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क्या Indira Gandhi वाकई सबसे ताक़तवर भारतीय प्रधानमंत्री थीं?

इंदिरा गांधी
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इंदिरा गांधी

सागरिका घोष द्वारा लिखी गयी इंदिरा गांधी की सबसे नवीनतम जीवनी का टाइटल उन्हें भारत का सबसे शक्तिशाली प्रधानमंत्री बताता है. अगर ऐसा ही है तो जब भी उन्हें सत्ता मिली उसे उन्होंने अपने हाथ से जाने क्यों दिया? मुझे लगता है कि उनकी ग़लती यह समझने में नाकामी थी कि सत्ता पाना एक बात है और इसकी ताक़त का इस्तेमाल करना दूसरी बात.

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और ताक़त हासिल करने की चाहत

सत्ता का प्रभावी इस्तेमाल करने में सक्षम बनाने वाली संस्थाओं को मज़बूत करने की जगह उन्होंने उसे कमजोर बना दिया. ज़रूरत के समय कार्रवाई नहीं करने की इच्छा से चीज़ें बढ़ जातीं, और अत्यधिक दबाव की स्थिति में वो तगड़ी प्रतिक्रिया देतीं.

बांग्लादेश युद्ध में पाकिस्तान की हार के बाद सत्ता के शीर्ष पर रहते हुए भी उनकी ताक़तों में कमी आने लगी, क्योंकि तब, जब उन्हें सत्ता चलाने के लिए उनकी क्षमताओं को और मज़बूत बनाने की ज़रूरत थी वो और अधिक ताक़त हासिल करना चाहती थीं.

पार्टी और नौकरशाही, उनके पास दो ऐसे साधन थे जिनसे उन्हें सत्ता चलाना था. लेकिन उन्होंने सभी ताक़तें अपने पास रखते हुए इन दोनों को ही कमज़ोर बना दिया. उनके पिता, भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने कांग्रेस पार्टी के अंदर प्रजातंत्र के प्रति सम्मान दिखाया था.

इस बात को समझते हुए कि अगर राज्यों में मज़बूत नेतृत्व न हो, तो पार्टी राज्य स्तर प्रभावी नहीं हो सकेगी, नेहरू ने मुख्यमंत्रियों को उनकी ताक़त का प्रभावी इस्तेमाल करने की स्वायत्ता दे रखी थी.

इंदिरा गांधी, संजय गांधी
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इंदिरा गांधी, संजय गांधी

संजय को दिया असंवैधानिक पद

वहीं इंदिरा गांधी मुख्यमंत्री के स्वशासन को अपनी सत्ता के लिए ख़तरे के रूप में देखती थीं. स्थिति तब और बदतर हो गयी जब उन्होंने पार्टी को पारिवारिक प्रतिष्ठान बनाते हुए इसमें अपने बेटे संजय को एक असंवैधानिक पद दिया. इसलिए सत्तर के दशक में पार्टी उनकी नीतियों के बढ़ते विरोध का मुकाबला करने की स्थिति में नहीं थी, जिसके परिणाम स्वरूप दिग्गज राजनीतिज्ञ जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में उनके ख़िलाफ़ आंदोलन हुआ.

आपातकाल की घोषणा के जरिए और अधिक ताक़त हासिल करने के परिणाम स्वरूप उन्हें संकट का सामना करना पड़ा. "इंदिरा भारत हैं, और भारत इंदिरा", कांग्रेस अध्यक्ष के इस नारे में शुमार चाटुकारिता के स्तर ने तब पार्टी को कमज़ोर बना दिया था. पुलिस सहित नौकरशाही को अपनी भूमिका निभाने के लिए प्रभावी रूप से कुछ स्वायत्तता की ज़रूरत होती है, और साथ ही स्वायत्ता नियमानुसार चल सके इसके लिए अन्य संस्थाओं पर नियंत्रण रखना भी ज़रूरी है.

लेकिन, इंदिरा गांधी ने "एक प्रतिबद्ध सिविल सेवा" और भारतीय लोकतंत्र के लिए और भी ख़तरनाक "प्रतिबद्ध न्यायपालिका" की मांग की. स्पष्ट रूप से यह प्रतिबद्धता उनके प्रति था न कि संविधान के प्रति जिसके प्रति इसे होना चाहिए था.

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इंदिरा के दुर्बल नौकरशाह

बांग्लादेश युद्ध के बाद इंदिरा का ख़राब वक्त आया. तब तेल की अंतरराष्ट्रीय क़ीमतों में वृद्धि हुई जिसने व्यापार संतुलन के बिगड़ने और मानसून की विफलता से पड़ी किसानी पर मार के साथ मिलकर तबाही मचा दी. लेकिन पक्षपात चाटुकारिता से पैदा इंदिरा के दुर्बल नौकरशाह इन संकटों से बचने में असमर्थ थे, संरक्षणवाद से यह संकट और भी बदतर हो गया जिसने भारत के उभरते उद्यम को लालफीताशाही के वश में कर दिया.

बैंकों के राष्ट्रीयकरण ने उन पर से बिज़नेस घरानों का नियंत्रण हटा दिया, लेकिन यदि इंदिरा ने बैंकिंग में भी सुधार किया होता तो वो क़र्जदाताओं के चंगुल से किसानों को बचाने के इंदिरा के उद्देश्य की पूर्ति के लिए बहुत कुछ कर सकते थे. इंदिरा ने नौकरशाही और अपनी पार्टी को जो नुकसान पहुंचाया उसने आपातकाल के बाद उनके पतन में योगदान दिया. नौकरशाही की कमजोरी की वजह से परिवार नियोजन और झुग्गियों को साफ़ करने की नीतियों को आपातकाल के दौरान लागू करने के लिए स्थानीय अधिकारी इधर उधर भागते रहे.

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भिंडरावाले ने पैंतरा बदल दिया

पार्टी में व्याप्त चाटुकारिता की कोई सीमा नहीं थी और आलाकमान को जमीनी हक़ीकत बताने की कोई भी हिम्मत नहीं करता था. आपातकाल के बाद 1977 में हुई चुनावी हार के बाद दोबारा सत्ता हासिल करने के लिए इंदिरा शेरनी की तरह लड़ीं और तीन साल बाद उन्हें इसमें कामयाबी हासिल हुई.

एक बार फ़िर उनका ध्यान ताक़त हासिल करने पर केंद्रित था. इस बार पहले उन्होंने पंजाब में विपक्षी सरकार को कमज़ोर करने की कोशिश की और सत्ता में काबिज अकाली दल का विरोध करने के लिए संत जरनैल भिंडरावाले को प्रोत्साहित किया. भिंडरावाले ने पैंतरा बदलते हुए उनकी सत्ता को ही चुनौती दे डाली- जिसके परिणामस्वरूप स्वर्ण मंदिर में ऑपरेशन ब्लू स्टार और इंदिरा की हत्या हुई.

अगर इंदिरा गांधी एक कठोर निर्णय लेने को तैयार थीं तो उन्हें स्वर्ण मंदिर को कब्ज़े में करने से पहले ही भिंडरावाले को गिरफ़्तार करना चाहिए था और अकाल तख्त को एक क़िले में बदल देना चाहिए था. पंजाब संकट के दौरान ही उन्होंने कश्मीर की फ़ारूक़ अब्दुल्ला सरकार को भी अस्थिर कर दिया.

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इंदिरा ने बहुत नुकसान पहुंचाया

यह उन समस्याओं की शुरुआत थी जिससे कश्मीर आज भी जूझ रहा है. इंदिरा गांधी एक असंगत महिला थीं- एक साहसी महिला जिसने इस पुरुष प्रधान दुनिया में ज़िंदा रहने के लिए अकेले लड़ाई की, लेकिन साथ ही धमकियों से न डरने वाली एक असुरक्षित महिला भी, जो बड़े निर्णय लेने में तब तक आनाकानी करती थीं जबतक कि उन्हें इसके लिए मज़बूर न होना पड़े.

लेकिन इसके बावजूद बांग्लादेश युद्ध के दौरान वो अमरीकी धमकियों के आगे नहीं झुकीं और कार्रवाई करने से मना करती रहीं साथ ही वो तब तक पाकिस्तान पर दबाव बनाती रहीं जब तक उसने पहले पहल हमला नहीं किया.

इंदिरा ने भारतीय संस्थानों और कांग्रेस पार्टी को बहुत नुकसान पहुंचाया. उन्होंने बहुत बाद में स्वीकार किया कि भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए उनकी नीतियों ने इसके विकास की क्षमताओं का दमन किया है. लेकिन उनके ही समय में हरित क्रांति हुई.

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"ग़रीबी हटाओ" का नारा

उन्होंने स्वतंत्र वैज्ञानिक अनुसंधान की अपने पिता की नीतियों को आगे बढ़ाते हुए भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) की स्थापना की. इंदिरा प्रकृति प्रेमी थीं और इसी की वजह से विलुप्त होने के ख़तरे से इस शानदार जानवर को बचाने के लिए प्रोजेक्ट टाइगर की शुरुआत हुई.

स्टॉकहोम में संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण सम्मेलन में अपने प्रसिद्ध भाषण में इंदिरा ही ऐसी पहली व्यक्ति थीं जिन्होंने ग़रीबी से मुकाबला करने को पर्यावरण की रक्षा से जोड़ा था. लेकिन संभवतः इन सबसे ऊपर, इंदिरा ने भारत के ग़रीबों को आवाज़ दी.

उनके समाजवाद को ग़लत समझा जा सकता है, उनका प्रशासन अप्रभावी रहा, लेकिन जब उन्होंने "ग़रीबी हटाओ" का नारा दिया, तो ग़रीबों ने कभी उन पर संदेह नहीं किया, वो इसके इरादे रखती थीं. जिसे भी इस पर संदेह है वो 40 साल बाद भी उनके संग्रहालय में लगातार पहुंचने वाले ग्रामीणों के लगे तांते को देख सकता है.

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