Get Updates
Get notified of breaking news, exclusive insights, and must-see stories!

जामिया हो या जेएनयू, पुलिस की आख़िर दिक्क़त क्या है ?

दिल्ली पुलिस
Reuters
दिल्ली पुलिस

दिल्ली में नागरिकता संशोधन क़ानून का विरोध कर रहे जामिया मिल्लिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी के छात्रों के साथ पुलिस ज़्यादती के आरोप लगे हैं.

लेकिन राजधानी दिल्ली में ये पहला वाक़या नहीं है जब पुलिस पर गंभीर आरोप लगे हैं. इससे पहले जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के छात्रों ने धरने-प्रदर्शन के दौरान मारपीट करने का पुलिस पर आरोप लगाया था.

दिल्ली पुलिस, इससे पहले वकीलों के साथ हुई हिंसक झड़पों की वजह से सुर्ख़ियों में आई थी. तब पुलिसकर्मियों ने पुलिस मुख्यालय के बाहर इस घटना के विरोध में प्रदर्शन भी किया था.

इस घटना के बाद सोशल मीडिया पर कई लोगों ने दिल्ली पुलिस पर ये कहते हुए तंज़ कसा था कि पुलिसवाले वकीलों से पिट जाते हैं लेकिन जेएनयू के छात्रों पर लाठियां बरसाने में कोई कसर नहीं छोड़ते.

ये तमाम घटनाएं पुलिस की कार्यप्रणाली, उसके प्रशिक्षण और इससे जुड़े कुछ अन्य मुद्दों पर सवाल खड़े करती हैं. इन सवालों में पुलिस की जबावदेही और उसकी कार्यप्रणाली पर कथित राजनीतिक प्रभाव भी शामिल है.

इस संबंध में हमने भारतीय पुलिस सेवा के दो वरिष्ठ अधिकारियों उत्तर प्रदेश के पूर्व पुलिस महानिदेशक प्रकाश सिंह और अरुणाचल प्रदेश के पूर्व पुलिस महानिदेशक आमोद कंठ से बात की.

प्रकाश सिंह की राय

दिल्ली पुलिस
Reuters
दिल्ली पुलिस

-पुलिस में कई तरह के सुधारों की आवश्यकता है. जनशक्ति की कमी की वजह से पुलिसबल के सामने कई चुनौतयां और ज़िम्मेदारियां हैं. क़ानून-व्यवस्था और जांच-पड़ताल का काम अलग-अलग करना होगा.

-पुलिस को राजनीतिक प्रभाव से मुक्त करने की ज़रूरत है. पुलिस की जवाबदेही तय करने के लिए पुलिस-शिकायत प्राधिकरण बनाना होगा.

-सुप्रीम कोर्ट ने हर राज्य में सिक्योरिटी कमीशन बनाने के लिए दिशा-निर्देश दिए थे. इसमें जनता के प्रतिनिधि, मानवाधिकार कार्यकर्ता, न्यायिक व्यवस्था से जुड़े लोगों के साथ सरकार के प्रतिनिधियों को शामिल करने की बात कही गई थी. लेकिन इस दिशा में कोई ठोस काम नहीं हुआ.

-पुलिस की ट्रेनिंग में बहुत कमी है. कुछेक राज्यों को छोड़कर अधिकतर राज्यों में पुलिस की ट्रेनिंग पुराने ढर्रे पर हो रही है. ट्रेनिंग सेंटर्स में अक्सर उन अधिकारियों को भेजा जाता है जिन्हें सरकार पसंद नहीं करती और वो निराशा के भाव में ट्रेनिंग देते हैं. ऐसे अधिकारी नई पीढ़ी के पुलिसबलों के लिए रोल-मॉडल नहीं बन सकते.

AFP GETTY

-हालिया घटनाओं की तस्वीरें ख़राब ट्रेनिंग का प्रतिबंब है. पुलिस का काम कितना ही तर्कसंगत और न्याय संगत क्यों ना हो, वकीलों के सामने उन्हें मुंह की खानी पड़ती है. वकील नेताओं और न्यायपालिका दोनों को प्रभावित कर लेते हैं, पुलिस बीच में पिस जाती है.

-छात्रों पर पुलिस कार्रवाई के जो वीडियो सामने आए हैं, वो भी पुलिस की अपर्याप्त ट्रेनिंग का नतीजा है. पुलिस की कार्यप्रणाली में किसी जादू की छड़ी से फ़ौरन सुधार नहीं किया जा सकता.

-संसाधनों की कमी, जनशक्ति की कमी तमाम दिक्कतों के बावजूद पुलिस यदि अच्छी ट्रेनिंग के साथ पूरी ईमानदारी से काम करे तो जनता भी धीरे-धीरे पुलिस की दिक़्कतें समझेगी. जनता पुलिस से इतनी भी असंतुष्ट नहीं है जितना मीडिया में कुछ घटनाओं के संबंध में बताया जाता है.

आमोद कंठ की राय

दिल्ली पुलिस
Reuters
दिल्ली पुलिस

-भीड़ पर क़ाबू पाने में और हिंसक प्रदर्शनों से ठीक से निपटने में दिल्ली पुलिस कई बार नाकाम रही है. साल 1984 के दंगे और उसके बाद हुई कई घटनाएं इसका सबूत हैं. लेकिन दिल्ली पुलिस की ट्रेनिंग ठीक है और उसे इस तरह की घटनाओं से निपटने के मौके मिलते रहे हैं.

-हिंसक प्रदर्शनों से निपटने के लिए ठीक से तैयारी करने, सही रणनीति बनाने और लोगों के साथ संबंध बनाने के लिए हर वक्त सुधार की ज़रूरत है. मौजूदा हालात की बात करें तो मुद्दा राजनीतिक है, जिसे बनाया गया है. लोगों में भावनाएं उमड़ रही हैं. प्रदर्शन हिंसक हो रहे हैं. ऐसे में पुलिस के पास बहुत अधिक विकल्प नहीं हो सकते.

दिल्ली पुलिस
Reuters
दिल्ली पुलिस

-पुलिस यदि किसी को पीट रही है या डंडे से मार रही है, और वो तस्वीर या वीडियो वायरल हो जाता है, तो हमें ये भी देखने की ज़रूरत है कि उस तस्वीर या वीडियो के आसपास क्या हालात थे, तस्वीर का वो हिस्सा बाहर नहीं आता. पुलिस जिस स्थिति, जिस तनाव से गुज़रती है, वो हमें नज़र नहीं आता.

-तस्वीर या वीडियो में वही सामने आता है जिसमें मानवीय पहलू दिख रहा है, लेकिन सही मायने में पूरी तस्वीर तब पता चलती है जब जांच पूरी होती है.

AFP GETTY

-पुलिस की ट्रेनिंग में सुधार की ज़रूरत से इंकार नहीं किया जा सकता, तमाम पहलुओं के हिसाब से ट्रेनिंग की ज़रूरत हमेशा बनी रहती है. भीड़ को क़ाबू करना बहुत कठिन होता है, भीड़ का एक अलग मनोविज्ञान होता है. इसमें फॉर्मूले बहुत कारग़र नहीं होते.

-प्रकाश सिंह मामले में सुप्रीम कोर्ट ने साल 2006 में अपने फ़ैसले में कई सुधारों के लिए दिशा-निर्देश दिया था. सिक्योरिटी कमीशन उसका एक पहलू था, और भी कई आयाम थे.

दिल्ली पुलिस
Reuters
दिल्ली पुलिस

-पुलिसबल में बुनियादी सुधारों की बात हुई, लेकिन देश के अधिकतर हिस्सों में इस पर काम नहीं हुआ. पुलिस सुधार हो नहीं पाए. साल 1861 का पुलिस एक्ट पुराना हो चुका है. लेकिन पुलिस आज भी इसी के मुताबिक काम कर रही है.

-पुलिस को स्वतंत्र और जबावदेह बनाने की ज़रूरत है. क़ानून-व्यवस्था का मामला हो या जांच-पड़ताल का, पुलिस को स्वतंत्र और हर तरह के दबाव से मुक्त करना होगा. पुलिस की जवाबदेही किसी नेता के प्रति नहीं बल्कि 'रूल ऑफ लॉ' के प्रति होना चाहिए.

दिल्ली पुलिस
Reuters
दिल्ली पुलिस

-जिन हालात में पुलिसबल काम कर रहे हैं, उनमें उनके भीतर असंतोष होना लाज़मी है. पुलिसवालों को भी बाक़ी लोगों की तरह अपने घर-परिवार के साथ वक्त गुजारने का समय मिलना चाहिए ताकि वो सामान्य जीवन जी सकें.

More From
Prev
Next
Notifications
Settings
Clear Notifications
Notifications
Use the toggle to switch on notifications
  • Block for 8 hours
  • Block for 12 hours
  • Block for 24 hours
  • Don't block
Gender
Select your Gender
  • Male
  • Female
  • Others
Age
Select your Age Range
  • Under 18
  • 18 to 25
  • 26 to 35
  • 36 to 45
  • 45 to 55
  • 55+