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पशु परिवहन स्मरण दिवस: जब खच्चर पेडोंगी को मिला था वीर चक्र

भारतीय सेना को अपनी सेवाएं देने वाले घोड़ों व कुत्तों के बारे में तो हर कोई जानता है, उनकी वीरता की कहानियां भी खूब सुनी होंगी, लेकिन इन्‍हीं के बीच ऐसे जानवर भी हैं, जिनके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं, वो हैं खच्चर व टट्टू। जी हां ये वो साइलेंट हीरो हैं, जो ऐसी दुर्गम जगहों तक पहुंच जाते हैं, जहां जीप, ट्रक, विमान या हेलीकॉप्‍टर नहीं पहुंच पाता है। इनकी वीरता की कहानियां भी अलग हैं और भारतीय सेना ने उन्हें स्वर्ण‍िम अक्षरों में लिखा है। ऐसे ही जानवरों को श्रद्धांजलि देने के लिए हर साल 26 सितम्बर को पशु परिवहन दिवस मनाया जाता है। इस दिन खच्चर पेडोंगी को याद करना भी बनता है, जिसे 1971 में भारत-पाक युद्ध के दौरान अपना शौर्य दिखाने पर वीर चक्र से सम्मानित किया गया था।

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    Animal Transport Remembrance Day: जब खच्चर पेडोंगी को मिला Veer Chankra | वनइंडिया हिंदी

    बेंगलुरु के एएससी सेंटर पर आज ऐसे ही तमाम वीर पशुओं को श्रद्धांजलि दी गई। शनिवार की सुबह लेफ्टिनेंट जनरल बी के रेप्सवाल, विशिष्ट सेवा मेडल कमांडेंट ने ए एस सी सेंटर एंड कॉलेज की ओर से वीर जानवरों को श्रद्धांजलि अर्पित की। इस मौके पर कर्नल जी एस यादव समेत कई सैन्य अधिकारियों ने भी वीरगति को प्राप्‍त हुए पशुओं को सलामी दी।

    Animal Transport Remembrance Day 2021

    26 सितम्बर को ही क्यों मनाते हैं 'पशु परिवहन स्मरण दिवस'

    पशु परिवहन योद्धाओं की वीरता, साहस और बलिदान का सम्मान करने के लिए 26 सितंबर को हर साल "पशु परिवहन स्मरण दिवस' के रूप में मनाने के लिए चुना गया है। दरअसल इसी दिन 1914 में, 9वीं और 30वीं खच्चर कोर, भारतीय अभियान बल 'ए' का हिस्सा फ्रांस के मासिले में उतरा था। खास बात यह है कि यह दल प्रथम विश्व युद्ध में शामिल होने वाली पहली आपूर्ति और परिवहन कोर सैनिकों में से पहला ऐसा दल था।

    1971 में भारत-पाक युद्ध में पेडोंगी ने निभाई खास भूमिका

    खच्चर पेडोंगी का नाम भारतीय सेना के पन्नों पर स्वर्ण‍िम अक्षरों में लिखा है। 1971 के युद्ध में पहाड़ों के बीच स्थ‍ित एक फॉरवर्ड पोस्ट पर तैनात हमारे कुछ सैनिक शहीद हो गए, तभी पाकिस्तानी सेना ने वहां मौजूद कुछ खच्चरों को बंधक बना लिया और अपने साथ ले गये। उनमें पेडोंगी भी था। पाकिस्तानियों ने इन खच्चरों की पीठ पर मीडियम मशीन गन और गोला-बारूद लाद दिया और अपनी पोस्ट की ओर चल पड़े।

    Animal Transport Remembrance Day 2021

    पेडोंगी को दुश्‍मन के साथ जाना गवारा नहीं हुआ, बीच रास्ते में ही उसने दुश्‍मन को चकमा दिया और घने जंगलों के बीच होते हुए भारतीय सेना की एक अन्य पोस्ट तक वापस आ गया। पेडोंगी की इस वीरता पर पशु परिवहन बटालियन का सिर गर्व से ऊंचा हो गया और आगे चलकर पेडोंगी को राष्‍ट्रपति की ओर से वीर चक्र से नवाजा गया। करीब 18 वर्षों तक भारतीय सेना का हिस्‍सा रहे पेडोंगी रिटायरमेंट के बाद भी सेना के साथ रहा और 38 वर्ष की आयु में उसका निधन हो गया। उसे दिया गया वीर चक्र आज भी बेंगलुरु के एएससी सेंटर में रखा हुआ है।

    बेंगलुरु में है पशुओं का वॉर मेमोरियल

    भारतीय सेना में अलग-अलग ऑपरेशंस में वीरगति को प्राप्‍त पशुओं को याद करने के लिए बेंगलुरु के एएससी सेंटर पर एक वॉर मेमोरियल है। इस वॉर मेमोरियल में शहीद पशुओं की वीर गाथा लिखी गई है। स्वतंत्रता के बाद की बात करें तो भारत-पाक युद्ध 1965 में एक खच्चर को विशिष्‍ट सेना मेडल, और एक को सेना मेडल दिया गया, जबकि दो को एंटीनेश्‍नल एलिमेंट्स (यूपी) ऑपरेशन में एक को शौर्य चक्र, 1997 में ऑपरेशन रक्षक में साहसी खच्चर को सेना मेडल दिया गया। यही नहीं 1999 में करगिल युद्ध के दौरान मोर्चा संभालने वाले दो खच्चरों को भी सेना मेडल से सम्मानित किया गया।

    Animal Transport Remembrance Day 2021

    आग-गोला और बारूद से नहीं डरते हैं ये विशिष्‍ट पशु

    भारतीय सेना में प्राचीन काल से विभिन्न सैन्य अभियानों और ऑपरेशन में पशु परिवहन का प्रभावी ढंग से उपयोग करने का एक लंबा इतिहास रहा है। वनइंडिया से बातचीत में सैन्य अधिकारियों ने बताया कि सेना सेवा कोर के घोड़े और खच्चर हमारी सेना का एक आंतरिक हिस्सा हैं जिन्होंने उच्च पर्वत श्रृंखलाओं से घने जंगली इलाकों में विभिन्न मिशनों का संचालन किया है और अपने सभी अभियानों में सशस्त्र बलों की सफलता के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

    Animal Transport Remembrance Day 2021

    यह अभी भी चुनौती भरे मौसम और इलाके की परिस्थितियों में अग्रिम सीमा चौकियों पर भारतीय सेना के रसद पहुंचाने में महत्वपूर्ण रीढ़ है। उन्‍होंने बताया कि कई पोस्ट ऐसी होती हैं, जहां पर अत्याधुनिक परिवहन ले जाने पर वो रडार में आ सकते हैं, ऐसी जगहों पर खच्चर बेहद अहम भूमिका निभाते हैं फिर चाहे वो जम्मू-कश्‍मीर व लद्दाख की ऊंचे पहाड़ हों या फिर नॉर्थ ईस्ट के दुर्गम इलाके, हर जगह इनकी भूमिका बेहद अहम होती है। इन ये पशु आग, पानी, गोला-बारूद किसी से नहीं डरते हैं।

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