इंडिया बैंकिंग कॉन्क्लेव: बैंकों के लिए क्या बेहतर, निजीकरण या विलय?
नई दिल्ली। बैंकिंग सेक्टर के लिए क्या सबसे बेहतर है, मर्जर या निजीकरण? क्या सरकार को बैंकिंग सेक्टर से दखल खत्म कर निजी हाथों में सौंप देना चाहिए? लेकिन एक सवाल यह भी है कि क्या दखल खत्म होने के बाद सरकार बैंकों के जरिए लागू होने वाली योजनाओं पर काम करा सकेगी? इन सवालों के जवाब आसान नहीं हैं। ये बेहद कठिन सवाल हैं जो आज के दौर में खड़े हुए हैं। इन्हीं सब सवालों के जवाब तलाशे जाएंगे इंडिया बैंकिंग कॉन्क्लेव 2018 में। 23 और 24 अगस्त को नई दिल्ली स्थित आईटीसी मौर्या के कमल महल में आयोजित होने वाले इस कॉन्क्लेव का आयोजन सेंटर फॉर इकनॉमिक पॉलिसी एंड रिसर्च (सीईपीआर) की ओर से कराया जा रहा है, जिसका नॉलेज पार्टनर नीति आयोग है।

मंगलवार को नई दिल्ली स्थित कॉन्स्टीट्यूशनल क्लब में इंडिया बैंकिंग कॉन्क्लेव 2018 के चीफ एडवाइजर और भारतीय जनता पार्टी इकनॉमिक अफेयर्स के राष्ट्रीय प्रवक्ता गोपाल कृष्ण अग्रवाल ने बताया कि कार्यक्रम के हर सेशन में चार प्रमुख क्षेत्रों के लोगों को पैनल डिस्कशन में रखा गया है। पहला- पब्लिक सेक्टर बैंक, दूसरा- रेगुलेटर साइड से, तीसरा- कन्ज्यूमर साइड और चौथा- रिसर्चर। इस प्रकार से हर प्रकार का नजरिया सामने आएगा और अच्छा निष्कर्ष निकालने में मदद मिलेगी।
गोपाल कृष्ण अग्रवाल ने बताया कि इंडिया बैंकिंग कॉन्क्लेव 2018 में निजीकरण बनाम मर्जर पर भी डिबेट रखी गई है। इन दिनों इस मुद्दे पर काफी बहस चल रही है। आने वाले समय में क्या सही है? क्या निजीकरण की ओर बढ़ा जाए या मर्जर सही रास्ता है। जैसा कि कुछ दिनों पहले एसबीआई में कई बैंकों का मर्जर किया गया। पब्लिक सेक्टर बैंक हैं, प्राइवेट सेक्टर बैंक हैं, रूरल बैंक हैं, अर्बन बैंक हैं। क्या इन्हें निजी हाथों में सौंपा जाना चाहिए या इनका मर्जर किया जाए? यह बड़ा सवाल है, इस पर व्यापक बहस की जरूरत है।
गोपाल कृष्ण अग्रवाल ने बताया कि कॉन्क्लेव में एक और अहम मुद्दे पर चर्चा होनी है। क्या सरकार को बैंकिंग सेक्टर से बाहर आकर और इसे निजी हाथों में सौंप देना चाहिए? क्या सरकार को सारा दखल ही खत्म कर देना चाहिए? लेकिन एक तर्क यह भी है कि सरकार को योजनाएं लागू करने के लिए बैंकों की मदद चाहिए। ऐसे में अगर सरकार बैंकों से सरकार का दखल खत्म हो जाएगा तो क्या योजनाओं को लागू करना संभव हो सकेगा?
इंडिया बैंकिंग कॉन्क्लेव 2018 के फर्स्ट सेशन में इंडियन डेब्ट, इंडियन प्रॉब्लम और इंडियन सोल्यूशन पर चर्चा होगी। डिवेलपमेंटल फाइनेंशियल इंस्टीट्यूशन का कमर्शियल बैंकिंग में आना सही है?
'फंडिग ऑफ अनफंडेड' जैसे मुद्दों पर भी कॉन्क्लेव में फोकस रहेगा। इंडिया बैंकिंग कॉन्क्लेव 2018 में कार्यक्रम में केंद्रीय मंत्री अरुण जेटली, पीयूष गोयल, सुरेश प्रभु समेत बैंकिंग सेक्टर की कई हस्तियां मौजूद रहेंगी। इंडिया बैंकिंग कॉन्क्लेव 2018 के आयोजन में जो भी बातें निकलकर सामने आएंगी उन पर सीईपीआर और नीति आयोग दोनों रिपोर्ट तैयार करेंगे और सरकार को सौपेंगे।
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