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जम्मू-कश्मीरः गठबंधन टूटने का 2019 के चुनावों पर क्या असर होगा?

कश्मीर में गठबंधन टूटा
Reuters
कश्मीर में गठबंधन टूटा

जम्मू-कश्मीर में भाजपा-पीडीपी गठबंधन टूटने के बाद राज्यपाल शासन लग चुका है.

राजनीतिक जानकार मान रहे हैं कि भाजपा सोच-समझकर इस गठबंधन से बाहर आई है ताकि आगामी लोकसभा चुनावों में इसका फायदा ले सके.

आख़िर जम्मू-कश्मीर की क्षेत्रीय राजनीति देश के मिज़ाज को कैसे प्रभावित करती है? बीबीसी ने यह सवाल जम्मू-कश्मीर और देश की सियासत को समझने वाल दो विशेषज्ञों- पत्रकार भारत भूषण और कश्मीर में पूर्व वार्ताकार राधा कुमार से पूछा.



जम्मू कश्मीर गठबंधन टूटा
EPA
जम्मू कश्मीर गठबंधन टूटा

वरिष्ठ पत्रकार भारत भूषण का नज़रिया

जम्मू-कश्मीर में पीडीपी-बीजेपी गठंबधन टूटने का असर राज्य और राष्ट्र, दोनों की राजनीति पर पड़ेगा. भाजपा को लग रहा था कि जम्मू में उसकी पकड़ कमजोर हो रही है.

गठबंधन से अलग होकर भाजपा यह संदेश देना चाहती है कि चरमपंथ के ख़िलाफ़ उनकी कार्रवाई तभी ठोस हो सकती है जब उसपर केंद्र का कमान होगा.

राम माधव ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि राज्य सरकार इसमें फेल हो गई है. जिस तरह कि बातें वो कर रहे थे उससे ऐसा लग रहा था कि पीडीपी फेल हो गई है, लेकिन यह असफलता गठबंधन की सरकार का था, जिसमें भाजपा और पीडीपी दोनों शामिल थे.

अब भाजपा जो कर रही है, वो 2019 के चुनावों को नज़र में रखकर कर रही है. इससे राज्य और देश स्तर पर ध्रुवीकरण तेज़ होगा.

राज्यपाल शासन में सैनिक गतिविधियां तेज़ होंगी. सेना के जरिए चरमपंथी घटनाओं को नियंत्रित करने की कोशिशों को भी भाजपा अगले लोकसभा चुनाव में भुनाएगी.



जम्मू कश्मीर गठबंधन टूटा
BBC
जम्मू कश्मीर गठबंधन टूटा

साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण

भाजपा के सभी विधायक पहले दिल्ली आए, उसके बाद ये फ़ैसला लिया गया. ये बात सही है कि सीज़फ़ायर को लेकर दोनों पार्टियों में मतभेद थे. महबूबा मुफ़्ती चाहती थी कि सीज़फ़ायर को आगे बढ़ाया जाए.

हालांकि इसके दो फ़ायदे हुए. पहला, ये लगा कि सरकार शांति प्रकिया फिर से शुरू करना चाहती है, भले ही वो नहीं कर पाई हो. दूसरा यह कि आम नागरिकों की मौतें इस दौरान कम हुईं.

सीज़फ़ायर के दौरान पत्थरबाजी की घटनाएं भी नहीं हुईं. पुलिस और सेना को फ़ायरिंग नहीं करनी पड़ी.

भाजपा आगामी चुनावों में देश को बताना चाहती है कि उनकी सरकार मुसलमान चरमपंथियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई कर रही है. इससे उन्हें फ़ायदा होगा.

भाजपा ने खुद ही अपनी सरकार गिराई. भाजपा को कश्मीर से कन्याकुमारी तक अपनी पार्टी को लेकर चलना चाहिए था. कश्मीर में सरकार से बाहर होने का मतलब है कि पार्टी को एहसास हो रहा है कि वो कमज़ोर हो रही है.

भाजपा को हमेशा सामप्रदायिक ध्रुवीकरण से सफलता मिली है. यह फ़ैसला भी इसलिए ही लिया गया है.



जम्मू कश्मीर
EPA
जम्मू कश्मीर

कश्मीर में वार्ताकार रह चुकीं राधा कुमार का नज़रिया

मेरे मुताबिक से सीज़फ़ायर को इतनी जल्दी वापस लेना, एक ग़लत फ़ैसला है. इसका असर बुरा होगा. खासकर पहले आप सीज़फ़ायर पर रोक लगाए फिर सरकार से समर्थन वापस ले लें.

एक के बाद एक दोनों फ़ैसले ग़लत हैं. पिछले कुछ दिनों में जो भी कश्मीर में हुआ है उसने स्थिति को गंभीर बनाया है. पहले शुजात बुखारी मारे गए, फिर सरकार का गिर जाना.

लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद जैसे संगठन इससे खुश होंगे. अगर हम देखें तो आम जनता के लिए हालात बुरे हुए हैं और उनका गुस्सा भी बढ़ा है. गठबंधन टूटने से ये और बढ़ेगा.



जम्मू कश्मीर
EPA
जम्मू कश्मीर

ये सोच है कि इस मुद्दे को आगामी लोकसभा चुनावों में इस्तेमाल किया जा सकता है. हालात बुरे होंगे. अब राज्यपाल का शासन होगा. कश्मीर में चुनाव कराना आसान काम नहीं है.

पिछले चार सालों में शांति प्रक्रिया के नाम पर कुछ नहीं हुआ. उम्मीद थी कि कुछ होगा, पर ऐसा नहीं हुआ. अब वापस उसी स्थिति में आ गए हैं.

कश्मीर के युवा जो कारगिल युद्ध के बाद पैदा हुए हैं और आज जिनके हाथों में पत्थर हैं, वो कभी मानेंगे ही नहीं कि कोई शांति स्थापित करने की कोशिश की गई. वो और उग्र होंगे और स्थिति बिगड़ेगी. आने वाले दिनों में दिक्कत बढ़ेगी.


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