भारतीय नौसेना ने कैसे बदल दी 3 लड़कियों की जिंदगी
बेंगलुरु। भारतीय नौसेना हो या वायुसेना या फिर थल सेना, इनमें जाने के बाद हर किसी की जिंदगी 180 डिग्री के कोण से बदल जाती है। हम बात करने जा रहे हैं उन तीन लड़कियों की, जो प्राइवेट कंपनियों की भारी-भरकम सैलरी को छोड़कर भारतीय नौसेना में आयीं और उनकी जिंदगी में बड़े-बड़े परिवर्तन हुए।
प्रिया कैथ, हिमाचल प्रदेश
हिमाचल प्रदेश के शिमला की रहने वाली प्रिया कैथ की उम्र 23 साल है प्रिया जिस वक्त एडिमला के भारतीय नौसेना अकादमी की पासिंग आउट परेड में हिस्सा ले रही थीं, उस वक्त उनकी आंखों में सब-लेफ्टनेंट बनने की खुशी से कहीं ज्यादा आंसू थे, जो मां की याद दिला रहे थे। जी हां पासिंग आउट परेड से महज 15 दिन पहले प्रिया की मां चल बसीं।
मां की याद करते हुए प्रिया ने बताया कि उसने इलेक्ट्रॉनिक्स में बीटेक किया और फिर एक साल तक टेक महींद्रा में जॉब की। फिर आईएनए में छह माह का कोर्स ज्वाइन किया। जलंधर के एक प्रोफेसर की बेटी प्रिया को चुनौतियों से भरी जॉब ही चाहिये थी। लिहाजा उसने तय किया कि वो भारतीय नौसेना में टीचिंग लाइन में जायेगी। कोर्स पूरा करने के थोड़े ही दिन बाद प्रिया की पहली पोस्टिंग आईएनएस हमला, मुंबई पर हुई।
प्रिया चाहती तो टेक महींद्रा के एयरकंडीशंड ऑफिस में काम कर, भारी-भरकम सैलरी उठा सकती थी, लेकिन उसके अंदर थी नेवी ज्वाइन करने की चाहत जो पूरी हुई।
सायनो विलसन, केरल
23 वर्षीय सायनों विलसन केरल के अलापुड़ा की रहने वाली है। गणित से एमएससी करने के बाद लोगों ने उससे कहा कि अब कहीं कोई नौकरी कर लो और अपने पैरों पर खड़ी हो जाओ। लेकिन सायनो के दिमाग में भारतीय नौसेना घूम रही थी। सायनो ने इंट्रेंस इग्जाम पास किया और फिर भारतीय नौसेना में आयी।
आईएनए ज्वाइन करने के पहले तक सायनो 5 मिनट भी पैदल नहीं चल पाती थी, आज 23 किलोमीटर तक निरंतर बिना थके दौड़ लगाती है। सायनो बताती हैं कि आईएनए में आकर मेरी लेज़ीनेस खत्म हो गई।
अंशिता सिंह, उत्तर प्रदेश
वाराणसी में पैदा हुई अंशिता सिंह 23 वर्ष की हैं। आईएनए ज्वाइन करने से पहले अंशिता ने एमएससी किया और फिर एसएसबी पास किया। डुंडीगल, हैदराबाद में एयर फोर्स अकादमी में अंशिता एटीसी के रूप में ज्वाइन करने वाली हैं।
खास बात यह है कि कुछ साल पहले तक अंशिता भी दौड़ नहीं पाती थीं। लेकिन आज 22 से 23 किलोमीटर की दौड़ में भी अंशिता थकती नहीं हैं। अंशिता कहती हैं कि उनकी जिंदगी का सबसे यादगार दिन वो है, जब उन्होंने आईएनएसएएस से राइफल चलायी थी। अंशिता कहती हैं, "जिस वक्त मेरे हाथ में राइफल थी, उस वक्त मेरा मकसद सिर्फ लक्ष्य को भेदना था। उसके बाद से जिंदगी के हर काम को एक लक्ष्य के साथ करती हूं, शायद यही मेरी जिंदगी में सबसे बड़ा परिवर्तन है।"













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