खराब क्वालिटी के इंजन वाले ट्रेनर जेट्स को उड़ा रहे हैं इंडियन एयरफोर्स और नेवी के पायलट्स
नई दिल्ली। कंपोट्रलर जनरल ऑफ डिफेंस अकाउंट (सीजीडीए) की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि इंडियन एयरफोर्स (आइएएफ) और इंडियन नेवी के पायलट्स जिन ट्रेनर जेट्स को उड़ा रहे हैं, उनमें दोयम दर्जे के इंजन का प्रयोग हुआ है। सीजीडीए ने अपनी ऑडिट रिपोर्ट में कहा है कि इंजन में सेकेंड हैंड कंपोनेंट्स लगे हैं और इनकी वजह से एयरक्राफ्ट की क्वालिटी पर भी काफी बुरा असर पड़ा है। इंग्लिश डेली हिन्दुस्तान टाइम्स की ओर से यह जानकारी दी गई है।

पुराने जेट्स की जगह खरीदे थे नए जेट
पुराने पड़ चुके ट्रेनर जेट को हटाने के लिए भारत ने 123 हॉक ट्रेनर जेट्स खरीदे थे। इसमें से 106 जेट आईएएफ और 17 इंडियन नेवी के लिए थे। इन जेट्स को साल 2004 में ब्रिटिश कंपनी बीएईएस से खरीदा गया था। इन जेट्स में 123 फ्लाइवे कंडीशन में खरीदा गया था तो बाकी जेट्स को हिन्दुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) की ओर से एसेंबल किया जाना था। टेक्नोलॉजी ट्रांसफर के बाद इंजन को भी यहीं तैयार किया गया था। इस डील की कुल लागत दो बिलियन डॉलर थी और तीन चरणों में एयरक्राफ्ट ऑर्डर किए गए थे। मार्च 2004 से इनकी डिलीवरी भारत को शुरू हो गई थी। ऑडिट में कहा गया है कि एयरक्राफ्ट के साथ समस्या यही है कि इन्हें भारत में एसेंबल किया गया। वहीं इंजन भी दोयम दर्जे की क्वालिटी वाले थे। ऑडिट रिपोर्ट के मुताबिक बड़ी संख्या में सेकेंड हैंड कंपोनेंट्स और पार्ट्स को एयरक्राफ्ट में फिट किया गया था।

500 करोड़ का कमीशन और क्वालिटी पर समझौता
भारत की ओर से एजेंट्स को शामिल करने से इनकार कर दिया गया था, इसके बाद भी एक मीडिलमैन इस डील में शामिल था। ऑडिट में अनुमान लगाया गया है कि डील में करीब 500 करोड़ रुपए का गैर-कानूनी कमीशन भी दिया गया। ऑडिट रिपोर्ट में कहा गया है कि फाइंडिग्ंस में इंजन की क्वालिटी पर कमीशन और समझौते की बातें सामने आई हैं। इसकी वजह से इंजन की क्वालिटी पर खासा असर पड़ा। सीबीआई को कमीशन के आरोपों की जांच करने को कहा गया था और सबसे पहले ब्रिटिश मीडिया ने इस मामले को रिपोर्ट किया था। केस की जांच अभी तक जारी है। आईएएफ, एचएएल और डीजीक्यूए यानी डायरेक्टोरेट जनरल ऑफ क्वालिटी अश्योरेंस जो कि रक्षा मंत्रालय का हिस्सा है, स्वतंत्र रूप से उपकरणों की क्वालिटी की जांच करता है। रिपोर्ट की मानें तो ऐसा लगता है कि इन्होंने भी इस पूरे मामले पर आंखें बंद कर ली थी।

वायुसेना से लेकर एचएएल तक चुप
ऑडिट रिपोर्ट के मुताबिक भारत ने जिस इंजन के लिए कॉन्ट्रैक्ट किया था उसे सर्विसिंग और ओवरहालिंग से पहले 2000 घंटे की फ्लाइंग के लिए प्रयोग किया जा सकता था। जो इंजन भारत आए उन्हें 1000 घंटे की फ्लाइंग के लिए ही सही माना गया और इतने समय के बाद इनकी ओवरहॉलिंग करनी पड़ती थी। लेकिन इस मुद्दे को कवरअप करने के लिए एचएएल, आईएएफ और डीजीक्यू की ओर से बयान जारी किया गया। इस बयान में कहा गया कि एरो इंजन की लाइफ 1,400 घंटों की होती है न कि 2,000 घंटों की। इस पूरे मामले पर न तो एचएएल और न ही आईएएफ की ओर से कोई जवाब अभी तक दिया गया है।












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