India-China tension:दिल्ली-मेरठ RRTS प्रोजेक्ट में भी चाइनीज कंपनी पर लग गया ग्रहण
नई दिल्ली- दिल्ली-मेरठ रैपिड रेल ट्रांजिट सिस्टम के अंडरग्राउंड सेक्शन के लिए चीन की एक बड़ी कंपनी ने ही सबसे कम बोली लगाई थी और लगभग यह तय माना जा रहा था कि इसका ठेका शंघाई टनेल इंजीनियरिंग कंपनी (STEC) को ही मिलेगा। केंद्र सरकार की ओर से इसके संकेत भी मिल रहे थे। लेकिन, अब केंद्रीय शहरी विकास मंत्रालय ने स्पष्ट कर दिया है कि टेंडर की प्रक्रिया अभी पूरी नहीं हुई और किसी की भी बोली फाइनल नहीं हुई है। मतलब, इशारा समझें तो चीन की कंपनी को यह ठेका मिलने पर अब ग्रहण लग चुका है। शहरी विकास मंत्रालय की ओर से यह टिप्पणी ऐसे वक्त में आई है जब पूर्वी लद्दाख की गलवान घाटी में भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच हुई हिंसक झड़पों में भारतीय सेना के एक कर्नल समेत 20 जाबांज सैनिक शहीद हो गए हैं और इसको लेकर चीन के खिलाफ पूरा देश गुस्से से उबल रहा है।

दिल्ली-मेरठ RRTS प्रोजेक्ट में चाइनीज कंपनी की नो एंट्री!
केंद्रीय शहरी विकास मंत्रालय ने कहा है कि 82 किलोमीटर लंबी आरआरटीएस प्रोजेक्ट का निर्माण नेशनल कैपिटल रीजन ट्रांसपोर्ट कॉर्पोरेशन के जिम्मे है और इसकी फंडिंग एडीबी कर रहा है। इसके मुताबिक इस प्रोजेक्ट के लिए 12 जून को वित्तीय बोली खोली गई और चाइनीज कंपनी एसटीईसी ने सबसे कम बोली लगाई। अब मंत्रालय ने कहा है कि 'टेंडर की प्रक्रिया अभी चल ही रही है और यह फाइनल नहीं हुआ है।' मतलब पिछले दो दिनों से मोदी सरकार ने जिस तरह के फैसले लिए उससे संकेतों में समझा जाय तो चीन की कंपनी को यह प्रोजेक्ट मिलना अब मुश्किल लग रहा है। हालांकि, मंत्रालय की ओर से ये भी कहा गया कि एडीबी/ वर्ल्ड बैंक/मल्टी-लैटेरल प्रोक्योरमेंट गाइडलाइंस के चलते किसी कंपनी या देश के साथ भेदभाव नहीं की जा सकती है।

स्वदेशी जागरण मंच पहले से ही कर रहा है मांग
बता दें कि गलवान घाटी की घटना से पहले से ही राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से जुड़ी संस्था स्वदेशी जागरण मंच इस प्रोजेक्ट का ठेका चाइनीज कंपनी को नहीं देने की मांग कर रहा है। यही नहीं कांग्रेस के नेता और पार्टी प्रवक्ता रणदीप सिंह सुरजेवाला भी चाइनीज कंपनी को ठेका मिलने की संभावना के आधार पर मोदी सरकार की आत्मनिर्भर भारत योजना की खिल्ली उड़ा चुके हैं। लेकिन, केंद्रीय सड़क एवं परिवहन मंत्रालय की ओर से यह संकेत दिए जा रहे थे कि अगर नीलामी की प्रक्रिया में कंपनी ने कोई धांधली नहीं की है तो उसका ठेका नहीं रोका जा सकता। लेकिन, लगता है कि लद्दाख में चीन की करतूत के बाद सरकार सचेत हो गई है। उसने पहले टेलीकॉम कंपनियों को चाइनीज उपकरणों से दूर रहने को कहा, फिर ईस्टर्न फ्रेट कॉरिडोर में सिंग्नलिंग सिस्टम लगा रहे चीनी कंपनी से किनारा किया और अब लगता है कि दिल्ली-मेरठ हाई स्पीड रेल परियोजना से भी ड्रैगन को निकालने का रास्ता ढूंढ़ रही है।

5.6 किलोमीटर के अंडरग्राउंड प्रोजेक्ट के लिए बोली
बता दें कि दिल्ली-मेरठ आरआरटीएस प्रोजेक्ट के अंडरग्राउंड सेक्शन के लिए 1,126 करोड़ रुपये की सबसे कम बोली चाइनीज मल्टीनेशनल कंपनी शंघाई टनेल इंजीनियरिंग कॉर्पोरेशन लिमिटेड ने लगाई है। उसने 82 किलोमीटर लंबी हाई स्पीड रेल परियोजना के दिल्ली के न्यू अशोक नगर से गाजियाबाद के साहिबाबाद के बीच 5.6 किलोमीटर के अंडरग्राउंड सेक्शन के लिए सबसे निचली बोली लगाई है। इसके लिए टाटा प्रोजेक्ट लिमिटेड ने भी कोरियाई कंपनी SKEC JV के साथ मिलकर बोली लगाई थी। इनके अलावा तीन कंपनियां और बोली में शामिल थीं। नेशनल कैपिटल रीजन ट्रांसपोर्ट कॉर्पोरेशन लिमिटेड के मुताबिक, इसके लिए एल एंड टी ने 1,170 करोड़, Gulermak ने 1,326 करोड़, टाटा प्रोजेक्ट्स लिमिटेड ने 1,346 करोड़ और अफ्कॉन्स इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड ने 1,400 करोड़ रुपये की बोली लगाई है। जिस कंपनी को यह ठेका मिलेगा उसे यह काम तीन साल में पूरा करके देना है।












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