कांग्रेस को भारी पड़ेगा मायावती का अकेले लड़ना, राहुल गांधी ने गंवाया एक और मौका
नई दिल्ली। बसपा सुप्रीमो मायावती ने 2019 लोकसभा चुनाव से पहले होने जा रहे मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव में कांग्रेस से अलग होकर लड़ने का ऐलान किया है। मायावती ने सोनिया गांधी और राहुल गांधी पर भरोसा जताया, लेकिन दिग्विजय सिंह को जमकर कोसा। बसपा सुप्रीमो ने दिग्विजय सिंह को भाजपा और संघ का एजेंट तक बता डाला। छत्तीसगढ़ में मायावती पहले ही अजीत जोगी की जनता कांग्रेस के साथ गठजोड़ का ऐलान कर चुकी हैं और राजस्थान, मध्य प्रदेश में वह अकेले चुनाव मैदान में उतरेंगी। मायावती का यूं अकेले चुनाव लड़ना बीजेपी के लिए बड़ी राहत लेकर आया है, लेकिन कांग्रेस के लिए किसी झटके से कम नहीं हैं। खुद कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने गठबंधन को अचूक हथियार बनाकर 2019 लोकसभा चुनाव में बीजेपी को चुनौती देने की बात कही थी, लेकिन एक बार फिर वह असफल साबित हुए हैं।

आगे बढ़कर नेतृत्व नहीं कर पा रहे राहुल गांधी
मायावती के साथ आने से चुनाव परिणामों पर क्या असर पड़ सकता है, इसका उदाहरण उत्तर प्रदेश के गोरखपुर, फूलपुर और कैराना उपचुनाव में सामने आ चुका है। यह बात सच है कि कांग्रेस की ओर से मायावती को साथ लाने के काफी प्रयास हुए, लेकिन क्या ये प्रयास यही दिशा में किए गए? तो जवाब है- नहीं। राहुल गांधी ने गठबंधन की अहमियत को जानते हुए भी खुद आगे बढ़कर बातचीत में हिस्सा नहीं लिया। मायावती की बात करें तो उनसे बातचीत का जिम्मा मध्य प्रदेश के चुनाव प्रभारी कमलनाथ और वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह को सौंपा गया था। मायावती राजनीतिक मोल-तोल के मामले में बेहद सख्त हैं, ऐसे में कांग्रेस को सजगता के साथ बर्ताव करने की जरूरत थी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। राहुल गांधी के विधानसभा चुनाव में कुछ सीटों का त्याग करते और खुद बातचीत का जिम्मा उठाते तो बात बन सकती थी। दरअसल, मायावती पैकेज मांग रही थीं, तीन राज्यों वाला पैकेज।

पैकेज के साथ डील करने में सफल नहीं रहे राहुल गांधी
मायावती अगर कांग्रेस के साथ मिलकर मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में चुनाव लड़तीं तो इसका दूरगामी लाभ होता, लोकसभा चुनाव तक कांग्रेस के साथ बसपा के रिश्ते आगे बढ़ते। वैसे भी यूपी महागठबंधन में कांग्रेस की स्थिति बेहद कमजोर है। वहां कांग्रेस को सिर्फ 7 सीटें देने पर चर्चा हो रही है। कांग्रेस को ज्यादा सीटें देने का सबसे ज्यादा विरोध बसपा ही कर रही है। मतलब राहुल गांधी ने एक बार फिर मौका गंवा दिया। कांग्रेस अध्यक्ष मायावती का संकेत समझने में नाकाम रहे। दरअसल, मायावती तीनों राज्यों- मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस के साथ डील करना चाहती थीं। कुछ वैसी ही डील जो एक पूरे पैकेज की तरह हो, लेकिन कांग्रेस अलग-अलग राज्यों के हिसाब से चर्चा करती रही। वो भी अलग-अलग राज्यों के अलग-अलग नेताओं के साथ। राजस्थान के कांग्रेस नेता सचिन पायलट ने तो यहां तक कह दिया कि उन्हें बसपा की जरूरत नहीं है।

अखिलेश यादव से लेनी चाहिए राहुल गांधी को सीख
मायावती के अलग लड़ने के ऐलान के बाद कांग्रेस कह रही है कि उसे बसपा के जाने से खास प्रभाव नहीं पड़ेगा। बसपा 6 प्रतिशत वोट पर 50 सीटें मांग रही थी। चलो कांग्रेस की बात मान लेते हैं, लेकिन सवाल यह है अगर इसी प्रकार से सभी सहयोगी कांग्रेस से छिटकते रहे तो पार्टी के पास 2019 में जो आखिरी उम्मीद बची है, वो भी चली जाएगी। यहां प्रश्न केवल मायावती का नहीं है। क्षेत्रीय दलों में एक भी ऐसा नहीं है जो सीटों को लेकर कड़ा मोल-भाव न करे। यह जिम्मेदारी राहुल गांधी की है, वे सहयोगी दलों को कांग्रेस के साथ जोड़कर रखें, लेकिन वह ऐसा नहीं कर पा रहे हैं। राहुल गांधी को अखिलेश यादव से सीख लेनी चाहिए, जो मायावती को साथ लेकर चल रहे हैं। बावजूद इसके कि मायावती जिंदगी भर मुलायम सिंह यादव को अपना दुश्मन नंबर एक मानती रहीं। राहुल गांधी और सोनिया गांधी के साथ तो मायावती के रिश्ते लंबे समय से बेहतर रहे हैं।

राहुल गांधी की कांग्रेस को खुद से कम जनाधार वाली पार्टी मानकर चल रहे क्षेत्रीय दल
मायावती ने जिस प्रकार से कांग्रेस के सामने कड़ी शर्तें लगाई हैं, यह तो अभी शुरुआत है। 2019 लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के साथ कमोबेश हर क्षेत्रीय दल इसी प्रकार का बर्ताव करेगा, क्योंकि वह जानता है कि कांग्रेस का जनाधार तेजी से
गिरा है। शुरुआत यूपी, बिहार से हो चुकी है। इधर, यूपी महागठबंधन में कांग्रेस को 7 सीटें ऑफर हो रही हैं तो उधर बिहार में आरजेडी उसे सिर्फ 8 सीटें देने का प्रस्ताव दे रही है। मतलब कांग्रेस और खासकर राहुल गांधी के सामने समस्या नेतृत्व की है। राजनीति में हर दल संख्याबल के हिसाब से चलता है। संख्या के हिसाब से आज शरद पवार की पार्टी महाराष्ट्र विधानसभा में कांग्रेस के बराबर है। ऐसे में अब राहुल गांधी पर निर्भर करता है कि वह नेतृत्व क्षमता दिखाएं और आगे बढ़कर सहयोगियों को बताएं कि कांग्रेस पर भरोसा करें, लेकिन विडंबना यह है कि बहुत से क्षेत्रीय दलों को कांग्रेस पर कम और राहुल गांधी अविश्वास ज्यादा है। तेजस्वी यादव पहले इशारा कर चुके हैं कि 2019 में जिस दल की ज्यादा सीटें उसका नेता होगा। अखिलेश भी यही भाषा बोल रहे हैं। ऐसे में राहुल गांधी को बार-बार मौके गंवाने की आदत छोड़नी होगी, क्योंकि अब परीक्षा की घड़ी बेहद निकट आती जा रही है।
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