• search
क्विक अलर्ट के लिए
नोटिफिकेशन ऑन करें  
For Daily Alerts

टीवी न्यूज़ चैनलों के आगे क्या सरकार इतनी असहाय है?

By गुरप्रीत सैनी

टीवी न्यूज़ चैनलों के आगे क्या सरकार इतनी असहाय है
AFP
टीवी न्यूज़ चैनलों के आगे क्या सरकार इतनी असहाय है

भारत के अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने 'मीडिया ट्रायल' को लेकर चिंता जताई है. मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में उन्होंने कहा कि कई विचाराधीन मामलों पर मीडिया की टिप्पणियाँ अदालत की अवमानना के समान हैं.

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़ अटॉर्नी जनरल ने कोर्ट से कहा, "आज प्रिंट मीडिया और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया लंबित मामलों पर बिना रोक टोक टिप्पणियाँ करते हैं और जजों और आम जनता की सोच को प्रभावित करने की कोशिश करते हैं. इससे संस्थान को गंभीर नुक़सान पहुँच रहा है."

सुप्रीम कोर्ट के वकील प्रशांत भूषण के ख़िलाफ़ वर्ष 2009 के अवमानना के एक मामले की सुनवाई के दौरान केके वेणुगोपाल ने ये बातें कहीं. इस मामले की सुनवाई जस्टिस एएम ख़ान विल्कर, बीआर गवई और कृष्ण मुरारी की खंडपीठ कर रही है.

केके वेणुगोपाल ने कहा, "जब कोई ज़मानत याचिका सुनवाई के लिए आती है, तो चैनल अभियुक्त और किसी के बीच की बातचीत को दिखाने लगते हैं. ये अभियुक्त को बहुत नुक़सान पहुँचा सकता है."

उनकी इस बात को सुशांत सिंह राजपूत और रिया चक्रवर्ती के हालिया मामले से जोड़कर देखा जा रहा है, जिसमें कई न्यूज़ चैनलों ने वॉट्सऐप चैट के हिस्से दिखाए थे.

उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के सामने रफ़ाल मामले का उदाहरण भी रखा. उन्होंने कहा, "जिस दिन रफ़ाल मामले पर सुनवाई होने वाली थी, उसी दिन एक आर्टिकल छपा, जिसमें कुछ दस्तावेज़ों के साथ मामले पर टिप्पणी की गई. इस मसले को हल करना ज़रूरी है."

वरिष्ठ वकील राजीव धवन ने इससे सहमति नहीं जताई और कहा कि मीडिया को सिर्फ़ इस आधार पर टिप्पणी करने से रोका नहीं जा सकता है, क्योंकि मामला विचाराधीन है. अपनी इस दलील के समर्थन में धवन ने विदेशी न्यायालयों के कुछ आदेशों का ज़िक्र किया.

ये भी पढ़िए:-

टीवी न्यूज़ चैनलों के आगे क्या सरकार इतनी असहाय है?

अटॉर्नी जनरल की अदालत में कही इन बातों पर कई सवाल भी उठ रहे हैं. वो केंद्र सरकार के सबसे बड़े क़ानूनी अधिकारी हैं यानी सरकार के प्रतिनिधि हैं. उनके कुछ भी कहने का मतलब है कि सरकार वो बात कह रही है.

तो सवाल ये है कि केंद्र सरकार ऐसा क्यों कह रही है. उसके पास सूचना और प्रसारण मंत्रालय है. मीडियो को लेकर कई तरह के दिशा-निर्देश हैं और कई क़ायदे-क़ानून भी हैं.

सरकार क्यों सुप्रीम कोर्ट में जाकर इस तरह की शिकायतें कर रही है और ख़ुद उन टीवी न्यूज़ चैनलों पर कार्रवाई क्यों नहीं करती, जिनके काम के इन तरीक़ों से उसे आपत्ति है?

इसके लिए पहले ये समझना ज़रूरी है कि सरकार इस मामले में क्या कर सकती है और क्या नहीं?

सुप्रीम कोर्ट के वकील विराग गुप्ता कहते हैं कि टीवी न्यूज़ मीडिया को सरकार विज्ञापन देती है और लाइसेंस देती है. लेकिन सरकार के पास कई तरह के क़ानून भी हैं.

वहीं मीडिया विश्लेषक मुकेश कुमार कहते हैं कि सरकार अपनी बेबसी तो बताती है, लेकिन जो क़दम वो उठा सकती है, वो भी नहीं उठाती है.

पत्रकार मनीषा पांडेय कहती हैं कि सरकार कार्रवाई इसलिए नहीं करती, क्योंकि कुछ चैनल उसी के एजेंडा को आगे बढ़ा रहे हैं और जिन मामलों में मीडिया ट्रायल किया जाता है, वहाँ कई बार कुछ ना कुछ पॉलिटिकल एजेंडा काम कर रहा होता है.

टीवी न्यूज़ चैनलों के आगे क्या सरकार इतनी असहाय है?

विचाराधीन मामलों के कई पहलू

हालाँकि विराग गुप्ता कहते हैं कि कोर्ट में विचाराधीन मामलों के कई पहलू हैं.

पहला पहलू है अदालत. अगर कोई मामला लंबित है और उस मामले को इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, प्रिंट मीडिया या सोशल मीडिया से प्रभावित करने का प्रयास किया जा रहा है, तो ये अदालती मामलों में हस्तक्षेप है और यहाँ पर ये अदालत और मीडिया के बीच की बात है.

लंबित मामलों में मीडिया की रिपोर्टिंग को लेकर सुप्रीम कोर्ट के कई आदेश हैं. साथ ही शीर्ष अदालत ने 2012 में ये भी कहा था कि अगर लगता है कि मीडिया कवरेज से किसी ट्रायल पर उल्टा असर पड़ सकता है, तो मीडिया को उस मामले की रिपोर्टिंग से अस्थायी तौर पर रोका जा सकता है.

भारत में पत्रकारों की आज़ादी के लिए विशेष क़ानून नहीं हैं, लेकिन संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत सभी नागरिकों को अभिव्यक्ति की आज़ादी है. हालाँकि, इस आज़ादी पर वाजिब प्रतिबंध का भी प्रावधान है.

अदालत की अवमानना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर वाजिब प्रतिबंध का आधार हो सकती है.

दूसरा पक्ष वो अभियुक्त को बताते हैं यानी जिनका दोष सिद्ध नहीं हुआ है. तीसरा है पीड़ित पक्ष. और चौथा अगर मामला क्रिमिनल ट्रायल का है, तो पूरे मामले को तार्किक अंत तक ले जाना सरकार की ज़िम्मदारी है.

सिविल मामले व्यक्तियों के बीच में होते हैं. आपराधिक मामले सरकार और अभियुक्त के बीच होते हैं. और वो सरकार आम तौर पर राज्य सरकार होती है. सीबीआई हो, तो केंद्र सरकार होती है.

विराग गुप्ता के मुताबिक़, इस तरह इन मामलों में सभी लोग प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से इसके हिस्सेदार हैं. और सबकी अपनी-अपनी भूमिका है.

मुकेश कुमार कहते हैं, "सरकार का भी इसमें कमज़ोर पक्ष है. न्यायपालिका भी इस मामले में थोड़ा सा असहाय महसूस कर रही है. न्यायपालिका को कवर करने वालों के लिए मानदंड बने हुए हैं, लेकिन उनका उल्लंघन करने के मामले काफ़ी बढ़ गए हैं."

उनका कहना है कि एक ऐसी संस्था होनी चाहिए, जो लगातार उन पर नज़र रखे और उन्हें नियंत्रित करे. अन्यथा ये किसी के वश का नहीं है. क्योंकि भारत में क़रीब 350-400 न्यूज़ चैनल हैं. ऐसी सूरत में उनके दिन रात के कंटेंट पर नज़र रखना और समय रहते कोई कार्रवाई करना, इसके लिए न कोई प्रक्रिया है और न ही कोई संस्था.

वो मांग करते हैं कि सरकार से स्वतंत्र एक ऐसी संस्था होनी चाहिए, जिसके पास कार्रवाई करने का अधिकार हो. मुकेश कुमार कहते हैं कि अगर ऐसा नहीं हुआ, तो सरकार और न्यायपालिका दोनों के लिए ऐसे मामलों पर नियंत्रण करना मुश्किल होगा.

टीवी न्यूज़ चैनलों के आगे क्या सरकार इतनी असहाय है?

हालाँकि टीवी मीडिया को लेकर कोई मज़बूत नियंत्रण की व्यवस्था नहीं है. ये ज़रूर है कि उनका अपना ख़ुद का एक 'रेगुलेटर' है. लेकिन अभी तक ये देखने को नहीं मिला है कि उस पर उनका कितना नियंत्रण है.

दरअसल दुनिया भर में स्वतंत्र मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना जाता है. मीडिया के नियंत्रण में सरकारों की जगह स्वायत्त इकाइयों की भूमिका सही मानी गई है. निष्पक्षता के लिए अक़्सर मीडिया 'सेल्फ़-रेगुलेशन' का रास्ता अपनाते हैं.

भारत में न्यूज़ चैनलों ने भी अब तक यही किया है. 'न्यूज़ ब्रॉडकास्टिंग स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी' (एनबीएसए) ने अपने सदस्यों के लिए पत्रकारिता के मानक तय किए हैं और संस्था अपने सदस्य चैनलों के ख़िलाफ़ शिकायतों की सुनवाई करती है. साथ ही प्रिंट मीडिया को रेगुलेट करने के लिए प्रेस काउंसिल ऑफ़ इंडिया भी है.

टीवी न्यूज़ चैनलों के आगे क्या सरकार इतनी असहाय है
Getty Images
टीवी न्यूज़ चैनलों के आगे क्या सरकार इतनी असहाय है

सरकार कार्रवाई करेगी तो भी मुश्किल..

हालाँकि ये भी कहा जाता है कि अगर सरकार मीडिया को बहुत ज़्यादा नियंत्रित करने का काम करेगी, तो उस पर अभिव्यक्ति की आज़ादी और मीडिया को दबाने के आरोप लगेंगे.

लेकिन मुकेश कुमार का आरोप है कि सरकार की जेब में ही पूरा मीडिया है और इन चैनलों के तरीक़े से आख़िर में सरकार को ही फ़ायदा हो रहा है.

विराग गुप्ता कहते हैं कि ये संकट अदालतों का, सरकार का या मीडिया का संकट नहीं है. ये संकट इस बात का है कि देश में भ्रामक मुद्दो पर बहस के माध्यम से जनता से जुड़े मुद्दों को कैसे दरकिनार किया जा रहा है.

BBC Hindi
देश-दुनिया की ताज़ा ख़बरों से अपडेट रहने के लिए Oneindia Hindi के फेसबुक पेज को लाइक करें
English summary
Is the government so helpless in front of TV news channels?
तुरंत पाएं न्यूज अपडेट
Enable
x
Notification Settings X
Time Settings
Done
Clear Notification X
Do you want to clear all the notifications from your inbox?
Settings X
X