लोकसभा चुनाव 2019: राबड़ी के गांव में लालू से क्यों नाराज हैं लोग?
नई दिल्ली- लोकसभा चुनाव 2019 में बिहार में लालू यादव (Lalu Yadav) की कमी साफ नजर आ रही है। आरजेडी (RJD) या गठबंधन की कमान लालू संभाल रहे होते, तो चुनावी दंगल थोड़ा ज्यादा रसीला हो सकता था। खैर, ये तो हो गई उनके अलग अंदाज वाले बयानों की बात। लेकिन, तथ्य यह है कि लालू की गैर-मौजूदगी का असर उनके गठबंधन या विरोधियों की राजनीति पर ही नहीं पड़ रही है। उनके गांव से लेकर ससुराल तक में उसका असर महसूस किया जा रहा है। अलबत्ता कारण अलग-अलग हो सकते हैं और उन्हें देखने का नजरिया भी अलग-अलग हो सकता है। आइए समझने की कोशिश करते हैं कि चुनाव मुहिम से लालू के नदारद रहने का असर क्या हुआ है और उनके ससुराल में उनकी जगह मोदी और नीतीश के नाम की बयार क्यों बह रही है?

लालू की गैर-मौजूदगी का चुना में बड़ा असर
यह बात तो कोई भी समझ सकता है कि लालू यादव (Lalu Yadav)जैसे नेता का बिहार के चुनाव में सक्रिय नहीं रहने के मायने क्या हैं। इसलिए, लालू, उनके परिवार और उनके गठबंधन के नेताओं ने बहुत कोशिश की भी, कि किसी तरह से उन्हें कुछ वक्त के लिए जमानत मिल जाय और वे गठबंधन को संभाल सकें। लेकिन ऐसा नहीं हो पाया। जब टाइम्स ऑफ इंडिया ने सोशल साइंटिस्ट (Social scientist) शैबल गुप्ता (Shaibal Gupta) से यही सवाल किया कि लालू की अनुपस्थिति से महागठबंधन पर कितना असर पड़ेगा? तो उन्होंने जो कुछ कहा उसका लब्बोलुआब यही है कि गठबंधन में उनसे बड़ा क्राउड-पुलर (crowd-puller) कोई नहीं है। उन्होंने बताया कि लोगों तक मैसेज पहुंचाने की उनकी कला गजब की है, जिसकी भरपाई नहीं हो पा रही है। यही नहीं, उन्होंने ये भी बताया कि लालू एक दिन में सात-आठ सभाएं तक कर लेते, लेकिन उनके बेटे और बिहार में एनडीए-विरोधी गठबंधन के सबसे बड़े चेहरे तेजस्वी यादव (Tejashwi) बमुश्किल चार-पांच ही कर पा रहे हैं।

लालू गैर-मौजूदगी से आरजेडी गठबंधन की दिक्कत
जानकार बता रहे हैं कि कैंपेन से लालू यादव (Lalu Yadav) के गायब होने का असर महागठबंधन के काम और परफॉर्मेंस पर भी पड़ना स्वाभाविक है। मसलन, यूपी में जिस तरह से माया-अखिलेश एक-दूसरे के वोट को दोनों पार्टियों में ट्रांसफर करवा पाने में कामयाब होते दिख रहे हैं, बिहार में उसकी सफलता को लेकर आशंका महसूस की जा रही है। लेकिन, अगर लालू सक्रिय होते, तो पूरी तरह से तस्वीर अलग होती। लालू के प्रभाव और दबाव दोनों का असर होता। इसलिए, एक्सपर्ट मानते हैं कि बिहार में एनडीए की तुलना में महागठबंधन का ढांचा बड़ा जरूर है, यानी आरजेडी (आरजेडी), कांग्रेस (Congress),'हम' (HAM),वीआईपी(VIP) और राष्ट्रीय लोक समता पार्टी (RLSP). लेकिन इनकी सोशल इंजीनियरिंग की कामयाबी पर संदेह जरूर पैदा हो रही है।
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लालू की गैरहाजिरी में बिहार में एनडीए कहां है?
बिहार में एनडीए का पूरा फोकस मोदी-सेंट्रिक कैंपेन (Modi-centric) पर है। नीतीश फैक्टर (Nitish Factor) उसे और मजूबती दे रहा है। लेकिन, इनके विरोध में लालू मैदान में होते एनडीए को इतना एडवांटेज नहीं मिल पाता। एक्सपर्ट की ये भी राय है कि बगैर लालू वाले महागठबंधन की तुलना में बिहार में एनडीए का तालमेल कहीं बेहतर है। इसका कारण ये है कि बीच के कुछ वर्षों को छोड़ दें तो नीतीश और बीजेपी का गठबंधन दशकों पुराना है। राम विलास पासवान (Ram Vilas Paswan) भी पिछले पांच साल से मोदी के साथ डटे हुए हैं।

लालू के ससुराल वाले उनसे क्यों नाराज हैं?
सबसे चौंकाने वाली ग्राउंड रिपोर्ट तो गोपालगंज (Gopalganj) जिले में राबड़ी देवी ((Rabri Devi)) के मायके सेलर कलां की है। इस गांव के लोग अपने दामाद और राबड़ी देवी (Rabri Devi) के पति लालू यादव (Lalu Yadav)से बहुत ही नाखुश हैं और मोदी-नीतीश के तारीफ में कसीदे पढ़ रहे हैं। लालू के ससुराल के 76 साल के बुजुर्ग बिश्वेश्वर नाथ सिंह लालू के खिलाफ अपनी भड़ास इस तरह से निकाल रहे हैं- "चोरी कर रहे हैं, घोटाला कर रहे हैं, तो जेल जाएंगे ही। मोदीजी में ही देश की सुरक्षा है।" उसी गांव के 40 साल के गुलाबजी कुमार कहते हैं, "फुलवरिया के लोगों को सरकारी नौकरी मिली, हमें कुछ नहीं मिला।" मस्कट में इलेक्ट्रिशियन कुमार अपने गांव की तुलना पड़ोस में लालू के पुश्तैनी गांव फुलवरिया से कर रहे हैं। हैरानी की बात है कि राबड़ी के गांव की महिलाएं भी लालू परिवार का समर्थन नहीं करतीं। परमीला देवी लालू के राजनीतिक विरोधी नीतीश के कामों का बखान करती हैं। वो कहती हैं, "उन्होंने राज्य को शिक्षित बनाया है। इसके इलावा शराबबंदी की है, उनके इस स्वागत योग्य कदम के लिए उन्हें महिलाओं का समर्थन हासिल है।" दरअसल, यहां के लोगों की शिकायत है कि लालू ने अपने गांव में तो बहुत काम किया है, लेकिन ससुराल के साथ सौतेला रिश्ता अपनाया है।

लालू के गांव में उन्हें मिस कर रहे हैं लोग
लालू के अपने गांव फुलवरिया की कहानी पूरी तरह से जुदा है। यहां के लोगों में उनके प्रति नाराजगी नहीं, सहानुभूति है। दोनों गांव गोपालगंज (सुरक्षित) लोकसभा क्षेत्र में है। लालू के पांच भाइयों में से एक गुलाब यादव (अब इस दुनिया में नहीं हैं) के बेटे 18 साल के प्रदीप यादव का दावा है कि फुलवरिया में जो भी काम हुए हैं, वो लालू के कार्यकाल में हुए। उनका कहना है कि, "लालू चाचा के बाद इस गांव में कोई काम नहीं हुआ है। उन्हें राजनीतिक साजिश के कारण जेल हुई और इसको लेकर लोगों में गुस्सा है।" किसान मुन्ना कुमार यादव भी लालू के भतीजे की बात में हामी भरते हैं, "लालूजी के खिलाफ साजिश रचने के लिए हम मौजूदा सरकार से बहुत नाराज हैं। जगन्नाथ मिश्रा (पूर्व सीएम, बिहार) को उसी चारा घोटाले में इसलिए जमानत मिल गई, क्योंकि वे ऊंची जाति से थे और उनके बेटे बीजेपी में हैं। लालूजी के लिए लोगों में सहानुभूति है, जो चुनाव में भी दिखाई पड़ेगा।" सत्तर बसंत देख चुके सुखदेव राम दावा करते हैं कि लालू ने हर समाज के लिए काम किया, "हमारे बचपन में मैं गांव में लालू के साथ मवेशी चराता था। इस गांव में यादव, तेली, भूमिहार, ब्राह्मण और पासवान के अलावा दूसरों की भी आबादी है। जो भी विकास हुआ है, वह इन सबके लिए हुआ है। लालू ने हमेशा गरीबों के लिए काम किया है, चाहे वे कोई भी जाति के हों।" आज लालू के गांव में एक रेलवे स्टेशन (यहां दिन में एक पैसेंजर ट्रेन रुकती है) और हेलिपैड भी है। उनकी मां मरचिया देवी के नाम पर एक रेफरल अस्पताल भी है। एक जमीन रजिस्ट्री ऑफिस, बैंक, पोस्ट ऑफिस और सरकारी स्कूल भी है।












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