अयोध्या पर फ़ैसले के वक़्त कोर्टरूम की आँखोंदेखी

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शनिवार को सुप्रीम कोर्ट की छुट्टी होती है लेकिन नौ नवंबर को शनिवार का नज़ारा कुछ अलग था.

नौ नवंबर को सुबह से सुप्रीम कोर्ट के बाहर हरे मैदान में पत्रकारों का जमावड़ा था, अदालत के सामने की सड़क पर ट्रैफ़िक को बंद रखा गया था.

सुप्रीम कोर्ट के सिक्यॉरिटी गेट से होते हुए मैं कोर्ट रूम नंबर एक के बाहर पहुंचा.

सुबह के साढ़े नौ बजे थे और सभी को साढ़े दस बजे का इंतज़ार था जब फ़ैसला आना था. कोर्ट रूम के बाहर वकीलों की भारी संख्या मौजूद थी.

एक वकील ने कहा, शनिवार को पहले तो सुप्रीम कोर्ट खुला और उसके बाद इतनी तादाद में वकील इकट्ठा हों, ये पहली बार है.

हिंदू और मुस्लिम पक्ष के वकील भी जमा होने लगे थे लेकिन बातचीत में कोई कुछ भी कहने को तैयार नहीं था.

सुप्रीम कोर्ट
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उनके चेहरों पर एक हल्की की मुस्कुराहट थी, लेकिन फ़ैसला क्या होगा, इसकी सुगबुगाहट भी थी. पत्रकार होने वाले फ़ैसले पर अपनी सोच बता रहे थे. सभी के मुंह पर सवाल था, आज क्या फ़ैसला आएगा.

भीड़ बढ़ती जा रही थी लेकिन दरवाज़ा कब खुलेगा ये पता नहीं चल रहा था.

इस बीच एक हलके में ये अफ़वाह फैलने लगी कि बढ़ती संख्या के चलते सभी वकीलों और पत्रकारों को कोर्टरूम में नहीं घुसने नहीं दिया जाएगा.

वक्त गुज़रता गया और आख़िरकार साढ़े दस के बाद कोर्टरूम नंबर एक के दरवाज़े का एक पल्ला खुला.

पल्ले के अगल-बगल दो सुरक्षा अधिकारी मौजूद थे.

संख्या इतनी बढ़ी और सभी को उस संकरे से दरवाज़े से घुसने की इतनी जल्दी थी कि अफ़रा-तफ़री सी मच गई.

सुरक्षा अधिकारी गुहार लगाते रहे कि लोग इस दरवाज़े को छोड़कर दूसरे दरवाज़े से अंदर आएं लेकिन कोई सुनने को तैयार नहीं था.

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मैं किसी तरह दरवाज़े के अंदर पहुंचा.

लोग कोर्ट रूम में तेज़ी से घुसकर कुर्सियों पर अपनी जगह ले रहे थे. ये देखकर मुझे मेट्रो में घुसने वाली भीड़ की याद आ गई.

वक्त गुज़रा तो कोर्ट रूम वकीलों से ठसाठस भर गया.

मैं कोर्टरूम के सबसे पीछे दीवार से सटा इस चिंता में था कि कहीं फ़ैसला का कोई हिस्सा मुझे सुनाई देगा या नहीं.

लोगों की आपसी बातचीत के शोर के कारण मेरी चिंता बढ़ रही थी.

थोडा वक़्त और गुज़रा और पाँचो जज अपनी कुर्सियों पर बैठ गए.

चीफ़ जस्टिस रंजन गोगोई बीच में बैठे थे.

मेरी निगाह थोड़ी देर तक सभी न्यायाधीशों के चेहरों पर टिकी रही.

क्या गुज़र रहा होगा उनके दिमाग़ में? या फिर उनके लिए किसी आम दिनों की ही तरह होगा? आख़िरकार उसी कुर्सी पर बैठकर उन्होंने इतने महत्वपूर्ण फ़ैसले सुनाए हैं.

ये कहना सही होगा कि मुझे उनके चेहरों पर ऐसे कोई भाव नहीं नज़र आए जिससे मुझे कुछ अलग सा लगा हो.

आख़िर वो इतने लंबे समय से चल रहे विवाद पर फ़ैसला सुनाने जा रहे थे.

उन्होंने आपस में कुछ शब्द कहे और उसके बाद मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने सभी से शांत हो जाने को कहा.

उनके शब्दों का तुरंत असर हुआ.

उन्होंने कहा कि इस फ़ैसले को पढ़ने में क़रीब आधे घंटे लगेंगे. ये कह कर उन्होंने फ़ैसला पढ़ना शुरू किया.

कुछ लोगों ने अपनी आंखें बंद कर लीं ताकि फ़ैसले का एक भी शब्द भी उनसे छूट न जाए.

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जैसे ही मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई पक्षकारों या मुद्दे को लेकर कोई बात कहते, कोर्ट रूम के अलग-अलग हिस्सों में फुसफुसाहट बढ़ने लगती. लोगों के चेहरों पर प्रतिक्रियाएं लिखी होतीं.

लेकिन फिर आसपास के कुछ और लोग उनसे चुप रहने को कहते.

मेरे पास हिंदू पक्ष के कुछ लोग खड़े हुए थे. फ़ैसले के कुछ हिस्सों को सुनकर उनके चेहरों पर फैलती मुस्कुराहट उनकी मनोदशा को दर्शा रही थी.

कभी-कभी उनकी उंगलियां मुट्ठी बन जातीं और ख़ुशी दर्शातीं.

फ़ैसला खत्म हुआ और मैं कुछ स्पष्टीकरण के लिए उस भीड़ से होता हुआ कोर्ट रूम के सबसे आगे पहुंचा जहां मुस्लिम पक्ष के वकील ज़फ़रयाब जिलानी और राजीव धवन आपस में निजी बात कर रहे थे.

उनके चेहरों पर निराशा साफ़ थी.

राजीव धवन ने मेरी ओर देखा और मेरा नाम पूछा और फिर कहा कि वो इस बारे में कोई टिप्पणी नही करेंगे.

धीरे-धीरे कोर्टरूम खाली हो गया. जब तक मैं कोर्टरूम के बाहर के हरे मैदान में पहुंचा तो कई लोग 'जय श्री राम' के नारे लगा रहे थे.

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