बिहार में जाति जनगणना को भुनाने में जुटा JDU,लोकसभा चुनावों के लिए नीतीश का मेगा प्लान तैयार
बिहार सरकार ने पिछले 2 अक्टूबर को गांधी जयंती के दिन जाति जनगणना की रिपोर्ट जारी की थी। लेकिन, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू ने इसके आधार पर चुनावी तैयारी पहले से ही शुरू कर दी थी। इसके लिए पार्टी राज्य के सभी 243 विधानसभा क्षेत्रों पर 'कर्पूरी चर्चा' आयोजित कर रही है।
जदयू ने 'कर्पूरी चर्चा' के लिए कुल सात टीमें तैयार की हैं, जिसमें पार्टी के ऐसे बड़े नेताओं को शामिल किया गया है, जो अति-पिछड़ी जातियों (MBC)से आते हैं। 'कर्पूरी चर्चा' का मकसद साफ है। बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री कपूर्री ठाकुर खुद अति-पिछड़ी जाति से ताल्लुक रखते थे और वह बिहार की जाति आधारित राजनीति के लिए आज भी सोशल इंजीनियरिंग के मास्टर माने जाते हैं।

कर्पूरी जयंती तक चलेगी 'कर्पूरी चर्चा'
तथ्य यह है कि जेडीयू ने इस कार्यक्रम की शुरुआत जाति जनगणना के आंकड़े जारी होने से पहले ही कर दी थी और 24 जनवरी, 2024 तक इसे राज्य के सभी विधानसभा क्षेत्रों में आयोजित करा लिए जाने की योजना है। यह दिन कर्पूरी ठाकुर की जयंती है। इस दिन पार्टी पटना में एक बड़ी राजनीतिक रैली आयोजित करने की भी तैयारी कर रही है।
जाति सर्वे की रिपोर्ट पर अति-पिछड़े वोटरों से बात
'कर्पूरी चर्चा' के संयोजक और पार्टी के एमएलसी रविंद्र सिंह ने ईटी को बताया है कि 'सात टीमों में हमारी पार्टी के बेहतरीन वक्ता हैं। पहले हमारी जिला इकाई अति-पिछड़े वोटरों से बात करने के लिए विधानसभा क्षेत्रों में एक टीम भेजती है। कर्पूरी चर्चा के दौरान हमारे वक्ता लोगों को जाति सर्वे की रिपोर्ट की जरूरत की जानकारी देते हैं। वे बताते हैं कि सरकार को इस तरह के आंकड़ों की क्या आवश्यकता है....'
बड़े अति-पिछड़े नेताओं को मिली प्रमुख भूमिका
उनके मुताबिक अबतक इस तरह की चर्चा बिहार के 63 विधानसभा क्षेत्रों में हो भी चुकी है। पार्टी के इस कार्यक्रम की जिम्मेदारी खुद कर्पूरी ठाकुर के बेटे और जेडीयू के राज्यसभा सांसद रामनाथ ठाकुर के अलावा मंगनी लाल मंडल, मदन सहनी, शीला मंडल, कहकशां परवीन, चंद्रेश्वर चंद्रवंशी और धर्मेंद्र चंद्रवंशी जैसे प्रमुख नेताओं को सौंपी गई है।
'न्याय के साथ विकास' हमारा नारा-जेडीयू
जदयू की प्रवक्ता अंजुम आरा के मुताबिक इस कार्यक्रम का मकसद जाति सर्वे के फायदों के बारे में लोगों को जानकारी देनी है। उन्होंने कहा, 'हम लोगों को समझाने की कोशिश करेंगे कि उनके सामाजिक, आर्थिक, शैक्षणिक और राजनीतिक विकास के लिए इस रिपोर्ट की आवश्यकता थी। हमारी पार्टी का मुख्य नारा है, "न्याय के साथ विकास" और बिना जाति सर्वे रिपोर्ट के यह पूरी तरह से हासिल नहीं किया जा सकता। अब हमारे पास वैज्ञानिक डेटा है और अब सरकार इन आंकड़ों के आधार पर लोगों के विकास के लिए नीति और कार्यक्रम बना सकती है।'
सीएम नीतीश ने लोकसभा चुनावों का एजेंडा सेट किया-जेडीयू
इन कार्यक्रमों के दौरान पार्टी प्रवक्ता अति-पिछड़ों को एकजुट रहने की अहमियत बताने की कोशिश करेंगे, जो कि उनके राजनीतिक सशक्तिकरण के लिए आवश्यक है। पार्टी एमएलसी और प्रवक्ता नीरज कुमार का कहना है कि जाति सर्वे की रिपोर्ट जारी करके मुख्यमंत्री ने लोकसभा चुनावों के लिए एजेंडा सेट कर दिया है।
उन्होंने कहा, 'आने वाले शीतकालीन सत्र में दोनों सदनों में यह रिपोर्ट पेश की जाएगी। इसपर विस्तार से चर्चा की जाएगी।' उनके मुताबिक केंद्र सरकार को राष्ट्रीय स्तर पर जातिगत सर्वे कराना चाहिए।
जातिगत सर्वे के मूल आंकड़े अभी भी नहीं हुए जारी
बिहार सरकार जातिगत सर्वे के लिए अबतक जो दलीलें देती रही है, वह मूल आंकड़े अबतक जनता के सामने नहीं आए हैं। सिर्फ समाज में जातियों और उनके धर्मों के लोगों की संख्या बताई गई है और उसकी विश्वसनीयता को लेकर भी गंभीर सवाल खड़े हो चुके हैं।
एमबीसी पर क्यों है नीतीश की नजर?
इस रिपोर्ट से यह बात भी स्पष्ट हो गई है कि खुद नीतीश कुमार की जाति यानी कुर्मी इतनी संख्या में नहीं हैं कि अकेले उनकी राजनीति करके नीतीश राज्य या केंद्र की सत्ता में अपना सियासी वजूद बनाए रख सकें। जहां तक कोइरी या कुशवाहा जाति की बात है तो अब उनके पास अपनी आबादी के ज्यादा ठोस आंकड़े मौजूद हैं और उनके कई दिग्गज सीधे नीतीश को चुनौती दे रहे हैं।
यही वजह है कि नीतीश ने अति-पिछड़ी जातियों पर फोकस किया है, जिनकी जनसंख्या राज्य में सबसे अधिक है और एकजुट रहने पर वह प्रदेश की सत्ता का भविष्य तय कर सकते हैं। लेकिन, इस वर्ग में फिलहाल उन्हें भारतीय जनता पार्टी से कड़ी टक्कर मिल रही है, जिसने पिछले 10 वर्षों में एमबीसी के बीच अपनी एक मजबूत पकड़ बनाई है।












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