कई मायनों में मिसाल बना झारखंड का ये 'नशामुक्त-लोटामुक्त' गांव

झारखंड का एक आदिवासी बहुल गांव आराकेरम इन दिनों सुर्खियों में है. दरअसल गांव में बदलाव को लेकर लोगों की प्रतिबद्धता और एकजुटता ने सरकार और साहबों को अपने दरवाजे पर बुला लाया है.
हाल ही में राज्य के मुख्यमंत्री रघुवर दास कई आला अफसरों के साथ आराकेरम गांव पहुंचे थे. मुख्यमंत्री ने वहां चौपाल लगाई. साथ ही नशामुक्त होने के लिए इस गांव को एक लाख रुपए का इनाम भी दिया.
मुख्यमंत्री के दौरे के बाद अफसरों और सरकारी बाबुओं के आराकेरम आने-जाने का सिलसिला जारी है. इससे गांव वालों की उम्मीदों के साथ ज़िम्मेदारी भी बढ़ी है.
आराकेरम के लोगों को इसका भी गुमान है कि पहाड़, जंगल को बचाने, श्रमदान, स्वच्छता, नशाबंदी और सामूहिक फ़ैसले के असर से अब सरकार भी गांव तक पहुंच रही है.
'नशामुक्त गांव'
रांची ज़िले का यह सुदूर गांव पहाड़ों की तराई में बसा है. 110 घरों वाले इस गांव में 70 फ़ीसदी आदिवासी और बाक़ी पिछड़ी जाति के के लोग हैं. खेती और पशुपालन जीने का मुख्य ज़रिया है.
कई महीनों की मुहिम और मशक्कत के बाद गांव वालों ने शराब बनाना और पीना छोड़ दिया है. गांव में घुसते ही आपकी नजरें लोहे की एक बोर्ड पर पड़ेगी, जिसपर लिखा गया हैः मुस्करायें कि आप नशामुक्त आराकेरम गांव में प्रवेश कर रहे हैं.
अब विज्ञापनों के जरिए सरकार ये बताने में जुटी है कि आराकेरम के लोगों ने मिसाल पेश की है. उसी तर्ज पर झारखंड के एक हजार गांवों को आदर्श बनाया जाएगा.
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इकलौते मुस्लिम परिवार के लिए मस्जिद
इस गांव में हुसैन अंसारी का एकमात्र मुसलमान परिवार है. हुसैन साहब का परिवार गांव के सभी घरों के दिलों में बसता है.
ग्राम प्रधान के मुताबिक़ उन लोगों ने परिवार के लिए छोटी ही सही, एक मस्जिद बनाने का फ़ैसला लिया है, ताकि हुसैन चाचा को नमाज़ पढ़ने दूसरे गांव न जाना पड़े.
हुसैन ने गांव में कच्चे-पक्के हर घरों की दीवारों पर गौर करने को कहा. ये दीवारें नीले रंग से रंगी थीं और उन पर जागरूकता के नारे लिखे थे.
उन्होंने कहा कि गांव में श्रमदान रंग ला रहा है. उन्हें सुकून होता है कि ग्राम प्रधान और ग्रामीणों के बीच कोई फासला नहीं है.
साझेदार की भूमिका
शुभंती देवी बताती हैं कि ये मुकाम हासिल करने में ग्राम प्रधान के साथ महिला-पुरुष ने साझेदार की भूमिका अदा की है. अब झगड़े-फसाद नहीं होते. सिर्फ़ तरक्की की बात होती है. जबकि वो दिन हम नहीं भूल सकते जब हड़िया-शराब बनाने के सारे बर्तनों को घरों से इकट्ठे बाहर निकालने के साथ ठठेरे को बुलाकर उसे बेच दिया गया.
गौरतलब है कि शराब और शौचालय झारखंड में बड़े सवाल हैं. सैकड़ों गांवों में शराब बर्बादी की कहानियां भी लिखती रही हैं.
बाबूराम गोप बताने लगे कि वाकई शराब बंद कराना आसान काम नहीं था. लेकिन उनलोगों ने हर परिस्थितियों का सामना किया.
शीशी छोड़ी, ज़िंदगी बदली
गांव के ही रामदास महतो बताते हैं कि वो अधिक पैसे खर्च कर अंग्रेज़ी दारू पीते थे. शराब छोड़ी, तो ज़िंदगी बदलती गई. पैसे बच रहे हैं, तो बच्चों को पढ़ाने और घर की ज़रूरतें भी ठीक से पूरी हो रही हैं.
सिर्फ शिमला मिर्च की खेती से वे सालाना दो लाख तक की कमाई करते हैं. उनके बेटा-बेटी इंजीनियरिंग और बीएड की पढ़ाई कर रहे हैं.
बीएससी पैरा मेडिकल की पढ़ाई कर रही रामदास की एक बेटी सरस्वती छुट्टियों में घर आई हैं. वो अपनी बहनों के साथ खेतों में दिखीं. सरस्वती कहती हैं, ''खेत ही तो उनके जीने और आगे बढ़ने के रास्ते हैं.
बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ
गांव के स्कूल में टीचर अजंता माझी बच्चों और महिलाओं के बीच शिक्षा की ज़रूरतों पर बात कर रही थीं. पता चला कि इस गांव के लिए बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ अहम लक्ष्य है.
इसी गांव की जयंती कुमारी 15 किलोमीटर का सफर तय कर बारहवीं की पढ़ाई करने जाती हैं. उनकी चिंता है कि स्कूल में शिक्षकों की कमी है. साथ ही उनके घर में शौचालय नहीं है.
इंटरमीडिएट के छात्र रूपेश बताते हैं कि तड़के चार बजे ही मंदिर में लगे लाउडस्पीकर के ज़रिए सूचना दी जाती है कि बच्चे उठकर सफ़ाई-पढ़ाई में जुट जाएं. 30 बच्चों की टोलियां इन गलियों-सड़कों पर झाड़ू लगाकर घरों को लौट जाती है.
छह मंत्रों पर जोर
रास्ते में ही हमें ग्राम प्रधान गोपाल बेदिया समेत कई लोग मिले. बताया कि अखड़ा के पास (सामुदायिक भवन) के पास बैठक होने वाली है, क्योंकि कुछ सरकारी सेवक, अधिकारी आने वाले हैं.
हम भी उनके साथ हो चले. गोपाल बेदिया बताने लगे कि हर हफ़्ते गुरुवार को होने वाली ग्राम सभा की बैठकों में सामूहिक फ़ैसले ही उनकी ताक़त है.
इस गांव के लोगों ने झारखंड के कई गांवों के अलावा अन्ना हजारे के गांव रालेगण सिद्धी का भी दौरा किया है. ग्रामीणों ने आपसी सहमति से नवजागृति समिति का गठन किया है.
इसके छह मूल मंत्र हैः श्रमदान, नशाबंदी, लोटा बंदी (खुले में शौच नहीं) चराई बंदी (खेतों में जानवर नहीं चराना) और कुल्हाड़ी बंदी ( पेड़ नहीं काटना). इन मंत्रों को नहीं मानने वाले को सरकारी लाभ से वंचित किया जाता है.
यह सब हुआ कैसे?
ग्राम प्रधान बताने लगे कि यहां जंगल बचाने की मुहिम सालों पुरानी है. तीन साल पहले उन लोगों ने पेड़ों में रक्षासूत्र बांधने का एक कार्यक्रम किया था. तब भारतीय वन सेवा के एक अधिकारी सिद्धार्थ त्रिपाठी आए थे.
मनरेगा आयुक्त की ज़िम्मेदारी संभालने के बाद उस अधिकारी ने हमलोगों को ग्रामसभा की ताक़त और एकजुट होने का अहसास कराया.
ग्रामीण बताने लगे कि सामने पहाड़ से झरने का पानी नीचे गिरता है. श्रमदान के जरिए उस पानी को क़रीब एक किलोमीटर नीचे तक लाया गया है, जो अनमोल है.
साझा खेती करने के मौक़े
गांव में मनरेगा के तहत 84 बकरी शेड और 6 गाय शेड का निर्माण कराया जा रहा है. कई कुओं और डोभा का भी निर्माण हुआ है. क़रीब 15 परिवार ग़रीबी रेखा से नीचे हैं, जिन्हें अगली क़तार में लाने के लिए सरकार ने भरोसा दिलाया है. कुछ घरों में शौचालय का काम बाक़ी है, जो जल्द पूरा होगा.
युवा किसान राजन गोप बताने लगे कि कुछ साल पहले तक यहां बेबसी, ग़रीबी, बेरोजगारी, की छाया साफ़ दिखती थी. लेकिन एकजुटता और दिन- रात की मेहनत अब सफलता में बदलने लगी है. पठारी इलाके में अरहर, उरद, चना, धान, गेंहू, आलू की खेती मामूली नहीं है.
लोग मिलकर जैविक खाद बनाते हैं और जिनके पास जमीन कम है उन्हें साझा खेती करने के मौक़े दिए जाते हैं. एक दूसरे युवा रामकिशुन करमाली सूअर पालन से सालाना तीन लाख की कमाई कर रहे हैं, जबकि कई लोग जर्सी गाय पालकर ज़िंदगी संवार रहे हैं.
'हार्डवेयर से ज्यादा सॉफ्टवेयर की ज़रूरत'
मनरेगा आयुक्त सिद्धार्थ त्रिपाठी इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने के नाते समझते हैं कि गांवों को बदलने के लिए हार्डवेयर से ज्यादा सॉफ्टवेयर की ज़रूरत है.
उन्होंने कहा कि गांव एक बार संगठित होकर आपस में बैठ जाए, फिर वो आगे बढ़ने का रास्ते तय कर लेगा. क्योंकि गांव आपस में बंटता है, तो बिचौलिए हावी होते हैं.
फिर नौकरशाही के भरोसे सबकुछ नहीं बदला जा सकता.
उन्होंने कहा, ''आराकेरम गांव के उन छह मंत्रों पर गौर कीजिएः सब ज़ीरो कॉस्ट पर सफल हो रहा है. लिहाजा इसी तस्वीर के मद्देनजर सरकार दीनदयाल ग्राम स्वावलंबन योजना पर काम करने जा रही है.
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