क्या कैप्टन अमरिंदर के बाद कांग्रेस अशोक गहलोत की करने वाली है छुट्टी ? संकेत मिलने लगे हैं
नई दिल्ली, 19 जुलाई: पंजाब में पिछले विधानसभा चुनाव में कैप्टन अमरिंदर सिंह ही कांग्रेस के मुख्य चेहरा थे। तब से लेकर अबतक वही पार्टी के प्रदेश में सबसे बड़े कद के नेता रहे हैं। उनके नेतृत्व में पार्टी ने 2019 के लोकसभा चुनावों में भी राजस्थान और हरियाणा जैसे राज्यों के मुकाबले काफी अच्छा प्रदर्शन किया। यह सब उस दौर की बात है, जब पार्टी की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी संगठन के मामले में ज्यादा सक्रिय थीं। वो आज भी उसी पद पर हैं। लेकिन 2019 के लोकसभा चुनाव के बाद अध्यक्ष पद से इस्तीफा देकर भी राहुल गांधी पार्टी की तमाम बड़ी लाइन सेट करते दिखते हैं। अब पार्टी में उनके साथ उनकी बहन प्रियंका गांधी वाड्रा का भी रोल अहम हो चुका है। यह जोड़ी आज पार्टी पर पूरी तरह से हावी है। यह बात पंजाब में कैप्टन के खुलेआम विरोध के बावजूद उनके सियासी विरोधी नवजोत सिद्धू को प्रदेश अध्यक्ष बनाए जाने में साफ नजर आता है। चंडीगढ़ से 500 किलोमीटर दूर जयपुर की कांग्रेसी राजनीति पर भी इसके असर की सुगबुगाहट शुरू हो चुकी है।

पंजाब में 'कैप्टन' से कांग्रेस का छुटकारा ?
पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह को आखिरकार कांग्रेस में गांधी परिवार की बादशाहत के खिलाफ हार माननी पड़ी है। उनकी सख्त मनाही के बावजूद राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के प्रभाव में पार्टी की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी ने उनके विरोधी नवजोत सिंह सिद्धू को प्रदेश की कमान सौंप दी है। पार्टी की लाइन स्पष्ट है। अगला पंजाब विधानसभा चुनाव वह कैप्टन की अगुवाई में भले ही लड़े, अगर पार्टी जीतती है तो उन्हें फिर से सरकार के कैप्टन बनाए जाने की संभावना दूर-दूर तक नहीं लगती। पिछले चुनाव से लेकर रविवार देर शाम तक पंजाब में कैप्टन ही कांग्रेस नजर आ रहे थे और कांग्रेस, कैप्टन की छवि में नजर आती थी। लेकिन, वह मिथक तोड़ दिया गया है। लगता है कि राहुल और प्रियंका की परोक्ष अगुवाई वाली कांग्रेस अब बुजुर्ग नेताओं को झेलने के लिए तैयार नहीं है और उसने युवा नेताओं (यानी राहुल के ज्यादा करीबियों ) को आगे करने की मुहिम शुरू कर दी है।

क्या कैप्टन के बाद अशोक गहलोत की बारी ?
राहुल और प्रियंका के अगले निशाने पर राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत हो सकते हैं। हालांकि, गहलोत और अमरिंदर के व्यक्तित्व में आलाकमान की संस्कृति में ढली कांग्रेस में बहुत ज्यादा अंतर है। पार्टी नेतृत्व से नवजोत सिंह सिद्धू के लिए हरी झंडी मिलने के बावजूद कैप्टन ने जो शर्तें सार्वजिक की थी, गहलोत उतना भी कर पाएंगे इसकी संभावना दूर-दूर तक नजर नहीं आती। इसलिए अगर गांधी परिवार ने पंजाब पर ऐसा सख्त फैसला लिया है तो राहुल को अपने दोस्त सचिन पायलट के लिए राजस्थान में इसी तरह का कोई कदम उठाने में ज्यादा वक्त लगेगा, ऐसा लगता नहीं है। इसकी एक बानगी देखिए। गांधी परिवार को 'समर्पित' एक शख्स ने ट्वीट किया है- "किसी भी राज्य में कोई क्षत्रप अपने दम पर नहीं जीतता है। गांधी नेहरू परिवार के नाम पर ही गरीब, कमजोर वर्ग, आम आदमी का वोट मिलता है। मगर चाहे वह अमरिंदर सिंह हों या गहलोत या पहले शीला या कोई और! मुख्यमंत्री बनते ही यह समझ लेते हैं कि उनकी वजह से ही पार्टी जीती।" यह ट्वीट इसलिए अहम है, क्योंकि इसे अजय माकन ने रिट्वीट किया है, जो राजस्थान कांग्रेस के प्रभारी महासचिव हैं।
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माकन ने किया आलाकमान का इशारा ?
माकन के रिट्वीट करते ही राजस्थान में कांग्रेस की राजनीति फिर से गर्मा गई है। वहां पार्टी कार्यकर्ताओं के दोनों गुटों को (गहलोत और पायलट) फाइनल ऐक्शन के आसार नजर आने लगे हैं। हालांकि, पंजाब से राजस्थान की स्थिति थोड़ी अलग है। वहां चुनाव में अभी करीब ढाई साल बाकी हैं। लेकिन, गुटबाजी के चलते वहां कई सारी राजनीतिक नियुक्तियां अटकी पड़ी हैं। पंजाब में कैप्टन के खिलाफ सिद्धू का अभियान जिस तरह से लंबे वक्त बाद रंग लाया है, उसी तरह अब राजस्थान में पायलट खेमे को लगता है कि उनके दिन भी जल्द फिर सकते हैं। माकन का रिट्वीट इसलिए महत्वपूर्ण लग रहा है, क्योंकि एकबार जब उन्होंने सचिन पायलट को पार्टी के लिए अहम संपत्ति बताया था तो स्थानीय नेताओं ने कहा था कि 'माकन के बयान को गंभीरता से लेना चाहिए, क्योंकि यह हाई कमांड के इशारे की तरह होता है।' इसलिए अगर गहलोत को इशारा कर किए गए उस ट्वीट को गहलोत ने रिट्वीट किया है तो क्या यह उनके लिए खतरे की घंटी है?

सचिन पायलट का खत्म होगा इंतजार ?
गौरतलब है कि 2018 में हुए राजस्थान विधानसभा चुनाव में जब कांग्रेस जीती थी, तब सचिन पायलट कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष थे। लेकिन, जीत में उनके योगदान को नजरअंदाज करके पार्टी नेतृत्व ने गहलोत को इसलिए सीएम पद की कमान सौंपी थी, क्योंकि वे वरिष्ठ थे और शायद उनके पास ज्यादा विधायक थे। हालांकि, जानकारों की मानें तो इसके पीछे असल वजह ये थी कि गांधी परिवार को तब लगा था कि गहलोत को नजरअंदाज करने का मतलब प्रदेश से परिवार का दबदबा खत्म हो जाना होगा। यही वजह है कि पायलट को वक्त का इंतजार करने को कहा गया था। लेकिन, जब इंतजार लंबा हुआ तो पालयट कैंप ने बगावत कर दी। आखिरकार फिर गांधी परिवार से उनकी नजदीकियों के चलते ही किसी तरह से विवाद को टाला गया था। लेकिन, पिछले कुछ समय से पायलट खेमा फिर से बेचैन है। अब देखने वाली बात है कि कांग्रेस का बदला अंदाज वहां किस रूप में नजर आता है? अमरिंदर पर सोनिया के फैसले को जिस शख्स के ट्वीट को माकन ने रिट्वीट किया है, उसका अगला ट्वीट है- "20 साल से ज्यादा अध्यक्ष रहीं सोनिया ने कभी अपना महत्व नहीं जताया। नतीजा यह हुआ कि वे वोट लाती थीं और कांग्रेसी अपना चमत्कार समझकर गैर जवाबदेही से काम करते थे। हार जाते थे तो दोष राहुल पर, जीत का सेहरा खुद के माथे! सिद्धु को बनाकर नेतृत्व ने सही किया। ताकत बताना जरूरी था।"












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