नरेंद्र मोदी के मॉडल में जुड़ जाएं ये 10 बातें तो भारत में घर-घर होगी बिजली
नई दिल्ली। भारत की बिजली व्यवस्था से विदेशों की बिजली व्यवस्था की तुलना पर कई लेख आपने पढ़ होंगे। अक्सर उम्मदें भरोसे की ओर कदम बढ़ाने का हौंसला देती हैं। आज हम बिजली के खपत और उत्पादन के बीच का अंतर शब्दों और नजरियों के ज़रिए अलग-अलग ढंग से पेश कर रहे हैं।
इस रिपोर्ट में देखिए कि अगर नरेंद्र मोदी सरकार उद्योग धंधों की निर्भरता अक्षय ऊर्जा के उपकरणों पर तय कर दें तो काफी हद तक बिजली संकट से राहत मिल सकती है। तो घुमाएं यह स्लाइडर और जानें कि क्या किया जर्मनी ने जो पैदा होने लगी बिजली ही बिजली-

जर्मनी
जर्मनी दुनिया की पहली ऐसी अर्थव्यवस्था बन गया है जिसे पूरे विश्व में आधुनिक ऊर्जा का मॉडल राष्ट्र कहा जा सकता है। जर्मनी फिलहाल अपनी कुल बिजली का करीब 29 फीसदी अक्षय ऊर्जा स्रोतों से तैयार कर रहा है।

उत्पादन पर खर्च
भारत में कुल संघीय पूंजी का 15 फीसदी या उससे अधिक राशि बिजली उत्पादन पर खर्च किया जाता है तब भी बिजली का संकट। राज्यों का विद्युत बोर्ड पूरी तरह कंगाल हैं, कोयले की भारी कमी है। सब्सिडी का कोई उपयुक्त तरीका नहीं है। योजना आयोग के अनुसार ‘उत्पादन से ज्यादा वितरण में परेशानी' है।

फोटोवोल्टेइक पैनल
फोटोवोल्टेइक पैनल बनाने के मामले में जर्मनी दुनिया में अगुआ है और उसे आकर्षक दाम पर उपलब्ध कराने में भी सफलता पाई है। वैकल्पिक ऊर्जा में सबसे आगे है।

अक्षय ऊर्जा
भारत का सबसे पहला बिजली उत्पादन कंपनी निजी क्षेत्र का था। उस कंपनी का नाम कलकत्ता इलेक्ट्रिक सप्लाई कॉरपोरेश था। वह 1899 में शुरु हुआ था। डीजल से पहली बार बिजली का उत्पादन दिल्ली में 1905 में शुरू हुआ था। अब विकल्प अक्षय ऊर्जा शेष है।

भारत में बढ़ते हैं दाम
फोटोवोल्टेइक पैनलों के ऑर्डर केवल जर्मनी ही नहीं बल्कि इटली और स्पेन जैसे कई दूसरे यूरोपीय देशों से भी बढ़े हैं। 2003 में इससे होने वाले ऊर्जा उत्पादन की कीमत प्रति किलोवॉट 5 यूरो तक पड़ती थी जो 2013 में सस्ती होकर करीब 0.7 यूरो ही रह गई है।

तब से लेकर अब की तस्वीर
मैसूर में 1902 में जल विद्युत उत्पादन केन्द्र बना था। आजादी के समय देश में 60 फीसदी बिजली उत्पादन का काम निजी कंपनियों के हाथ में था जबकि आज लगभग 80 फीसदी बिजली का उत्पादन सरकारी क्षेत्र के हाथों में है और सिर्फ 12 फीसदी बिजली निजी कंपनियों के हाथ में है।

बेहतरीन है विकल्प
राजधानी बर्लिन के आसपास का क्षेत्र ब्रांडेनबुर्ग तो इस मामले में एक मिसाल कायम कर चुका है। यहां इस्तेमाल होने वाली कुल बिजली का करीब 78 फीसदी पवन चक्कियों, फोटोवोल्टेइक पैनलों या बायोमास से ही पैदा किया जाता है।

अक्षय ऊर्जा
साल 2000 में जर्मनी में लागू हुए अक्षय ऊर्जा अधिनियम के कारण एक क्रांतिकारी बदलाव आया। इस नए अधिनियम में फीड-इन-टैरिफ गारंटी नीति लाई गई जिसके अनुसार पवन और सौर ऊर्जा का उत्पादन करने वालों को ऊर्जा की तय कीमत मिलने की गारंटी मिली। नतीजा सकारात्मक निकला।

जारी है विकास का सफर
साल 2013 आते-आते, जर्मनी में स्थापित सौर ऊर्जा क्षमता 114 से बढ़कर 36,000 मेगावॉट और पवन ऊर्जा क्षमता 6,000 से बढ़कर 35,000 मेगावॉट तक पहुंच गई। आधिकारिक योजना कुल ऊर्जा में अक्षय ऊर्जा की हिस्सेदारी को 2020 तक 35 फीसदी तक और 2050 तक करीब 80 फीसदी तक बढ़ाने की है।

भारत में घटी खपत, फिर भी बिजली संकट
भारत में उद्योग और व्यापार की तुलना में बिजली की खपत घरेलू और कृषि उत्पाद में ज्यादा होती है। वर्ष 1970-71 में उद्योग जगत 61.6 फीसदी बिजली खपत करता था, जो वर्ष 2008-09 में घटकर 38 फीसदी हो गया। इन आंकड़ों की वजहों को बिजली चोरी से भी जोड़कर देखा गया।












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