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झारखंड : भविष्य की राजनीति के लिए अब भाजपा को आदिवासी चेहरे की जरूरत, कौन पार लगाएगा नैया ?

नई दिल्ली। झारखंड में हार के बाद भाजपा में ओवरहालिग की तैयारी चल रही है। आदिवासियों के बीच साख खोने से भाजपा बेचैन है। अनुसूचित जनजाति के लिए रिजर्व 28 सीटों में से भाजपा को केवल तीन पर ही जीत मिली है। जब कि पिछले चुनाव में उसे 11 सीटें मिली थीं। अब भविष्य की राजनीति के लिए भाजपा किसी आदिवासी चेहरे को आगे कर सकती है। रघुवर दास के रूप में गैरआदिवासी चेहरे को प्रोजेक्ट करना भाजपा के लिए महंगा पड़ गया। स्थानीय नीति, सीएनटी-एसपीटी पर भी उसे मुंह की खानी पड़ी। रघुवर दास चुनाव हार चुके हैं। अब विधानसभा में किसी नये चेहरे को आगे करना होगा। नेता प्रतिपक्ष की जिम्मेवारी किसी मजबूत विधायक को देनी होगा ताकि वह हेमंत सोरेन की मजबूत सरकार को घेर सके। भाजपा के 25 सदस्य निर्वाचित हुए हैं। इसमें से नीलकंठ सिंह मुंडा और सीपी सिंह सबसे अनुभवी विधायक हैं। दोनों ने लगातार पांचवी बार जीत दर्ज की है।

भाजपा को आदिवासी चेहरे की जरूरत

भाजपा को आदिवासी चेहरे की जरूरत

आदिवासियों में भरोसा पैदा करने के लिए अब भाजपा को नये सिरे से सोचना होगा। पार्टी की कमान को किसी योग्य आदिवासी नेता को देनी होगी जो हेमंत सोरेन से टक्कर ले सके। भाजपा के मौजूदा विधायकों में नीलकंठ सिंह मुंडा इस जरूरत को पूरा कर सकते हैं। वे खूंटी से लगातार पांचवी बार विधायक बने हैं। सीपी सिंह भी रांची से पांचवीं बार विधायक चुने गये हैं लेकिन भाजपा फिर किसी गैरआदिवासी नेता को तरजीह देने के मूड में नहीं है। नीलकंठ सिंह मुंडा का इस बार खूंटी से विधायक चुना जाना बहुत महत्वपूर्ण है। 2017 में खूंटी में पत्थलगड़ी आंदोलन के दौरान आदिवासियों और पुलिस में कई बार भिड़ंत हुई थी। यह आंदोलन हिंसक हो गया था। आदिवासी अपने इलाके में पत्थर गाड़ कर संविधान में दर्ज आदिवासी अधिकारों की बात लिखने लगे थे। आंदोलन के बेकाबू होने के बाद कई आदिवासियों पर देशद्रोह का मुकदमा भी किया गया था। 176 लोगों को आरोपी बनाया गया था। आदिवासियों को सरकार के खिलाफ भड़काने के बावजूद नीलकंठ सिंह मुंडा ने चुनाव जीत कर अपनी लोकप्रियता साबित की है। आदिवासी अभी भी भाजपा के इस नेता पर भरोसा कर रहे हैं, ये कम बड़ी बात नहीं है। चुनाव के दौरान झारखंड भाजपा के भीष्मपितामह माने जाने वाले कड़िय़ा मुंडा के पुत्र अमरनाथ मुंडा झामुमो में चले गये थे। खूंटी कड़िया मुंडा का गढ़ रहा है। सभी बाधाओं को पार कर नीलकंठ विधायक बनने में कामयाब रहे। यानी पार्टी के अलावा उनकी अपनी व्यक्तिगत क्षमता भी है। वे रघुवर सरकार में मंत्री भी रहे थे। इस लिहाज से उनकी प्रशासनिक क्षमता भी परखी जा चुकी है।

नेता प्रतिपक्ष बन सकते हैं नीलकंठ सिंह मुंडा

नेता प्रतिपक्ष बन सकते हैं नीलकंठ सिंह मुंडा

भाजपा नीलकंठ सिंह मुंडा को विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष की जिम्मेवारी सौंप सकती है। पांच साल तक भाजपा को विपक्ष में बैठना है। इस अवधि में भाजपा नीलकंठ को भाविष्य के चुनावी चेहरे के रूप में तैयार कर सकती है। क्या भाजपा के आदिवासी नेता अर्जुन मुंडा की झारखंड में वापसी हो सकती है ? हाल ही में जब केन्द्रीय मंत्री अर्जुन मुंडा से ये सवाल पूछा गया था तो उन्होंने ऐसी किसी संभावना से इंकार कर दिया था। उनका कहना था कि उन्हें प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जो जिम्मेवारी दी है उसको पूरा करना ही उनकी प्राथमिकता है। भाजपा को वैसे भी किसी मजबूत आदिवासी नेता की जरूरत है। लक्ष्मण गिलुआ को भाजपा ने आदिवासी चेहरा मान कर ही प्रदेश अध्यक्ष बनाया था। लेकिन वे लोकसभा का चुनाव तो हारे ही विधानसभा का चुनाव भी हार गये। रघुवर दास का फेल होना भाजपा के शीर्ष नेतृत्व की भी असफलता है। अब केवल मोदी और अमित शाह की बदौलत चुनाव नहीं जीता जा सकता। स्थानीय नेतृत्व का भी मजबूत होना जरूरी है।

भाजपा की गुटबाजी भी बड़ी चुनौती

भाजपा की गुटबाजी भी बड़ी चुनौती

नरेन्द्र मोदी और अमित शाह की दखल के बाद भी झारखंड भाजपा की गुटबाजी खत्म नहीं हुई है। रांची से जीते सीपी सिंह ने पार्टी में छिपे गद्दारों पर कार्रवाई की मांग की है। उनका आरोप है कि उन्हें हराने के लिए भाजपा के ही कुछ नेताओं ने काम किया है। सीपी सिंह जैसे मजबूते नेता हारते हारते बचे। बारहवें राउंड तक सीपी सिंह झामुमो की महुआ माजी से पिछड़ रहे थे। चौदहवें राउंड में वे आगे निकले तो पंद्रहवें राउंड में फिर पीछे हो गये। इसके बाद उनके हारने की अफवाहें उड़ने लगीं। लेकिन भाजपा के इस दिग्गज नेता ने सोलहवें राउंड में साढ़े तीन हजार वोटों की बढ़त बनायी जो जीत के मुकाम तक ले गयी। इसके अलावा भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष रवींद्र राय ने भी शीर्ष नेतृत्व पर स्थानीय नेताओं की उपेक्षा का आरोप लगाया है। पार्टी में गुटबाजी खत्म करने के लिए संगठन में बदलाव की भी तैयारी चल रही है। भाजपा प्रदेश कार्यसमिति का कार्यकाल अप्रैल में ही पूरा हो चुका है लेकिन चुनावों के कारण इसे अब तक कायम रखा गया है।

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