रूस और अमेरिका से रिश्तों को लेकर क्या तलवार की धार पर चल रहा है भारत?

रूस-यूक्रेन युद्ध भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती बनता जा रहा है. जानकारों का कहना है कि भारत को रूस और अमेरिका दोनों के साथ ही अपने रिश्तों के बीच सामंजस्य बना रखना पड़ रहा है.

मोदी - पुतिन
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यूक्रेन पर रूस के हमले के बाद पैदा हुए हालात के बाद अगर किसी देश को सबसे बड़ी चुनौती का सामना करना पड़ रहा है तो वो है भारत. ये कहना है विदेश और सामरिक मामलों के जानकारों का. उनका मानना है कि मौजूदा हालात में भारत एक तरह से 'तलवार की नोक पर' ही चल रहा है जहाँ उसे रूस और अमेरिका से अपने रिश्तों के बीच सामंजस्य बनाए रखने की चुनौती का सामना करना पड़ रहा है. पूर्व राजनयिक और विदेशी मामलों के विशेषज्ञ नवतेज सरना ने बीबीसी से बात करते हुए कहा कि अभी तक भारत वो सामंजस्य बनाए रखने में कामयाब रहा है. हालांकि, वो ये भी कहते हैं कि भारत के सामने इन दोनों देशों से रिश्ते बनाए रखने की चुनौती भी बहुत ज़्यादा है.

अमेरिका भारत पर रूस के ख़िलाफ़ अपनी स्थिति स्पष्ट करने के लिए लगातार दबाव बनाए हुए है. गुरुवार को 'क्वाड' की बैठक के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने ज़ोर देते हुए कहा कि रूस के यूक्रेन पर हमले को लेकर 'कोई बहाना या टालमटोल नहीं चलेगा'. ज़ाहिर है बाइडन का इशारा भारत की तरफ़ ही था क्योंकि 'क्वाड' में शामिल दूसरे देश जैसे जापान और ऑस्ट्रेलिया खुलकर रूस की आलोचना कर रहे है और वो इस मामले में अमेरिका के साथ खड़े नज़र आ रहे हैं. बुधवार को ही अमेरिकी सीनेट की बैठक भी हुई जिसमें भारत के रुख़ को लेकर चर्चा हुई. चर्चा के दौरान अमेरिका के दक्षिण एशियाई मामलों के मंत्री डोनाल्ड लू ने कहा कि अमेरिकी अधिकारियों ने इस मुद्दे पर भारत से बात की है और बताने की कोशिश की है कि यूक्रेन पर हमले को लेकर भारत की आलोचना वाला बयान बेहद महत्वपूर्ण होगा.

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'युद्ध के पक्ष में कभी नहीं रहा भारत'

नवतेज सरना कहते हैं कि ये बात और है कि भारत ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में हुई 'वोटिंग' में हिस्सा नहीं लिया लेकिन इसके बावजूद भारत युद्ध के पक्ष में कभी नहीं रहा. वो कहते हैं, "वोटिंग से खुद को दूर रखने के बावजूद भारत ने यूक्रेन में मानवीय सहायता पहुँचाने की पहल भी की है और खुद को संयुक्त रास्ट्र के उस 'चार्टर' से भी दूर नहीं रखा है जिसमें रूस से संयम और युद्ध ख़त्म करने की अपील की गयी है. भारत भी चाहता है कि समस्या का हल बातचीत के ज़रिये ही हो न कि युद्ध के माध्यम से." जानकार ये भी मानते हैं कि भारत के लिए ये परीक्षा की स्थिति इसलिए भी है क्योंकि अमेरिका के साथ जहाँ पिछले कुछ सालों में भारत का आर्थिक और सामरिक सहयोग काफी बढ़ा है, वहीं भारत रूस पर रक्षा से जुड़े उत्पादों की सप्लाई को लेकर निर्भर रहा है. वर्ष 2018 में ही भारत ने रूस के साथ दूर तक मार करने की क्षमता रखने वाली 'सर्फेस टू एयर मिसाइल' की आपूर्ति के लिए 500 करोड़ अमेरिकी डालर के समझौते पर हस्ताक्षर किया था. भारत ने इसके लिए पैसों की पहली खेप की अदायगी भी कर दी है. रूस ने भी स्पष्ट कर दिया है कि यूक्रेन में चल रहे उसके सैन्य अभियान का कोई असर भारत को की जाने वाली मिसाइल आपूर्ति पर नहीं पड़ेगा और वो तय समयसीमा में ही भारत को दे दी जाएगी.

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भारत और रूस के बीच पुराने रिश्ते

नवतेज सरना का कहना है कि सत्तर के दशक से ही भारत और रूस के बीच सामरिक रिश्ते रहे हैं और हथियारों की आपूर्ति के लिए भारत रूस पर निर्भर रहा है. इसके अलावा अंतरिक्ष अभियान और ऊर्जा के क्षेत्र में भी भारत और रूस का सहयोग रहा है. हालांकि अमेरिकी कांग्रेस की बैठक के दौरान भारत के रवैय्ये को लेकर आलोचना भी की गई, लेकिन ये भी कहा गया कि रक्षा उपक्रमों और हथियारों को लेकर भारत की रूस पर निर्भरता में 53 प्रतिशत की कमी भी आई है. लंदन स्थित किंग्स कॉलेज में इंटरनेशनल स्टडीज के विभागाध्यक्ष हर्ष वी पंत ने बीबीसी से बात करते हुए कहा कि अमेरिका भी जानता है कि 'क्वाड' सिर्फ एक सहयोग का मंच है ना कि कोई गठबंधन. इसलिए भारत का जो 'स्टैंड' है उसपर 'क्वाड' का कोई दबाव नहीं है.

वो कहते हैं कि जिस तरह के रिश्ते भारत और अमेरिका के रहे हैं वैसे रिश्ते भारत के रूस के साथ भी हैं. पंत कहते हैं कि अमेरिका ने कभी भारत पर कोई प्रतिबन्ध नहीं लगाए हैं. अलबत्ता ऐसी नौबत वर्ष 1998 में एक बार ज़रूर आई थी जब 'न्यूक्लियर संधि' पर भारत ने हस्ताक्षर नहीं किये थे. लेकिन ये प्रतिबन्ध भी एक साल के अंदर हटा लिए गए थे.

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रूस और अमेरिका दोनों भारत के लिए महत्वपूर्ण

पंत का कहना है, "भारत को पता है कि उसके लिए अमेरिका भी महत्वपूर्ण है और रूस भी. हालांकि, भारत में घरेलू राजनीति अमेरिका विरोधी ही रही है और प्रधानमंत्री रहते मनमोहन सिंह को भी अमेरिका के साथ न्यूक्लियर संधि को लेकर घरेलू फ्रंट पर काफ़ी मुश्किलों का सामना करना पड़ा था." हर्ष वी पंत कहते हैं कि एशिया में चीन की महत्वाकांक्षा का भी सवाल है और इस लिहाज़ से अमेरिका के लिए भारत बहुत महत्वपूर्ण है. वो भारत के साथ संबंध विच्छेद करने की स्थिति में नहीं है. वो कहते हैं, "अमेरिका को अगर चीन से लोहा लेना है तो उसे भारत से भी बेहतर सामरिक संबंध बनाए रखने होंगे. भारत के लिए भी अमेरिका भी उतना ही महत्वपूर्ण है."

उनका कहना है, "ईरान के साथ जब अमेरिका के संबंध बिगड़ने लगे थे तब भी वो कह रहा था कि भारत भी ईरान से अपने संबंध ख़त्म कर दे. लेकिन भारत ने ऐसा नहीं किया था क्योंकि देशों की अपनी-अपनी कूटनीति और आवश्यकताएं होती हैं. इसलिए अमेरिका ने भी भारत पर उतना दबाव नहीं बनाया था." वहीं वरिष्ठ पत्रकार अभिजित अय्यर मित्रा कहते हैं कि भारत सार्वजनिक रूप से रूस की निंदा नहीं कर सकता है मगर उसने युद्ध ख़त्म करने और शांति बहाल करने की लगातार अपील की है. उनका कहना था कि जो रुख़ भारत ने अपनाया है वैसा ही रुख़ सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात का भी रहा है क्योंकि हर देश की अपनी प्राथमिकताएं हैं और सामरिक ज़रूरतें भी.

अभिजित कहते हैं, "जब इराक़ पर हमला हुआ था तब भी भारत ने खुद को तटस्थ रखा था जबकि इराक़ में भारत की कई परियोजनाएं चल रहीं थी. उसी तरह जब लीबिया और सीरिया पर हमले हुए तब भी भारत तटस्थ ही रहा था. कूटनीति में ख़ामोशी भी बहुत कुछ कहती है और तटस्थ रहने के भी अपने संकेत होते हैं."

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