महिलाओं के लिए मिसाल हैं 72 साल की तुलसी गौड़ा, एनसाइक्लोपीडिया कहते हैं लोग
नई दिल्ली। इस अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के मौके पर आज हम एक ऐसी महिला के बारे में जानेंगे जो पूरी दुनिया के लिए एक मिसाल बन चुकी हैं। जिन्होंने गुमनाम रहकर, बिना किसी प्रसिद्धि के समाज की प्रगति के लिए काम किया है। हम बात कर रहे हैं 72 साल की तुलसी गौड़ा की। जिन्हें हाल ही में भारत सरकार ने पद्म पुरस्कार से भी सम्मानित किया है। तुसली गौड़ा कर्नाटक की रहने वाली एक पर्यावरणविद् हैं, जिन्हें 'जंगलों की एनसाइक्लोपीडिया' कहा जाता है।

तुलसी के पौधे लगाने और उन्हें बचाने के उनके जुनून के कारण ही उन्हें पर्यावरण संरक्षण की सच्ची प्रहरी कहा जाता है। वह एक आम आदिवासी महिला हैं और कर्नाटक के होनाल्ली गांव में रहती हैं। तुलसी कभी स्कूल नहीं गईं और ना ही उन्होंने कभी किसी किताब की मदद से ये ज्ञान हासिल किया। उन्होंने प्रकृति से अपने लगाव के बल पर ही वन विभाग में नौकरी की है। तुलसी ने अपनी 14 साल की नौकरी के दौरान हजारों की संख्या में पौधे लगाए जो आज पेड़ बन चुके हैं।
सेवानिवृत होने के बाद भी तुलसी गौड़ा का पौधों के प्रति जुनून पहले जैसा ही है। माना जाता है कि वह अपने जीवनकाल में एक लाख से भी अधिक पौधे लगा चुकी हैं। आम लोगों की तरह वो केवल पौधे लगाने भर को अपनी जिम्मदेरी नहीं मानतीं बल्कि तब तक उस पौधे का ध्यान भी रखती हैं, जब तक वह अपने बल पर खड़ा न हो जाए। पौधों की बुनियादी जरूरतों से भलीभांति परिचित तुलसी अपने बच्चों की तरह इनकी देखभाल करती हैं। केवल इतना ही नहीं बल्कि उन्हें तो पौधों की विभिन्न प्रजातियों और उसके आयुर्वेदिक लाभ के बारे में भी गहरी समझ है। इस ज्ञान को पाने के लिए उनसे मिलने हर रोज लोग आते हैं।
विकास के नाम पर दुनियाभर में पेड़ों को काटने का सिलसिला अब भी जारी है। इसी से व्यथित होकर तुलसी ने अपने स्तर पर पौधारोपण का काम शुरू किया था। वह पढ़ी-लिखी नहीं होने के बावजूद भी पौधों के संरक्षण की महत्ता को अच्छे से जानती हैं। अपने काम के लिए तुलसी को इंदिरा प्रियदर्शिनी वृक्ष मित्र अवॉर्ड, राज्योत्सव अवॉर्ड, कविता मेमोरियल समेत कई पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है। वह बिना किसी लाभ की उम्मीद के कई दशकों से प्रकृति को संवार रही हैं।
तुलसी गौड़ा एक आदिवासी समुदाय से संबंध रखती हैं, इसलिए भी उन्हें पर्यावरण संरक्षण का भाव विरासत में मिला है। बता दें धरती पर मौजूद जैव-विविधता के संरक्षण में आदिवासियों की प्रमुख भूमिका रही है। वे जन्म से ही प्रकृति प्रेमी होते हैं और हमेशा प्रकृति की रक्षा करते हैं। आदिवासियों के त्योहार और संस्कृति का पर्यावरण से गहरा संबंध होता है। यही वजह है कि आदिवासी समाज में जल-जंगल-जमीन को बचाने की संस्कृति आज भी विद्यमान है।
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