मोदी लहर से भी बड़ी थी 40 साल पहले की जनता आंधी

इंदिरा गांधी का मूड ख़राब था. उनके माथे पर त्योरियां चढ़ी हुई थीं. अपने हार्ड हिटिंग भाषण में इंदिरा गाँधी ने जनता पार्टी को खिचड़ी कह कर उसका मज़ाक उड़ाया था।

इंदिरा गांधी

इंदिरा गांधी ने अपने चुनाव अभियान की शुरुआत 5 फ़रवरी, 1977 को दिल्ली के रामलीला मैदान से की थी.

आयोजकों ने भीड़ जमा करने के लिए अपना सारा ज़ोर लगा दिया था.

स्कूल अध्यापकों, दिल्ली नगर निगम के कर्मचारियों और मज़दूरों को बसों में भर भर कर रामलीला मैदान पहुंचाया गया था.

इंदिरा गांधी का मूड ख़राब था. उनके माथे पर त्योरियां चढ़ी हुई थीं. अपने हार्ड हिटिंग भाषण में इंदिरा गाँधी ने जनता पार्टी को खिचड़ी कह कर उसका मज़ाक उड़ाया था.

बीच भाषण में सामने बैठी कुछ औरतें उठ कर जाने लगी थीं. सेवा दल के कार्यकर्ता उन्हें दोबारा बैठाने के लिए अपना पूरा ज़ोर लगा रहे थे.

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भीड़ आपस में इतनी बात कर रही थी कि इंदिरा गांधी को अचानक अपना भाषण बीच में ही रोकना पड़ा.

पहले संजय गांधी भी वहाँ बोलने वाले थे लेकिन उन्होंने न बोलने का फ़ैसला लिया.

एक दिन बाद यानी 6 फ़रवरी को जेपी भी दिल्ली पहुंच गए थे और ये तय हुआ कि जनता पार्टी भी रामलीला मैदान पर चुनाव रैली करेगी.

सूचना और प्रसारण मंत्री विद्याचरण शुक्ल ने भीड़ को घर पर रखने का एक नायाब तरीका निकाला था. उस ज़माने में दूरदर्शन चार बजे एक फ़िल्म दिखाया करता था.

ज़्यादा से ज़्यादा लोग घर से बाहर न निकलें, ये सुनिश्चित करने के लिए फ़िल्म का समय पांच बजे कर दिया गया.

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आम तौर से दूरदर्शन पर पुरानी फ़िल्में ही दिखाई जाती थीं लेकिन उस दिन तीन साल पुरानी ब्लॉकबस्टर 'बॉबी' दिखाने का फ़ैसला किया गया.

इंदिरा की रैली

बसों को रामलीला मैदान के आसपास भी फटकने नहीं दिया गया और लोगों को सभास्थल तक पहुंचने के लिए एक किलोमीटर तक चलना पड़ा.

रैली के आयोजक मदनलाल खुराना और विजय कुमार मल्होत्रा इस बात से परेशान थे कि इस रैली की तुलना इंदिरा गांधी की रैली से की जाएगी और लोग कहेंगे कि इसमें उस रैली से कम लोग पहुंचे हैं.

लेकिन जेपी और जगजीवन राम 'बॉबी' से ज़्यादा बड़े आकर्षण साबित हुए.

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हज़ारों लोग लंबी दूरी का रास्ता तय करते हुए रामलीला मैदान पहुंचे.

दिल्ली का नक्शा

कूमी कपूर अपनी किताब 'इमरजेंसी- अ पर्सनल हिस्ट्री' में लिखती हैं, "वाजपेई की बेटी नमिता भट्टाचार्य ने मुझे बताया कि जब वो रैली स्थल की तरफ़ जा रही थीं तो उन्हें कुछ दबी-दबी सी आवाज़ सुनाई दी. उन्होंने टैक्सी ड्राइवर से पूछा कि ये आवाज़ किसकी है? उसने जवाब दिया कि ये लोगों के कदमों की आवाज़ है. जब वो तिलक मार्ग पहुंचीं तो वो लोगों से खचाखच भरा हुआ था. उन्हें टैक्सी से उतर कर रामलीला मैदान तक पैदल जाना पड़ा."

पांच बजते बजते न सिर्फ़ रामलीला मैदान पूरा भर चुका था बल्कि बगल के आसफ़ अली रोड और जवाहरलाल नेहरू मार्ग पर भी लोगों का समुद्र दिखाई दे रहा था.

जगजीवन राम बोले थे, "बहुत पहले नादिर शाह ने गरीबों की कुर्बानी ले कर दिल्ली का नक्शा बदलने की कोशिश की थी. आज डीडीए भी वही करने की कोशिश कर रहा है."

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जब जगजीवन राम ने तंज़ कसा कि आज दिल्ली पर डेढ़ लोगों का राज है तो भीड़ में ज़ोर का ठहाका लगा. उस दिन जगजीवन राम ने 'बॉबी' को कहीं पीछे छोड़ दिया था.

बड़ौदा डायनामाइट केस

अगले कुछ दिनों में इंदिरा गाँधी के लिए और ख़राब खबर आई. उनकी बुआ विजयलक्ष्मी पंडित ने जनता पार्टी के समर्थन की घोषणा कर दी.

जब जॉर्ज फ़र्नान्डिस को बड़ौदा डायनामाइट केस के सिलसिले में दिल्ली के तीस हज़ारी कोर्ट में पेश किया गया तो जेएनयू के करीब दर्जन भर छात्रों ने नारे लगाए, 'जेल का फाटक तोड़ दो, जॉर्ज फर्नान्डिस को छोड़ दो.'

दो सप्ताह पहले इस तरह के प्रदर्शन की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी.

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प्रचार के दौरान इंदिरा गांधी के चेहरे पर दाद हो गया था, लेकिन इससे उनकी मेहनत पर कोई असर नहीं पड़ा.

जनता से कनेक्ट

चेहरे पर उभर आए दाग़ों को छिपाने के लिए अक्सर वो अपना चेहरा साड़ी के पल्लू से ढ़ंक लेतीं.

उनकी रैली कवर कर रहे पत्रकार समझ रहे थे कि वो लोगों का समर्थन लेने के लिए परंपरावादी होने की कोशिश कर रही हैं.

इंदिरा गांधी चुनाव प्रचार के दौरान 40000 किलोमीटर घूमीं, 244 चुनाव सभाओं के संबोधित किया और जम्मू कश्मीर और सिक्किम छोड़ कर भारत के हर राज्य में गईं.

लेकिन दिल ही दिल में उन्हें पता था कि इस बार जनता से उनका कनेक्ट पहले की तरह नहीं था.

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एक मार्च को जब दिल्ली के बोट क्लब में एक और चुनाव सभा हुई तो सुनने वाले इंदिरा गांधी के इतने खिलाफ़ थे कि जब दिल्ली से कांग्रेस उम्मीदवार शशि भूषण ने नारा लगाया, "बोलो इंदिरा गांधी की जय" तो इसका जवाब कानों को गड़ने वाली ख़ामोशी से दिया गया.

पोलिंग बूथ

पहले शशि भूषण समझे कि शायद माइक ख़राब है लेकिन धीरे धीरे सच्चाई सामने आने लगी.

दिल्ली में अब तक किसी प्रधानमंत्री को इतनी बेरुखी का सामना नहीं करना पड़ा था.

इंदिरा गांधी का भाषण समाप्त होने से पहले ही लोग उनकी सभा छोड़ कर वापस जाने लगे थे.

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आपातकाल के बाद हुए चुनाव

दिल्ली में जब चुनाव हुआ तो पोलिंग बूथ के सामने मतदाताओं की लंबी लंबी कतारें देखीं गई. दोनों पार्टियों ने दावा किया कि ये उनके लिए सकारात्मक संकेत हैं.

शुरुआती तस्वीर

कुछ जनता पार्टी के कार्यकर्ताओं को आशंका थी कि कांग्रेस पार्टी चुनाव जीतने के लिए किसी भी हद तक जा सकती है.

इसलिए वो अपने बिस्तरों के साथ उन जगहों पर पहुंच गए जहाँ मतपत्रों को रखा गया था.

उन्होंने दिन रात उनकी रखवाली की ताकि उनके साथ किसी तरह की छेड़छाड़ न हो सके. जब परिणाम आने शुरू हुए तो शुरुआती तस्वीर साफ़ नहीं थी.

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आपातकाल

समाचार एजेंसी 'समाचार' पहले दक्षिण भारत के परिणाम दे रही थी जहाँ कांग्रेस काफ़ी आगे निकल रही थी.

उत्तर भारत

अचानक इंडियन एक्सप्रेस के न्यूज़ रूम में लखनऊ से फ़ोन आया कि राय बरेली में इंदिरा गाँधी, राज नारायण से पीछे चल रही हैं.

देर शाम तक 'समाचार' के लिए भी उत्तर भारत के परिणामों को रोक पाना असंभव हो गया.

जनता पार्टी ने उत्तर प्रदेश, बिहार, पंजाब, हरियाणा, दिल्ली और हिमाचल प्रदेश की सारी सीटें जीतीं. सिर्फ़ राजस्थान और मध्यप्रदेश में कांग्रेस को एक-एक सीट मिली.

इंडियन एक्सप्रेस के बाहर लगे स्कोर बोर्ड में जैसे ही जनता पार्टी की जीत का ऐलान होता लोग खुशी में नाचने लगते और स्कोर बोर्ड पर बैठे शक्स के ऊपर पैसे फेंकने लगते.

कुलदीप नैयर

कूमी कपूर लिखती हैं, "अचानक वहाँ पर एक काली कार रुकी और एक बंदा 100 तंदूरी चिकन लेकर उतरा और उन्हें लोगों में मुफ़्त बांटने लगा. जब सारे मुर्ग ख़त्म हो गए तो उसने कहा वो जल्द ही मुर्गों की एक और खेप ले कर आएगा."

तीन बार मतगणना

15 अगस्त, 1947 के बाद आम लोगों में इतना उत्साह पहले कभी नहीं देखा गया था.

चुनाव के बाद मशहूर पत्रकार कुलदीप नैयर राय बरेली जा कर उस समय वहाँ जिला मजिस्ट्रेट के पद पर काम कर रहे विनोद मल्होत्रा से मिले.

उन्होंने कुलदीप नैयर को बताया कि पहले राउंड से ही इंदिरा गांधी पिछड़ने लगी थी. इंदिरा गाँधी के एजेंट माखनलाल फ़ोतेदार ने तीन बार मतगणना कराई.

संजय गांधी

आर के धवन ने उन्हें फ़ोन कर कहा कि वो चुनाव परिणाम घोषित न करें.

चुनाव परिणाम

कुलदीप नैयर अपनी आत्मकथा बियॉंड द लाइन्स में लिखते हैं, "मलहोत्रा मुझे अपने घर ले गए. उन्होंने बताया कि जब इंदिरा गांधी की हार सुनिश्चित हो गई तो उन पर चुनाव परिणाम रोकने के दबाव पड़ने लगे. उन्होंने अपनी पत्नी की सलाह लेने का फ़ैसला किया. उन्हें डर था कि इंदिरा गाँधी उप चुनाव जीत कर वापस आ जाएंगी और तब वो उनसे हिसाब बराबर करेंगी. मल्होत्रा की बीबी ने मुझे बताया कि जब मेरे पति ने मेरी सलाह मांगी तो मैंने कहा, हम बर्तन मांज लेंगे मगर बेईमानी नहीं करेंगे. ये सुनते ही मल्होत्रा ने चुनाव परिणाम घोषित करने करने का फ़ैसला किया."

राजीव गांधी, पुपुल जयकर

उधर, इंदिरा गांधी के निवास स्थान 1, सफ़दरजंग रोड पर कुछ दूसरा ही नज़ारा था.

गांधी परिवार

जब उनकी दोस्त पुपुल जयकर उनसे मिलने पहुंचीं तो इंदिरा के सचिव उन्हें सीधे उनके कमरे में ले गए.

पुपुल अपनी किताब 'इंदिरा गांधी ए बायोग्राफ़ी' में लिखती हैं, "इंदिरा ने मुझे देखते ही कहा, पुपुल मैं हार गई हूँ. मुझसे कुछ कहते नहीं बना. हम बिना कुछ कहे थोड़ी देर बैठे रहे. मेरे सामने इंदिरा तनी हुई बैठी हुई थीं. हार में भी उनके चेहरे के लालित्य को साफ़ पढ़ा जा सकता था.

मैंने राजीव और सोनिया के बारे में पूछा. वो दोनों अपने कमरे में थे. साढ़े दस बजे इंदिरा गाँधी ने खाना लगाने और राजीव और सोनिया को बुलाने के लिए कहा. काफ़ी देर बाद वो भी वहाँ आ गए. सोनिया की आंखों से आंसू निकल रहे थे. राजीव के चेहरे पर भी मुस्कराहट गायब थी. खाना परोसा गया.

सोनिया और राजीव ने कुछ फल खाए. इंदिरा ने कटलेट, सलाद और सब्ज़ियाँ ली. खाने के दौरान कोई एक शब्द भी नहीं बोला. खाने के बाद इंदिरा के पुराने दोस्त मोहम्मद यूनुस भी वहाँ पहुंच गए. धवन ने आकर बताया कि राज नारायण की लीड अब 20000 हो गई है. मैं वहाँ रात 12 बजे तक रही. जब मैं चलने लगी तो राजीव गांधी बोले, मैं संजय को मम्मी को इस स्थिति में लाने के लिए कभी नहीं माफ़ करूंगा."

विजयालक्ष्मी पंडित, इंदिरा गांधी

जनता पार्टी और कांग्रेस फ़ॉर डेमोक्रेसी गठबंधन को 298 सीटें मिलीं. कांग्रेस 153 सीटें ही जीत पाईं. इंदिरा गांधी 55000 हज़ार वोटों से हारीं.

संजय 75000 हज़ार और बंसी लाल एक लाख 61 हज़ार वोटों से पराजित हुए.

जॉर्ज फ़र्नान्डेस ने बिना अपने संसदीय क्षेत्र मुज़फ़्फ़रपुर में में पैर रखे 3 लाख वोटों से अविश्वसनीय जीत हासिल की.

अगले दिन बहुत सबह बुलाई गई मंत्रिमंडल बैठक में आपालकाल को हटा लिया गया. भारतीय प्रजातंत्र का एक दु: स्वप्न समाप्त हो चुका था.

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