गलवान में आक्रामक चीन, कहीं जिनपिंग के तीसरे कार्यकाल की तैयारी तो नहीं?
भारत और चीन की सेनाओं के बीच तनाव की शुरुआत वर्ष 2020 के मई महीने में हुई जब पूरा विश्व कोरोना की पहली लहर की चपेट में आ चुका था. इसके बाद तनाव और भी बढ़ता गया और उसे कम करने के प्रयासों के भी कई दौर अभी तक चलते ही आ रहे हैं.
मगर हाल ही में 'पैंगॉन्ग त्सो' झील पर कथित तौर पर चीन के पुल बनाने की खबरें हों या गलवान घाटी में अपना झंडा फहराने की बात हो, भारत से लगी अपनी अघोषित सीमा पर चीन ने एक बार फिर से ज़ोर आजमाईश शुरू कर दी है.
इसको लेकर कूटनीतिक और राजनीतिक हलकों में चर्चा भी हो रही है. ये सवाल भी उठ रहे हैं कि कहीं चीन ये सब कुछ जान बूझ कर तो नहीं कर कर रहा है?
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इन सब घटनाओं पर भारत के रुख़ पर भी बहस छिड़ी हुई है. कांग्रेस और विपक्षी दल भारत पर लगातार आक्रमण कर रहे हैं, मगर सरकार की ओर से अभी तक बहुत संयमित प्रतिक्रिया आई है.
सामरिक और विदेश मामलों के जानकारों को लगता है कि जैसे जैसे चीन में सत्ताधारी कम्युनिस्ट पार्टी की महत्वपूर्ण 'नेशनल पीपल्स कांग्रेस' का समय क़रीब आ रहा है,वैसे वैसे चीन की तरफ़ से इसी तरह की उकसाने वाली घटनाएं और भी बढ़ जाएँगी. चीन में 'नेशनल पीपल्स कांग्रेस' इसी वर्ष होनी है.
'ऐतिहासिक तीसरे कार्यकाल' के लिए उतरेंगे जिनपिंग
जानकार कहते हैं कि ये साल, यानी 2022, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के लिए बहुत ज़्यादा महत्वपूर्ण है क्योंकि इसी साल वो 'ऐतिहासिक तीसरे कार्यकाल' के लिए मैदान में उतरेंगे.
हालांकि पिछले साल नवंबर में ही चीन की कम्युनिस्ट पार्टी ने अपने सौ साल पूरे होने पर सत्ता की कमान संभाले रखने के लिए निर्धारित दो कार्यकालों की सीमा सो समाप्त तो किया ही था साथ ही 'सेंट्रल मिलिट्री कमीशन' यानी देश की सेना की बागडोर भी जिनपिंग के हाथों में सौंप दी थी.
जानकार मानते हैं कि चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के इस निर्णय से शी जिनपिंग के लिए तीसरे कार्यकाल का रास्ता आसान हो गया है.
लेकिन लंदन स्थित 'किंग्स कॉलेज' में अंतरराष्ट्रीय मामलों के विभागाध्यक्ष हर्ष वी पंत ने बीबीसी से बात करते हुए कहा कि तीसरे कार्यकाल के लिए जाना शी जिनपिंग के लिए भी काफ़ी मायने रखता है.
वो कहते हैं, "ये उतना आसान भी नहीं है क्योंकि शी जिनपिंग पर पहले ही काफ़ी दबाव बन चुका है. कम्युनिस्ट पार्टी के अंदर भी और देश में भी. उन्हें अपने आलोचकों को शांत भी करना होगा और देश के लोगों के बीच भी अपनी छवि एक राष्ट्रवादी नेता के रूप में मज़बूत करनी होगी. ये 'नेशनल पीपल्स कांग्रेस' से पहले उनके सामने सबसे बड़ी चुनौतियाँ हैं."
जानकार कहते हैं कि न सिर्फ़ अपने देश, बल्कि शी जिनपिंग के सामने अपने अंतरराष्ट्रीय सहयोगी देशों के बीच भी अपनी पैठ बनाए रखने या उसे और भी ज्यादा मज़बूत बनाने की चुनौती भी है.
क्या ठीक नहीं हैं चीन के घरेलू हालात?
विदेश और सामरिक मामलों के विशेषज्ञ ब्रह्मा चेल्लानी ने अपना एक लेख ट्वीट किया है जिसमें उनका कहना है कि चीन की कम्युनिस्ट पार्टी पहले से ही 'अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों को ताक़ पर' रखती आ रही है.
https://twitter.com/Frank_L_Craig/status/1478180209643991042
वो लिखते हैं कि 'शी जिनपिंग के नेतृत्व में चीन ने कमज़ोर देशों की संप्रभुता को भी प्रभावित करने की कोशिश की है. यहाँ तक कि लिथुआनिया जैसे दशों को चीन में अपने दूतावासों को बंद' करने तक के लिए मजबूर कर दिया गया.
चेल्लानी के अनुसार चीन एकमात्र ऐसा देश है जिसने व्यापार को भी 'वेपनाइज़' यानी व्यापार का भी एक तरह से 'सैन्यकरण' कर दिया है. वो ताइवान की तरफ़ संकेत देते हुए कहते हैं कि जिन देशों ने ताइवान के साथ बेहतर सबंध या व्यापारिक संबंध बनाए रखे, चीन ने उन देशों को भी अपने निशाने पर रखा हुआ है.
सामरिक मामलों के जानकार ये भी मानते हैं कि चीन ने सूचनाओं को देश से बाहर जाने पर तामाम रोक लगाई हुई है लेकिन इसके बावजूद जो खबरें छन कर आ रहीं हैं वो संकेत दे रहीं हैं कि चीन के घरेलू हालात भी ठीक नहीं है.
उनका मानना है कि कोरोना की पहली लहर में चीन ने अपने नागरिकों पर तो पाबंदियां लगाईं ही, तीसरी लहर में उसने दो बड़े शहरों की बड़ी आबादी को 'कड़े लॉक-डाउन' में रखा, और इन्हें लोगों के बीच अलोकप्रिय क़दम के रूप में देखा जा रहा है.
भारत का रुख़
मगर चुनावी माहौल के बीच भारत के राजनीतिक हलकों में भी अब सवाल उठने लगे हैं. कांग्रेस सहित विपक्ष की पार्टिया सवाल उठा रहीं कि चीन वर्ष 2020 के मई महीने से लगातार आक्रामक तेवर अपनाए हुए है लेकिन सरकार की तरफ़ से कड़ी प्रतिक्रिया क्यों हैं आ रही है ?
उस पर पंत कहते हैं कि भारत का जो अब तक का रुख है वो सामरिक रूप से ठीक ही है.
हालांकि वो ये तो मानते हैं कि गलवान और पैंगॉन्ग त्सो की घटनाएं ऐसी थीं जिनपर कड़ी प्रतिक्रिया होनी चाहिए थीं. लेकिन वो ये भी कहते हैं कि चूँकि कई राज्यों में विधानसभा के चुनाव होने वाले हैं इस लिए सत्तारूढ़ सरकार कोई बयान देकर अपने दल के लिए मुश्किलें नहीं खड़ी करना चाहती होगी.
पंत का कहना है कि अगर चीन सरहद के पास अपने इलाकों में पुल या हेलीपैड बना रहा है तो भारत उसमें क्या कर सकता है.
https://www.youtube.com/watch?v=DOUzG6Fbbxc
वो कहते हैं,"अभी तक भारत अपनी सैन्य क्षमताओं के हिसाब से ही कार्यवाही करता रहा है जो इसलिए भी ठीक है कि चीन के साथ सरहद पर माहौल ज़्यादा ख़राब नहीं हो रहा है और इसी बीच भारत चीन के साथ पैदा होने वाले तनाव को कम भी कर रहा है."
सामरिक मामलों के अन्य जानकार अमेरिका का उदाहरण देते हैं और कहते हैं कि अमेरिका ताइवान को सैन्य प्रशिक्षण भी दे रहा है मगर चीन के ख़िलाफ़ वहाँ कुछ नहीं कर रहा है.
उनका कहना है कि कूटनीति किसी दूकान के बही खाते के तरह नहीं बल्कि पेचीदा होती है. इसे समझना भी मुश्किल है और इसपर किसी नतीजे पर पहुंचना भी मुश्किल होता है.
हालांकि भारत में विपक्षी दल इसको लेकर सरकार की आलोचना कर रहे हैं. वो चाहते हैं कि भारत सरकार को चाहिए कि वो चीन द्वारा उठाये गए आक्रामक क़दमों का जवाब उसी तरह से दे.
लेकिन सामरिक हलकों में चर्चा है कि भारत ने अब तक जो रुख़ अपनाया हुआ है उसपर ही क़ायम रहे और शी जिनपिंग को 'नेशनल पीपल्स कांग्रेस' से पहले कोई मौक़ा न दे कि वो इसको अपने फ़ायदे के लिए भुना सकें.
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