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मैं अयोध्या हूं और आज मैं अपनी गलतियों के लिए शर्मिंदा हूं!

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बेंगलुरू। मंदिर-मस्जिद और हिन्दू और मुस्लिम से परे रही अयोध्या कभी भी इस पशोपेश में नहीं रही कि उसकी पहचान क्या है, लेकिन इतिहास गवाह है कि उसकी गोद में पली-बढ़ी संतानें पिछले कई दशक से उसके शरीर के हिस्सों को टुकड़ों में बांटकर अपने- अपने निशां बनाने पर अमादा हैं। मैं अयोध्या हूं, और मैं महज एक जमीन का टुकड़ा भर नहीं हूं, क्योंकि मुझमें जगत का एक पूरा वाग्मय विद्यमान है।

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    Lord Ram की नगरी Ayodhya की कहानी, सुनिए उसी की जुबानी । वनइंडिया हिंदी

    यकीन मानिए, मैं एक सामान्य मां की तरह हूं, जो अपने बच्चों को उसके बचपन में बनाए छोटी-बड़ी लकीरों और निशानों को इसलिए नहीं मिटा सकी, क्योंकि उनसे मेरा वात्सल्य जुड़ा हुआ था। मैं निशानों पर इसलिए भी ध्यान नहीं देती हूं, क्योंकि मैं भेद नहीं करती। मैं मानती हूं कि निशान अस्थायी होते है और उनके स्वरूप समयानुसार बनते- बिगड़ते रहते है।

    मेरे बच्चों, मेरी काया 5000 वर्ष से अधिक पुरानी हो चुकी है, मेरी उम्र ऐसी ही बीती है। मैं आज भी मानती हूं कि मेरे शरीर के अलग-अलग हिस्सों पर बने निशान ही मेरी खूबसूरती है, जिससे मैं संवरती हूं, खूबसूरत दिखती हूं। हालांकि मेरी संतानें अपनी लकीरें बड़ी करने के लिए जब मेरे शरीर को खरोचती हैं, तो पीड़ा होने के बावजूद मैं अपनी दूसरी संतानों को भी पूरे मौके देने से गुरेज नहीं करती ताकि वो भी अपनी लकीर बड़ी कर सकें।

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    ऐसा ही शायद हर मां सहती है, मैं उनसे जुदा कहां हूं। यकीन मानों, मैं अपने बच्चों में भेद नहीं करती, यह अलग बात है कि मेरी संतानें अब रंगों पर जंग करके मेरे ही वजूद को चुनौती दे देती है। मैं न्याय की चौखट तक घसीटी गई, फिर भी फैसलों से नहीं डरती, क्योंकि जंग मेरे शरीर के उस हिस्से की है, जिसकी रक्तधाराएं मेरी सभी संतानों में समान रूप से बहती हैं।

    मैं मां हूं और मेरा धर्म सिर्फ मेरे वात्सल्य से जुड़ा है, जिस पर मेरे सभी संतानों का समान हक है। मैं कभी नहीं बंटी और न बटूंगी। हां थोड़ी बूढ़ी हुई हूं, इसलिए संतानों के झगड़ों पर जानबूझकर कान नहीं देती हूं, क्योंकि जानती हूं कि लड़-झगड़कर दोनों फिर एक साथ बैठेंगे और मैं नाहक किसी का पक्ष लेकर फजीहत झेलूंगी। इसलिए अनसुना कर देती हूं।

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    चूंकि अब जमाना बदल गया है, लेकिन मैं अब भी नहीं भूली हूं, क्योंकि यहां मेरी बेटी सीता को भी दोषी ठहराकर देश निकाला दे दिया गया था, मैं उस दिन भी रोई थी और मैं आज भी रो रही हूं। क्योंकि मैं मानती हूं कि मेरे शरीर के हिस्से भले ही बंट जाएं, लेकिन मैं हमेशा उन सभी की रक्तधाराओं में समान रूप से विद्यमान हूं। अफसोस बस इतना है कि अब कोई अपने दिलों की आवाज नहीं सुनता है।

    मेरे शरीर के हिस्सों पर सबका समान अधिकार है। मेरी कोख से हिंदू धर्म में पूज्य प्रभु श्रीराम से लेकर जैन धर्म धर्म के प्रथम तीर्थंकर की विरासत विद्यमान है। बौद्ध परम्परा का भी अयोध्या में महत्वपूर्ण तीर्थ है, जहां बुद्ध ने ज्ञान प्राप्ति के बाद 45 वर्षों तक धर्मोपदेश दिया और मेरी छाती पर बैठकर 16 वर्ष तक वास किया।

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    करीब 500 वर्ष बाद बौद्ध धर्म की महायान शाखा के अग्रणी आचार्य अश्वघोष मेरी कोख से ही जन्मे थे। 7वीं शताब्दी में चीनी यात्री हेनत्सांग यहां आए, जिन्होंने दुनिया भर को मेरे सुख-समृद्धि के बारे में लोगों को बताया। आज भी मेरे शरीर के विभिन्न हिस्सों पर 20 बौद्ध मन्दिर थे, जहां 3000 से अधिक भिक्षु रहते थे। सिखों के प्रथम, नवम् एवं दशम् सिख गुरु अयोध्या पधारे।

    अयोध्या में गुरुद्वारा ब्रह्मकुंड और गुरुद्वारा गोविंद धाम की जीवन्तता का प्रतीक है। मैं इस्लाम के लिए भी अकीदत का मरकज हूं। मणिपर्वत के निकट वाले हिस्से पर निर्मित शीश पैगम्बर की मजार, स्वर्गद्वार स्थित सैय्यद इब्राहिम शाह की मजार, शास्त्री नगर स्थित नौगजी पीर की मजार किसी परिचय के लिए मोहताज नहीं है। इस्लाम की परम्परा में अयोध्या को मदीनतुल अजोधिया के रूप में भी संबोधित किए जाने का जिक्र मिलता है।

    मेरे ही दामन को छूकर बहने वाली सरयू नदी के किनारे 14 प्रमुख घाट हैं। हर घाट की अपनी एक कहानी है। इनमें गुप्तद्वार घाट, कैकेयी घाट, कौशल्या घाट, पापमोचन घाट, लक्ष्मण घाट आदि विशेष उल्लेखनीय हैं। मन्दिरों में 'कनक भवन' सबसे सुन्दर है। सरयू नदी के निकट नागेश्वर का मन्दिर शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों में शुमार है।

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    'तुलसी चौरा' जहां बैठकर तुलसीदास जी ने रामचरितमानस की रचना आरम्भ की थी। प्रह्लाद घाट के पास गुरु नानक भी आकर ठहरे थे। मैं वही अयोध्या हूं जिसकी गोद में राम खेले थे, जिसकी जमीन पर राम का जीवन खिला था, जिस जमीन पर राम का राज्य था, जहां मंदिर हनुमान का भी हो तो राम की मूरत उसकी शोभा बढ़ाती है। मेरे कोख से जन्में अवतार प्रभु श्रीराम भी जन्मभूमि को लेकर बेहद भावुक थे।

    रामभक्त हनुमान से प्रभु श्रीराम कहते हैं,' अपि स्वर्णमयी लंका न मे लक्ष्मण रोचते, जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी।' यानी हे लक्ष्मण, होगी लंका सोने की लेकिन यह जो सरयू किनारे मेरी जन्मभूमि है, जहां मैं पैदा हुआ, वह मेरी मातृभूमि मेरे लिए स्वर्ग से भी बढ़ कर है। वाल्मीकि रामायण में दर्ज इतिहास को तुलसी दास ने अवधी में अलग तेवर दिए।

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    जब उन्होंने लिखा, जद्यपि सब बैकुण्ठ बखाना। बेद पुरान बिदित जगु जाना। अवधपुरी सम प्रिय नहिं सोऊ। यह प्रसंग जानइ कोउ कोऊ।। जन्मभूमि मम पुरी सुहावनि। उत्तर दिसि बह सरजू पावनि। विडम्बना कहेंगे कि मेरे शरीर के एक हिस्से के लिए मुझे न्यायालय के दहलीज में खींच पर बिठा दिया गया जबकि मरहूम हाशिम अंसारी को भी 'तिरपाल में रामलला को बैठाना बर्दाश्त नहीं था।

    मेरी वो तारीखें याद है जब 23 दिसंबर, 1949 को हज़ारों लोग मेरे शरीर के एक हिस्से पर इकट्ठा हो गए और उस हिस्से को अपना-अपना कहने लगे। 16 जनवरी, 1950 को मेरे शरीर के उस हिस्से में विराजमान रामलला के दर्शन के लिए के लिए रामभक्त उमड़ पड़े और दर्शन-पूजा का सिलसिला शुरू हो गया।

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    1 फ़रवरी, 1986 को जब ताला खुला तो मेरे शरीर के उस हिस्से पर मेरी संतानों ने पूजा-आराधना शुरू कर दिया। मैनें कभी नहीं सोचा था कि मेरे बच्चे मेरे शरीर के एक हिस्से के लिए इतने उतावले हैं। 11 नवंबर, 1986 को विश्व हिंदू परिषद ने शिला पूजन से शुरू किया और यह अनुष्ठान 6 दिसंबर 1992 को विध्वंस में बदल गया।

    मेरे लिए यह इम्तिहान का दौर था, क्योंकि वर्ष 1528 में शरीर के उसी हिस्से पर निर्मित एक इमारत के लिए वर्ष 1853 में शुरू हुआ झगड़ा, जिसके लिए मेरी दो संतानें आपस में लड़ रहीं थीं। सच कहूं तो मुझे दोनों में से किसी हार या जीत से कुछ लेना-देना नहीं था।

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    मैं बीते 26 वर्ष 11 महीने और 3 दिन से छाती पर ज़ख्म लिए-लिए बेजार थी। मेरे ही कोख से जन्में 2000 से अधिक संतानें मेरे शरीर के एक हिस्से के लिए जान गवां चुकी थी। फरवरी, 2002 में मेरी जिंदा संतानों को रेलगाड़ी में जलाकर मार डाला गया। आग किसने लगाई यह सवाल नहीं है।

    मेरे शरीर के एक हिस्से यानी जमीन के एक टुकड़े के लिए यह हुआ, जिस पर पिछले 5000 वर्षों से दावों और इरादों के निशां बनाकर मेरी जिंदा संतानें लाशों में तब्दील हो चुकी थी, जो उनकी नहीं हुई तो उनकी कैसे होगी जो अब उस हिस्से पर दावा कर रहे हैं। सच कहती हूं अगर मैं जमीन का महज एक टुकड़ा न होती तो कब का खुद को धरती को मां सीता मैय्या की तरह सौंप चुकी होती।

    Ayodhya

    मैं न्याय के तराजू से हुए मेरे शरीर के उक्त हिस्से के फैसले को सही और गलत ठहराने नहीं जा रही, लेकिन यह फैसला मेरे संतानों के लिए दावानल नहीं साबित होगा, इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा। मैं पक्षपात नहीं करती, लेकिन पक्षाघात से जरूर गुजर रही हूं। मेरे शरीर पर मेरी सभी संतानों का बराबर हक है, लेकिन दुनियावी दस्तूर मेरी पक्षाघात की वजह बन गई है।

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    मैं अपनी गलती को मानती है। निः संदेह वात्सल्य से भरी मेरी एक छोटी सी गलती ने न्याय की तराजू को प्रभावित किया है, जो मेरी उस संतान की है, जिसने सबसे पहले मेरे शरीर के उस हिस्से पर अपनी लकीर खींची थी, जिसके वजन से न्याय की तराजू का पलड़ा उसकी ओर झुक गया। मैं अपने उन बच्चों से अपनी उस गलती के लिए क्षमा मांगती हूं, जिनकी लकीर आज छोटी पड़ गई है।

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    English summary
    The Supreme Court of India gave a historic verdict on the disputed land of the Ayodhya Ram Temple case. After a month-long hearing, the court ruled in favor of the Ram temple. A 5-member judge bench of the Supreme Court began hearing on 6 August 2019 and was completed on 16 Ocotober, 2019
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