तो मोदी ने दो सीनियर को दरकिनार कर इसलिए चुना रावत को आर्मी चीफ
वर्ष 2015 में जब मणिपुर के चंदेल में हुए आतंकी हमले के बाद हुई सर्जिकल स्ट्राइक के पीछे नए आर्मी चीफ लेफ्टिनेंट जनरन बिपिन रावत मेन रोल में थे।
नई दिल्ली। लेफ्टिनेंट जनरल बिपिन रावत अब इंडियन आर्मी के नए चीफ होंगे। वह 31 दिसंबर को रिटायर हो रहे आर्मी चीफ जनरल दलबीर सिंह सुहाग की जगह पद संभालेंगे। लेफ्टिनेंट जनरल रावत ऐसे ऐसे आर्मी चीफ हैं जिन्हें सर्जिकल स्ट्राइक्स का मास्टर माना जाता है।
एक नजर डालिए कि आखिर क्यों सरकार ने लेफ्टिनेंट जनरल रावत को चुना और कैसे कश्मीर के अपने अनुभव से रावत सरकार के लिए मददगार साबित हो सकते हैं?

जून 2015 में अहम रोल
पिछले वर्ष मणिपुर के चंदेल में एनएससीएन-के संगठन के नागा आतंकियों ने घात लगाकर इंडियन आर्मी के काफिले पर हमला किया था। इस हमले में 18 सैनिक शहीद हो गए थे। इसके बाद इंडियन आर्मी ने सीमा पार म्यांमार में सर्जिकल स्ट्राइक को अंजाम दिया और आतंकियों को मार गिराया।

रावत ने लिया चंदेल का बदला
इस सर्जिकल स्ट्राइक पर राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (एनएसए) अजित डोवाल के अलावा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नजरें भी टिकी हुई थीं।इस सर्जिकल स्ट्राइक की जिम्मेदारी दिमापुर स्थित 3 कॉर्प्स कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल बिपिन रावत पर थी।

पीओके की सर्जिकल स्ट्राइक और रावत
इस वर्ष 18 सितंबर को जब उरी आतंकी हमला हुआ तो रावत वाइस चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ थे।सिर्फ तीन हफ्ते ही हुए थे जब उन्हें यह पद दिया गया था। इसके बाद पीओके में एक सर्जिकल स्ट्राइक हुई और इस बार रावत फिर से एक सर्जिकल स्ट्राइक को अंजाम देने वाली टीम का अहम हिस्सा थे।

पीओके की सर्जिकल स्ट्राइक में अहम रोल
डायरेक्टर जनरल ऑफ मिलिट्री ऑपरेशंस (डीजीएमओ) को वाइस चीफ को ही रिपोर्ट करना होता है और जब सर्जिकल स्ट्राइक हुई तो रावत साउथ ब्लॉक का नर्व सेंटर थे। वह एक बार फिर से एनएसए के साथ एक और सर्जिकल स्ट्राइक को अंजाम दे रहे थे। सूत्रों के मुताबिक लेफ्टिनेंट जनरल रावत का चुनाव वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए ही किया गया है।

हर तरह से सही रावत का चुनाव!
नॉर्थ में मिलिट्री को फिर से नए रंग-रूप में लाना, पश्चिम में लगातार आतंकवाद और प्रॉक्सी वॉर को बढ़ावा मिल रहा है। नॉर्थ ईस्ट के हालात भी कम चैलेजिंग नहीं है। रावत के अनुभव को देखने के बाद ही सरकार ने उन्हें अगला आर्मी चीफ बनाने का फैसला लिया। सरकार एक ऐसे व्यक्ति को यह कमान देना चाहती थी जिसके पास ज्यादा से ज्यादा ऑपरेशनल एक्सपीरियंस हो।

कश्मीर से वाकिफ हैं रावत
लेफ्टिनेंट जनरल बिपिन रावत एलओसी, नॉर्थ ईस्ट और एलएसी या लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल के हालातों से वाकिफ हैं। उनके पास काउंटर इनसर्जेंसी का 10 वर्षों का अनुभव है। वर्ष 1986 में चीन के साथ ईस्टर्न सेक्टर में हुए ऑपरेशंस में वह शामिल थे। इसके अलावा इसी वर्ष उन्हें साउथ कश्मीर के पुलवामा में स्थित 19 डिवीजन का जिम्मा दिया गया।

पुलवामा बना आतंकियों का गढ़
आज कश्मीर के हालात ऐसे हैं कि उन्हें संभालने में सरकार कहीं न कहीं खुद एक नाकामी का अहसास करने लगी है। खासतौर पर साउथ कश्मीर, जहां के पुलवामा जिले से कई युवा इस समय आतंकी संगठनों को ज्वॉइन कर रहे हैं। लेफ्टिनेंट जनरल रावत के पास कश्मीर का अच्छा खासा अनुभव है और शायद इसलिए ही उन्हें इतनी बड़ी और अहम जिम्मेदारी दी गई है। वह वर्तमान की परिस्थितियों से भी वाकिफ हैं। सरकार मानती है कि उनका अनुभव काफी हद मक मददगार साबित हो सकता है।

तीसरे गोरखा आर्मी चीफ
फील्ड मार्शल सैम मॉनकेशॉ और जनरल दलबीर सिंह सुहाग के बाद लेफ्टिनेंट जनरल बिपिन रावत तीसरे ऐसे सेना प्रमुख होंगे जो गोरखा रेजीमेंट से आते हैं। लेफ्टिनेंट जनरल रावत के पिता लेफ्टिनेंट जनरल लच्छू सिंह रावत भी गोरखा रेजीमेंट थे। पिता और बेटे दोनों ने ही 5/11 गोरखा राइफल यूनिट को कमांड किया था।












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