क्या ममता बनर्जी की TMC और BJP में साठगांठ हो चुकी है ?
नई दिल्ली, 28 नवंबर: तृणमूल कांग्रेस ने हाल के दिनों में जिस तरह से कांग्रेस का सफाया अभियान शुरू किया है, इससे उसकी तुलना 2014 के भारतीय जनता पार्टी वाली 'कांग्रेस मुक्त भारत' नारे से होने लगी है। कहा जा रहा है कि कांग्रेस का जितना बंटाधार बीजेपी ने किया है, उससे ज्यादा तो पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और टीएमसी सुप्रीमो ममता बनर्जी कर रही हैं। जाहिर कि तृणमूल कांग्रेस के ऐक्शन से बीजेपी-विरोधी विपक्षी खेमे में भी अफवाहों का दौर शुरू है। लेकिन, हम तथ्यों के आधार पर यह परखने की कोशिश करते हैं कि क्या इन अफवाहों में दम है ? क्या वाकई भाजपा-तृणमूल में अंदर ही अंदर समझौता हो चुका है ?

विपक्षी एकता से ममता बनर्जी की दूरी ?
अगर टीएमसी-बीजेपी के बीच खेला शुरू होने के सियासी कयास लगाए जा रहे हैं तो उसकी वजह बंगाल की सत्ताधारी पार्टी के कुछ ऐक्शन भी हैं। मसलन, न्यूज एजेंसी एएनआई से टीएमसी के एक नेता ने कहा है कि संसद के शीतकालीन सत्र को लेकर राज्यसभा में विरोधी दल के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे की ओर से बुलाई गई बैठक में उनकी पार्टी शामिल नहीं होगी। उन्होंने कहा है, 'टीएमसी विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे की ओर से कल बुलाई कई विपक्षी दलों के सदन के नेताओं की बैठक में टीएमसी शामिल नहीं होगी, लेकिन निश्चित तौर पर प्रधानमंत्री और राज्यसभा के सभापति की अध्यक्षता में बुलाई गई दोनों बैठकों में भाग लेगी।' सवाल जरूर उठता है कि खड़गे ने कांग्रेस नेता के तौर पर नहीं राज्यसभा के नेता विपक्ष के तौर पर विपक्षी सांसदों को गोलबंद करने की पहल की है, तो फिर तृणमूल उससे दूर क्यों रहना चाहती है?

क्यों कही जा रही है ममता-बीजेपी में समझौते की बात ?
टीएमसी मेघालय में कांग्रेस के 17 में 12 विधायकों को पार्टी में मिलाकर राज्य विधानसभा में शून्य से मुख्य विपक्षी पार्टी की भूमिका में आ चुकी है। इसपर त्रिपुरा-असम से लेकर गोवा तक में कांग्रेस को कमजोर करने के आरोप लग रहे हैं। पार्टी के कई नेता लगातार ममता बनर्जी के राजनीतिक संरक्षण में जाकर गर्व महसूस कर रहे है। जाहिर है कि जब टीएमसी सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी कांग्रेस की ही जड़ें काटने में लगी हुई है तो इससे सत्ताधारी पार्टी भाजपा का काम आसान हो रहा है, यह बात समझना तो स्वाभाविक है। लेकिन, क्या इसमें बीजेपी की मिलीभगत है? ऐसा दावा सबसे खुलकर लोकसभा में कांग्रेस के नेता सदन रह चुके बंगाल कांग्रेस के अध्यक्ष और सांसद अधीर रंजन चौधरी कर रहे हैं। हाल ही में जब तृणमूल सुप्रीमो दिल्ली आईं और 10 जनपथ पर जाकर सोनिया गांधी के दरबार में नहीं पहुंचीं तो चौधरी ने आरोप लगा दिया, 'अगर वो (ममता बनर्जी) अब सोनिया से मिलती हैं तो पीएम मोदी नाराज हो जाएंगे। जब से उनके भतीजे को ईडी ने बुलाया है, उनका बर्ताव तुरंत बदल गया है। इससे पहले उन्होंने सोनिया गांधी को चिट्ठी लिखकर बीजेपी के खिलाफ एकजुट होकर लड़ने की बात कही थी।'

क्या टीएमसी और बीजेपी में साठगांठ हो चुकी है ?
कांग्रेस को भाव न देकर खुद को पीएम मोदी के खिलाफ 2024 में विपक्ष का चेहरा के तौर पर पेश करने तक तो ममती की रणनीतिक बात समझ में आती है और कांग्रेस तोड़ने का उनका मिशन भी उससे मेल खाता है। आखिर 1996 में वह भी तो कांग्रेस से विद्रोह करके निकली थीं और अपनी पार्टी बनाई थी। लेकिन, क्या वाकई भाजपा और तृणमूल ने एक-दूसरे को सेट कर लिया है, यह कहने से पहले कुछ ठोस तथ्यों पर गौर फरमाना जरूरी नहीं है? त्रिपुरा में स्थानीय निकाय चुनाव के आए परिणाम से भाजपा गदगद है, क्योंकि टीएमसी फिलहाल वहां उसे टक्कर देने में नाकाम रही है। पार्टी ने एक तरह से वहां बंगाल का जवाबी मोर्चा खोला था। त्रिपुरा से पहले बंगाल चुनाव में दोनों पार्टियों की राजनीतिक दुश्मनी से देश रूबरू है। क्या बीजेपी, टीएमसी के लिए बंगाल की अपनी लड़ाई कमजोर होने दे सकती है ? 2019 में बंगाल ने उसे 18 सीटें दी हैं। 2021 में वह बुरी तरह घायल हुई है, लेकिन 2024 में वह हथियार डाल देगी, क्या इस समय ऐसा मानने का कोई कारण है ? खासकर विधानसभा चुनावों के बाद बंगाल में ममता ने तो कांग्रेस भी ज्यादा बीजेपी को घात किया और उसके जीते हुए विधायकों और सांसदों को ही ताबड़तोड़ तोड़े जा रही हैं। यही नहीं, जहां टीएमसी कांग्रेस के खिलाफ ऐक्टिव है, उनमें से गोवा और उत्तर-पूर्व को छोड़कर कांग्रेस के कमजोर होने से भाजपा को कहां फायदा होने वाला है ? वैसे भी इन राज्यों में बीजेपी पहले ही मजबूत है, फिर इस चक्कर में बंगाल में तृणमूल के खिलाफ अकेली शक्ति होने वाली अपनी स्थिति को क्यों कमजोर होने देना चाहेगी ?
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कांग्रेस को नुकसान पहुंचाने से ममता को क्या फायदा है ?
एक बात और गौर करने वाली है कि तृणमूल कांग्रेस ने मेघालय के अलावा बाकी राज्यों में कांग्रेस के जिन नेताओं को तोड़ा है, उनकी राजनीतिक जमीन कितनी मजबूत है ? असम-त्रिपुरा से लेकर बिहार-हरियाणा और गोवा तक पार्टी ने जिन कांग्रेसियों को टीएमसी में मिलाया है, उनमें से ज्यादातर तो खुद की राजनीतिक वजूद बचाने के लिए परेशान हैं। जबकि, कुछ बिना खुद के जनाधार वाले ऐसे नेता हैं, जो कल किसके साथ जाएंगे, कहना मुश्किल है। यही नहीं, रविवार को त्रिपुरा के स्थानीय निकाय के परिणाम आने के बाद कौन यह दावे के साथ कह सकता है कि टीएमसी प्रमुख ने बंगाल के बाहर भी अपनी एक मास अपील तैयार कर ली है। जाहिर है कि बंगाल में टीएमसी कैडर उन्हें पीएम मटेरियल की तरह देखने लगे हैं। लेकिन, क्या हिंदी हार्ट लैंड में वह पीएम मोदी की तुलना में अभी खुद को खड़ी कर पाई हैं ? यही नहीं, उत्तर-पूर्व में अगर उन्हें अपना जनाधार बढ़ने का यकीन है तो वहां भी उन्हें भाजपा से ही मुकाबला करना है। इसलिए फिलहाल तो ऐसा ही लगता है कि ममता कांग्रेस की कमजोर कड़ियों को जोड़कर अपनी एक राष्ट्रव्यापी उपस्थिति दर्ज कराना चाह रही हैं और इसलिए विपक्ष से नहीं टीएमसी को कांग्रेस से बड़ा प्रोजेक्ट करने के अभियान में लगी हैं।

राष्ट्रीय पहचान बनाने के मिशन पर ममता
अपने इसी अभियान के तहत ममता ने राजनीतिक रूप से सक्रिय कुछ उन चेहरों को भी जोड़ना शुरू कर दिया है, जो ममता के नेशनल प्लान को सूट करते हैं। वह भाजपा सरकार की नीतियों के खिलाफ आवाज उठाने वाले बीजेपी नेता सुब्रमण्यम स्वामी से भी मिल चुकी हैं और शायर और गीतकार जावेद अख्तर , राजनीतिक रणनीतिकार सुधींद्र कुलकर्णी जैसे लोगों से भी चर्चाएं शुरू कर चुकी हैं। इनमें से स्वामी को छोड़कर सारे बीजेपी-मोदी विरोधी चेहरे रहे हैं। जबकि, स्वामी तो अब मोदी सरकार के भी आलोचक हैं और सोनिया गांधी के साथ उनकी पुरानी राजनीतिक अदावत रही है।












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