झारखंड जब बिहार का हिस्सा था तब यहां की खान और विभिन्न फैक्ट्रियों में रोजगार के लिए कई बाहरी लोग आये थे। जमशेदपुर, झारिया धनबाद, रामगढ़, बोकारो, सिंदरी जैसे इंडस्ट्रियल टाउन विकसित हुए थे। झारखंड में करीब 20 फीसदी लोग बाहर से आकर बसे हैं। इन लोगों का कहना है जो झाऱखंड में रहते हैं उन्हें झारखंडी मान लेना चाहिए। कुछ लोगों का तर्क है कि छत्तीसगढ़ की तरह उसे स्थानीय माना जाया जो राज्य गठन की तारीख (15 नम्बर 2000) से झारखंड में निवास करते हैं।

स्थानीय की परिभाषा
15 नवम्बर 2000 को झारखंड नया राज्य बना तो भाजपा के बाबूलाल मरांडी पहले मुख्यमंत्री बने। उनके शासन के दौरान 2002 में कार्मिक और प्रशासनिक सुधार विभाग ने स्थानीय निवासी की परिभाषा तय की। इस परिभाषा के मुताबिक वे लोग स्थानीय माने गये जिनके खुद के नाम या उनके पूर्वजों के नाम जमीन के खतियान में दर्ज थे। यानी बाबूलाल सरकार ने जमीन के सर्वे रिकॉर्ड को स्थानीयता का आधार माना। इस फैसले के बाद पूरे राज्य में बवाल खड़ा हो गया। हिंसक आंदोलनों से राज्य डावांडोल हो गया। फैसले को झारखंड हाईकोर्ट में चुनौती दी गयी। न्यायाधीशों की पांच सदस्यीय पीठ ने बाबूलाल सरकार के फैसले को खारिज कर दिया और स्थानीय निवासी की परिभाषा फिर से तय करने का आदेश दिया।

स्थानीय नीति पर राजनीति
स्थानीय़ नीति पर झारखंड में करीब 14 साल तक घनघोर राजनीति होती रही। वोट बैंक को ध्यान में रख कर राजनीतिक दल इस पर बयान देते रहे। 2009 के चुनाव के बाद परस्पर विरोधी माने जाने वाले भाजपा और झामुमो ने मिल कर सरकार बनायी थी। अर्जुन मुंडा सरकार में हेमंत सोरेन डिप्टी सीएम थे। 2012 में झामुमो ने स्थानीय नीति परिभाषित करने के मुद्दे पर अर्जुन मुंडा सरकार से समर्थन वापस लेकर सरकार गिरा दी थी। बाद में हेमंत सोरेन ने खुद सरकार बनायी। उन्होंने छह महीने में स्थानीय नीति को परिभाषित करने का दावा किया था लेकिन कर नहीं पाये। हेमंत सोरेन भी 14 महीने तक झारखंड के मुख्यमंत्री रहे लेकिन उन्होंने स्थानीय नीति के मसले को लटकाये रखा। उनके शासनकाल में ड्राफ्ट तो तैयार हुआ था लेकिन नीति तय नहीं हो पायी थी। वोट बैंक की मजबूरी में राजनीति दल इस मुद्द् पर स्पष्ट राय रखने से से डरते थे। कोई दल न तो आदिवासियों को नाराज करना चाहता था और न ही बाहर से आकर बसे लोगों को।

रघुवर सरकार ने 2016 में लागू की स्थानीय नीति
रघुवर दास की सरकार ने 2016 में हाईकोर्ट के आदेश के तहत स्थानीयता को परिभाषित कर नयी स्थानीय नीति लागू की। इस नीति के मुताबिक उसे स्थानीय माना गया जो 1985 से झारखंड में निवास कर रहा हो। जमीन के खतियान में दर्ज नाम को भी आधार बनाया गया। अगर किसी निवासी के पास जमीन नहीं हो तो वह ग्रामसभा की पहचान पर स्थानीय माना जाएगा। इसके अलावा स्थानीयता के कई अन्य आधार भी तय किये गये। इसमें सबसे महत्वपूर्ण यह था कि 30 साल से निवास करने वाले को झारखंडी माना गया था। झामुमो ने इस नीति का विरोध किया था उसने कहा कि एक तरफ सरकार स्थानीयता के लिए 1932 के खतियान को आधार मान रही है तो दूसरी तरफ 1985 से निवास को भी इसके लिए वाजिब मान रही है। यह विरोधाभाष आदिवासी हितों के खिलाफ है।

रघुवर सरकार की स्थानीय नीति को कोर्ट की मुहर
रघुवर सरकार की स्थानीय नीति को भी झारखंड हाईकोर्ट में चुनौती दी गयी। आदिवासी बुद्धिजीवी मंच ने इसके खिलाफ कोर्ट में याचिका दायर की थी। हाईकोर्ट ने सितम्बर 2019 में इस याचिका को खारिज कर दिया और कहा कि इस नीति में कोई कमी नहीं है। कोर्ट ने स्थानीय नीति को सही करार दिया। इस मामले की सुनवायी के दौरान सरकार ने कहा था कि पांच जजों की बेंच से पारित आदेश के आधार यह नीति बनायी गयी है। विधानसभा चुनावों के ठीक पहले रघुवर सरकार की स्थानीय नीति पर कोर्ट की मुहर लग जाने से भाजपा का हौसला बढ़ गया। अगर झारखंड मुक्ति मोर्चा या अन्य दल इस नीति के खिलाफ हैं तो उन्हें विधानसभा में संशोधन विधेयक ला कर उसे बदलना होगा।

स्थानीय नीति उपलब्धि, रघुवर मांग रहे वोट
पहले चरण के चुनाव प्रचार में मुख्यमंत्री रघुवर दास ने स्थानीय नीति को ट्रंप कार्ड की तरह इस्तेमाल किया है। वे चुनावी सभाओं मे कह रहे हैं कि आदिवासियों की राजनीति करने वाले झामुमो ने स्थानीय नीति पर जानबूझ कर फैसला नहीं लिया था। जब कि उनकी सरकार ने इस नीति को लागू कर 90 फीसदी स्थानीय लोगों को नौकरी दी है। हमारी सरकार की वजह से अधिसूचित क्षेत्र में दस साल तक केवल स्थानीय लोगों को ही थर्ड और फोर्थ ग्रेड की नौकरी मिलेगी। स्थानीय नीति तय होने से तीन साल में 90 हजार रोजगार का सृजन हुआ जिन पर स्थानीय लोगों की नियुक्ति हुई। रघुवर इस बात को बार-बार कह रहे हैं कि उनकी सरकार की वजह से ही आज झारखंड की सभी ननगजटेड सरकारी नौकरियां केवल झारखंडवासियों के लिए रिजर्व हो गयी हैं।

विरोध में हेमंत
महागठबंधन के मुख्यमंत्री उम्मीदवार और झामुमो के कार्यकारी अध्यक्ष हेमंत सोरेन ने मौजूदा स्थानीय नीति को त्रुटिपूर्ण बताया है। उन्होंने आरोप लगाया हा कि शिक्षकों की बहारी में 70 फीसदी बाहरी लोगों को नौकरी दी गयी है। आदिवासियों की जमीन अधिग्रहित कर निजी कंपनियों को दी जा रही है। गांवों में स्कूल-कॉलेज खोलने के लिए जमीन नहीं मिल रही और कारोबारी जमीन लेने में कामयाब हो जा रहे हैं। मौजूदा स्थानीय नीति से आदिवासियों का भला नहीं होने वाल इसलिए हम इसको बदलने के पक्ष में हैं। अगर जनादेश मिला तो हम सबसे पहले इस नीति को बदलेंगे।












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