रब, रोजा और रमजान से जुड़ी 11 ख़ास बातें
बेंगलोर। रमज़ान का पवित्र माह फिज़ा में इबादत और इनायत का खूबसूरत तालमेल सजा रहा है। रोजा क्या है और किस महत्व के साथ इंसान को खुदा से जोंड़ती हैं इस दौरान की गई इबादतें। रोजा का अर्थ तकवा है। इंसान रोजा रख कर अपने आप को ऐसा इंसान बनने की कोशिश करता है, जैसा उसका रब चाहता है।
तकवा यानी अपने आप को बुराइयों से बचाना, और भलाई को अपनाना है। रोजा केवल भूखे प्यासे रहने का नाम नहीं है। कहा जाता है कि रोजा इंसान के हर एक भाग का होता है। रोजा आंख का है, मतलब बुरा मत देखो, गलत बात न सुनो, मुंह से अपशब्द न निकले, हाथ से अच्छा काम ही हो व पांव सिर्फ अच्छाई के रास्ते परही बढ़ें। आइए जानें इस पवित्र माह से जुड़ी कुछ मुख्य बातें-

रोजा
मुस्लिम मान्यताओं के मुताबिक पवित्र कुरान इसी महीने में नाजिल हुआ। इस माह में इबादत की खास जगह है, जहां मुसाफिरों को भी नमाज पढ़ने का जि़क्र है।

अर्थ
फुलवारी शरीफ ऐसा मानते हैं कि मुसलमानों के पवित्र माह रमजान में गुनाहों की माफी होती है, और अल्लाह रहमतों का दरवाजा आपने बंदों के लिए खोलता है। रोजा का अर्थ तकवा है। रोजा रख कर अपने लोग ऐसा इंसान बनने का प्रयास करते हैं, जैसा उसका रब चाहता है।

हर अंग से जुड़ा है रोजा
ऐसा मानते हैं कि रोजा केवल भूखे प्यासे रहने का नाम नहीं है। रोजा इंसान के हर एक भाग का होता है। रोजा आंख का है, मतलब बुरा मत देखो। कान से गलत बात न सुनो। मुंह से अपशब्द न निकले। हाथ से अच्छा काम ही हो। पांव सिर्फ अच्छाई की राह पर चले। कुल मिलाकर बुराई से बचने और भलाई के रास्ते पर चलने का नाम रोजा है।

नहीं होती है भरपाई
इमारत-ए-शरिया के नायब नाजिम मौलाना सोहैल अहमद नदवी ने कहा है कि अगर कोई मुसलमान एक रोजा भी बगैर किसी कारण छोड़ दे तो वह पूरी जिंदगी रोजा रख कर भी उस एक रोजा का उसबाब नहीं पा सकता है यानि भरपाई नहीं कर सकता है।

इफ्तार
रोजे पूरे होने का वक्त तब होता है, जब सूरज डूबता है। रमजान इस्लामी कैलेंडर में नौवां महीना है। सूर्योदय से रोजा रखने के बाद शाम को सूर्यास्त होने के बाद ही इसे खोला जा सकता है।

सपरिवार
शाम को एक साथ इफ्तार करने से पारिवारिक मजबूती आती है। ऐसा माना जाता है कि छोटे बच्चे रोजा नहीं रखते। बीमार, बहुत बुजुर्ग और गर्भवती महिलाओं को भी इससे छूट है।

खरीददारी
इस माह में सिर्फ खाने पीने की ही चीजें नहीं, सजावट और दूसरी चीजों की बिक्री भी बढ़ जाती है क्योंकि रमजान के बाद ईद आती है और ईद मुसलमानों का सबसे बड़ा त्योहार माना जाता है।

दान-धर्माथ पर्व
रमजान के दौरान दान का भी मौसम होता है। खैरात और जकात देने का सिलसिला चल पड़ता है, गरीबों को दान दिया जाता है। जकात यानी धर्मार्थ कुछ पैसे खर्च करना जो कि इस्लाम के पांच स्तंभों में एक है।

रोशनी
रमजान के महीने में चारों तरफ रोशनी दिखती है सिर्फ सड़कों पर ही नहीं, बल्कि घरों की दीवारें भी रोशन हो उठती हैं और हर्षो-उल्लास के साथ उतसव जैसा महसूस करवाती हैं।

आती है ईद
पूरे महीने रोजे रखने के बाद ईद का महीना आता है, जिसे कई लोग मीठी ईद भी बोलते हैं। इस दिन सेवैयां और मीठे पकवान बनते हैं, जो लोग रिश्तेदारों और जानने वालों को खिलाते हैं।

मेहंदी
ईद से ठीक पहले वाली रात को चांद रात भी कहा जाता है। यह लड़कियों के लिए खास दिन होता है वे वे अपने हाथों में सुंदर से सुंदर मेहन्दी रचाती हैं।
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