क्या है स्वदेशी ट्रेन सुरक्षा 'कवच', जो रेल हादसों को करेगा बिल्कुल खत्म
हैदराबाद, 04 मार्च। रेल हादसों को कम करने के लिए भारतीय रेलवे बड़ा कदम उठाने जा रहा है। भारत में तैयार किए गए स्वदेशी ट्रेन एक्सिडेंट सुरक्षा कवच अब इन रेल हादसों को टालने में मदद करेगा। इस स्वदेशी तकनीक को कवच का नाम दिया गया है। आज हैदराबाद में इस तकनीक का ट्रायल किया गया। जहां दो ट्रेनों को एक दूसरे की ओर एक ही ट्रैक पर चलाया गया, एक ट्रेन में रेल मंत्री होंगे जबकि दूसरी ट्रेन में रेलवे बोर्ड के चेयरमैन थे। स्वदेशी तकनीक से तैयार किए गए इस ऑटोमैटिक ट्रेन प्रोटेक्शन सिस्टम की मदद से रेलवे जीरो एक्सिडेंट के लक्ष्य को हासिल करने की कोशिश की गई।आगे और पीछे दोनों ही ओर से ट्रेन के कोलिजन का सफलतापूर्वक परीक्षण किया गया। इस दौरान ट्रेन अपने आप 380 मीटर पहले रुक गई।

अपने आप रुक जाएगी ट्रेन
कवच को मुख्य रूप से रेल हादसों को रोकने के लिए तैयार किया गया है। इस तकनीक के जरिए अगर ट्रेन रेलवे ट्रैक पर दूसरी ट्रेन को अपनी ओर आते हुए देखती है तो वह अपने आप एक तय दूरी पर रुक जाती है। यही नहीं जब ट्रेन के भीतर लगा डिजिटल सिस्टम किसी मानवीय गलती को ट्रेस करेगा तो भी ट्रेन अपने आप रुक जाएगी। अगर ट्रेन चल रही है और लाल बत्ती के बावजूद कोई एकदम से रेलवे ट्रैक के सामने कूद जाता है या फिर कोई अन्य तकनीकी खामी ट्रेन के संचालन में नजर आती है तो कवच ट्रेन को अपने आप रोक देगा।

रेल हादसे होंगे जीरो
रेलवे के वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि इस कवच को ट्रेन में लगाने के बाद ट्रेनों के हादसे तकरीबन शून्य हो जाएंगे। इस तकनीक पर प्रति किलोमीटर का खर्च 50 लाख रुपए आएगा जोकि विदेशी तकनीक से कई गुना सस्ती है। विदेशी तकनीक जिसका दुनियाभर में इस्तेमाल किया जाता है उसका खर्च प्रति किलोमीटर दो करोड़ रुपए आता है। रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव भी इस कवच के ट्रायल के मौके पर सिकंदराबाद से छूटने वाली एक ट्रेन में मौजूद रहेंगे।

हर तरह के हादसे को रोकता है
रेलवे अधिकारी ने बतायाकि 4 मार्च को होने वाले इस ट्रायल में रेलवे बोर्ड के चेयरमैन भी मौजूद रहेंगे। इस दौरान दिखाया जाएगा कि कैसे यह तकनीक काम करती है। हम इस चीज का भी प्रदर्शन करेंगे कि कैसे आमने-सामने की टक्कर को टाला जाए, पिछे से टक्कर को टाला जाए और कैसे सिग्नल पर होने वाले हादसे को टाला जाए। कवच ट्रेन की रफ्तार को नियंत्रित करता है और अपने आप ट्रेन को रोकने का काम करता है। यह हाई फ्रीक्वेंसी रेडियो कम्युनिकेशन पर काम करता है।

कैसे करता है काम
ट्रैक पर आरएफआईडी टैग को लगाया जाता, इसे स्टेशन यार्ड पर भी हर ट्रैक पर लगाया जाता,साथ ही सिग्नल आईडेंटिफिकेशन में भी इसे लगाया जाता है। जिससे ट्रेन की लोकेशन और ट्रेन की दिशा का पता लग सकेगा। ऑन बोर्ड डिस्प्ले ऑफ सिग्नल आस्पेक्ट ट्रेन पायलट को सिग्नल चेक करने में भी मदद करता है, जब कोहरे में विजिबिलिटी कम हो तो भी यह ट्रेन पायलट की मदद करता है। जब यह सिस्टम चालू होता है तो ट्रैक पर पांच किलोमीटर के दायरे में सभी ट्रेनों को अगल-बगल के रेलवे ट्रैक से सुरक्षा मिलनी शुरू हो जाती है। मौजूदा समय में पायल खिड़की से अपना सिर बाहर निकालकर ही बाहर के सिग्नल को देखते हैं।

2016 में शुरू हुआ प्रोजेक्ट
बता दें कि कवज का पहला फील्ड ट्रायल फरवरी 2016 में शुरू किया गया था और मई 2017 मं इसे पूरा कर लिया गया था। इसके बाद थर्ड पार्टी के द्वारा इसकी सुरक्षा का आंकलन कराया गया। इसके बाद तीन फर्म को को आरडीएसो ने इसे तैयार करने के लिए चुना। पहले चरण में 110 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से चलने वाली ट्रेनों के लिए इसे फाइनल किया गया बाद में इसे 160 किलोमीटर प्रति घंटे से चलने वाली ट्रेनों के लिए फाइनल किया गया। रेलवे इस तकनीक के लिए फिलहाल और सप्लायर की तलाश कर रही है।

बजट में किया गया था ऐलान
2022 के बजट में इसको लेकर ऐलान किया गया था। बजट में कहा गया था कि आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत 2000 किलोमीटर रेल नेटवर्क को स्वदेशी तकनीक कवच के अंतर्गत लाया जाएगा। फिलहाल कवच को 1098 रूट किलोमीटर पर दक्षिण सेंट्रल रेलवे में लगाया गया। इसे आगे दिल्ली-मुंबई, दिल्ली-हावड़ा कोरिडोर में भी लगाया जाएगा जिसकी कुल दूरी 3000 किलोमीटर होगी। इसे मिशन रफ्तार प्रोजेक्ट के तहत लगाया जाएगा, जहां ट्रेन की रफ्तार 160 किलोमीटर प्रति घंटे होती है। अधिकारी ने बताया कि इसके लिए टेंडर निकाले जा चुके हैं।
Rear-end collision Testing is successful.
Kavach automatically stopped the Loco before 380m of other Loco at the front. Honble MR Shri @AshwiniVaishnaw witnessed the trial in the locomotive.#BharatKaKavach pic.twitter.com/MWFPAtKEbF
— Ministry of Railways (@RailMinIndia) March 4, 2022












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