Jharkhand Assembly Election Result 2019: इन 10 वजहों से JMM-कांग्रेस महागठबंधन को मिला फायदा, बहुमत के करीब
Jharkhand Assembly Election Result 2019: इन 10 वजहों से महागठबंधन को मिला फायदा
नई दिल्ली। झारखंड में विधानसभा चुनाव के नतीजों की तस्वीर लगभग साफ हो गई है। झारखंड के 19 सालों का रिकॉर्ड एक बार फिर से बरकरार रहा है। झारखंड गठन के बाद से ही ये रिकॉर्ड कायम है, जिसके मुताबिक 19 सालों में कोई भी सत्ताधारी पार्टी सत्ता में वापसी नहीं कर सकी हैं। जिसकी सिर एक बार ताज सजा है अगली बार उसे हार का सामना करना पड़ा है। ऐसा ही इस बार भी दिखा। झारखंड में बीजेपी की सरकार गिर चुकी है। जेएमएम-कांग्रेस महागठबंधन की सरकार बनती दिख रही है। जेएमएम के हेमंत सोरेन झारखंड के अगले मुख्यमंत्री बनने जा रहे हैं। झारखंड में सत्ता गंवा चुकी बीजेपी ने जीत के लिए पूरा जोर लगा दिया। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी चुनावी रैलियां की, लेकिन मोदी लहर झारखंड के परिणाम को जीत में नहीं बदल सकी। आइए जानें झारखंड में JMM महागठबंधन के जीत की 10 वजहें.....

सत्ता विरोधी लहर का फायदा
झारखंड चुनाव में विपक्षी पार्टियां रघुवर दास सरकार की खामियों और सरकार से नाराजगी का फायदा जेएमएम को मिला। भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, विस्थापन, शिक्षा, स्वास्थ्य और आदिवासी कल्याण जैसे मुद्दों पर रघुवर दास की सरकार विफल रही। इन मुद्दों को भुनाकर जेएमएम महागठबंधन ने लाभ उठाया।
कांग्रेस ने जो गलती महाराष्ट्र में की वहीं झारखंड में भी दोहरा दी। राष्ट्रीय स्तर पर बीजेपी की कामयाबी को राज्य बीजेपी ईकाई राज्य में नहीं भुना पाई। केंद्रीय स्तर पर मोदी इमेज का लाभ झारखंड में बीजेपी नहीं उठा पाई। राज्य के बीजेपी नेता प्रदेश में चुनाव प्रचार के लिए केंद्रीय नेतृत्व पर निर्भर दिखा। इसका लाभ महागठबंधन ने उठाया।
बीजेपी ने चुनाव प्रचार के दौरान स्थानीय मसलों को छोड़कर राष्ट्रीय मसलों पर फोकस किया। चुनाव प्रचार के दौरान राम मंदिर, एनआरसी, सीएए, जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने जैसे मसलों पर जोर दिया गया। झारखंड की जनता को ये नागवार गुजरा। झारखंड के लोग इन मसलों पर उदासीन दिखे। वहीं महागठबंधन चुनाव प्रचार के दौरान लगातार स्थानीय मुद्दों और आदिवासी हितों को उछालता रहा। जिसका लाभ उन्हें वोटों के तौर पर मिला।

आदिवासियों का मिला साथ
बेरोगजारी के मुद्दे पर महागठबंधन ने सरकार को घेरा। साल 2014 में रोजगार, विकास जैसी मसलों पर चुनाव जीतकर सरकार में आई बीजेपी इसे 5 सालों में पूरा नहीं कर पाई। साल 2014 में निवेश खींचकर रोजगार पैदा करने के इरादे से सत्ता में बीजेपी पांच सालों में निजी निवेश को बढ़ा नहीं पाई। रोजगार में कमी, राज्य में निवेश न आना, विकास परियोजनाओं का रुक जाने का फायदा महागठबंधन को चुनावों में मिला।
आदिवासियों की नाराजगी को महागठबंधन ने भुनाया। रघुवर दास की सरकार छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम (सीएनटी) और संथाल परगना काश्ताकारी अधिनियम (एसपीटी एक्ट) में संशोधन की कोशिशें की, सरकार ने भूमि अधिग्रहण कानून में संशोधन किया और उद्योगपतियों के लिए लैंड बैंक बनाने जैसी कोशिशें की, जो आदिवासियों की नाराजगी का कारण बना और इन फैसलों ने आदिवासियों में बीजेपी सरकार के खिलाफ आक्रोश भर दिया।
महागठबंधन का मुख्यमंत्री फेस हेमंत सोरेन को बनाया गया, जिसका फायदा उन्हें चुनाव के दौरान मिला। झारखंड में आदिवासी (हेमंत सोरेन) चेहरा और दूसरी तरफ गैर-आदिवासी चेहरा (रघुवर दास) के बीच मुकाबला हुआ। झारखंड की 26 प्रतिशत आबादी आदिवासियों की है। महागठबंधन को इसका फायदा मिला।

बीजेपी ने गठबंधन तोड़कर की बड़ी गलती
बीजेपी ने चुनाव से पहले 20 साल पुराने गठबंधन को तोड़ दिया। सीट शेयरिंग में सहमति नहीं बन पाने पर आजसू और बीजेपी के बीच का गठबंधन टूट गया। साल 2014 के चुनाव में बीजेपी ने AJSU के साथ गठबंधन कर 30 फीसदी आदिवासी वोट (एसटी) और 13 एसटी आरक्षित सीटें हासिल की थी।
जहां बीजेपी अकेले चुनावी मैदान में उतरी तो वहीं महागठबंधन एकजुट होकर चुनावी मैदान में उतरा। महागठबंधन की एकजुटता दिखी।
केंद्र सरकार के फैसलों ने भी बीजेपी की मुश्किल बढ़ाई। एनआरसी और सीएए के खिलाफ बवाल बीजेपी पर भारी पड़ गया। बीजेपी को चुनाव के आखिरी तीन चरणों में सीएए और एनआरसी के खिलाफ हुए विरोध प्रदर्शन का नुकसान उठाना पड़ा। वहीं प्याज के बढ़े दाम ने बीजेपी के आंसू निकाल दिए और बीजेपी को सीटों का नुकसान हो गया।
इन नेताओं ने काटे बीजेपी के वोट, फायदा महागठबंधन का हुआ। सीट बंटवारे को लेकर नाराज बीजेपी के कद्दावर नेता सरयू राय ने रघुवर दास के खिलाफ जमशेदपुर से निर्दलीय चुनाव लड़ा। बीजेपी ने 20 नेताओं को 6 साल के प्रतिबंधित कर दिया।
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