झारखंड रिजल्ट: AAP ने 26 सीटों पर उतारे थे उम्मीदवार, NOTA से भी गई गुजरी हुई सबकी हालत
रांची। झारखंड विधानसभा चुनावों की मतगणना जारी है। दोपहर बाद तक नंबरों का आंकडा साफ हो जाएगा। हालांकि अभी तक के सभी 81 निर्वाचन क्षेत्रों पर चुनाव आयोग के आधिकारिक रुझान में कांग्रेस+ (महागठबंधन) बहुमत के करीब दिखाई दे रहा है। भाजपा 29 सीटों पर और कांग्रेस+ 40 सीटों पर आगे चल रही है। वहीं अन्य 11 सीटों पर आगे है। आपको बता दें कि 30 नवंबर से 20 दिसंबर तक पांच चरणों में चुनाव हुए थे। अभी तक का रूझान आम आदमी पार्टी के लिए सबसे खराब रहा है। पार्टी NOTA से भी पीछे है। साफ शब्दों में कहें तो झारखंड में पहली बार विधानसभा चुनाव लड़ने वाली आम आदमी पार्टी का वोट शेयर NOTA के वोट शेयर से भी कम है।

जान लीजिए AAP और NOTA का वोट शेयर
चुनाव आयोग के आधिकारिक वेबसाइट के मुताबिक सुबह 11:30 बजे तक आम आदमी पार्टी का वोट शेयर 0.19% (लगभग 3700 वोट) रहा। जबकि NOTA का वोट शेयर 1.52% (लगभग 29000 वोट) हैं। यानी आम आदमी पार्टी के प्रत्याशियों को कुल वोटों में से 3700 वोट मिले हैं जबकि 29000 वोट नोटा के तहत पड़े हैं। वहीं ओवैसी की पार्टी को 15000 से उपर वोट मिले हैं। आपको बता दें कि आम आदमी पार्टी ने झारखंड के 26 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ा था।

इन राज्यों में भी NOTA से कम था आम आदमी पार्टी का वोट शेयर
बता दें कि इससे पहले 2018 में राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में तीसरी शक्ति बनने का दावा करने वाली आम आदमी पार्टी की वहां भी करारी हार हुई थी। आप के ज्यादातर प्रत्याशी जमानत भी नहीं बचा सके थे। इन राज्यों में पहली बार विधानसभा चुनाव लड़ने वाली आम आदमी पार्टी के वोट शेयर NOTA से कम था। छत्तीसगढ़ और एमपी में इसे मिले वोटों का प्रतिशत नोटा को मिले वोटों के आधे से भी कम था। राजस्थान, जहां पार्टी ने सभी 200 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे, वहां नोटा को पड़े वोट पार्टी को मिले वोटों के तीन गुना से ज्यादा था।

झारखंड में पूरे दमखम के साथ उतरी थीं ये राजनीतिक पार्टियां
झारखंड में छोटी पार्टियां अच्छी खासी संख्या में चुनाव लड़ती हैं। लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर पहचान वाली पार्टियों में इस बार बहुजन समाजवादी पार्टी, समाजवादी पार्टी, जनता दल यूनाइटेड(जदयू), राष्ट्रीय जनता दल (राजद),राष्ट्रवादी कांग्रेस(एनसीपी), आम आदमी पार्टी(आप) के अलावा सीपीआई, सीपीएम, भाकपा माले, मासस और फारवर्ड ब्लॉक जैसी वाम पार्टियां भी पूरे दमखम से मैदान उतरी थीं। हालांकि इनमें से किसी भी पार्टी का प्रदर्शन संतोषजनक नहीं रहा।












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