UCC से मुस्लिम महिलाओं को क्या फायदा होगा? बीजेपी अल्पसंख्यक मोर्चा ने संभाला बताने का जिम्मा
यूनिफॉर्म सिविल कोड (यूसीसी) को लेकर बीजेपी अब पूरी तरह से सक्रिय है। 2024 के लोकसभा चुनावों से पहले इसे लागू करना बीजेपी सरकार का सबसे बड़ा राजनीतिक कदम हो सकता है। क्योंकि, उसके तीन शीर्ष राजनीतिक संकल्पों में से दो- अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण और आर्टिकल-370 खत्म करने का वादा पहले ही पूरा हो चुका है।
समान नागरिक संहिता या यूसीसी पर सरकार के ऐक्शन से पहले बीजेपी अल्पसंख्यक मोर्चा ने इसे मुस्लिम बुद्धिजीवियों तक पहुंचाने की योजना भी तैयार कर ली है। मोर्चा की कोशिश होगी कि वह मुसलमानों के ओपिनियन-मेकर्स के बीच यह बात पहुंचाएं कि यह उनके लिए और खासकर मुस्लिम महिलाओं के लिए किस तरह से फायदेमंद है।

बीजेपी अल्पसंख्यक मोर्चा बताएगा लाभ
भाजपा शासित कुछ राज्यों में इसपर काम पहले से शुरू भी हो चुका है, लेकिन अब इसे संविधान में पहले से मौजूद प्रावधानों के तहत लागू करने पर चर्चा हो रही है। बीजेपी अल्पसंख्यक मोर्चा के प्रवक्ता यासिर जिलानी ने ईटी को बताया है, 'हम संभ्रांत मुसलमानों और बुद्धिजीवियों को जानकारी देना चाहते हैं कि यूसीसी से निःसंतान दंपत्तियों के लिए गोद लेना आसान हो जाएगा।'
मुस्लिम महिलाओं को क्या फायदा होगा?
उन्होंने कहा, 'महिलाओं को भी पैतृक धन में अधिकार मिलेगा और यह धर्मनिरपेक्ष कानूनों के आधार पर होगा। तीसरा, यूसीसी से महिलाओं का सशक्तिकरण होगा, क्योंकि इससे यह व्यवस्था रुक जाएगी, जिसमें एक पुरुष चार बीवियां रख सकते हैं। शरिया के हिसाब से भी एक आदमी के लिए जरूरी है कि वह सभी बीवियों के साथ एक जैसा बर्ताव करे और भेदभाव न करे। महिलाओं को संपत्ति में अधिकार मिलेगा।'
बीजेपी पर लग रहा है ध्रुवीकरण की कोशिश का आरोप
इसी महीने 14 जून को 22वें विधि आयोग ने धार्मिक संगठनों और आम जनता से यूनिफॉर्म सिविल कोड पर अपने सुझाव देने को कहा है। खासकर बीजेपी और मोदी-विरोधियों का आरोप है कि 2024 के लोकसभा चुनावों से पहले यूसीसी लागू करके बीजेपी सरकार ध्रुवीकरण करने की कोशिश में है।
संविधान के आर्टिकल-44 में है यूसीसी का प्रावधान
गौरतलब है कि संविधान के नीति निदेशक सिद्धांत के तहत आर्टिकल-44 में इस बात का प्रावधान है कि देश में एक समान नागरिक संहिता (यूसीसी) होनी चाहिए। लेकिन, अबतक की सरकारों ने इसे मूलरूप से राजनीतिक वजहों से ठंडे बस्ते में ही डाले रखा है।
बीजेपी शासित राज्यों में पहले से जारी है काम
विधानसभा चुनावों के दौरान बीजेपी ने उत्तराखंड, गुजरात और कर्नाटक में राज्य स्तर पर इसे लागू करने का वादा भी किया था। उत्तराखंड में इसपर काम काफी प्रगति पर बताया जाता है। वैसे जमात-ए-उलेमा-ए-हिंद और ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने समान नागरिक संहिता का यह कहते हुए विरोध किया है कि ये भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में लागू नहीं किया जा सकता।
मुस्लिम महिलाओं के लिए मोदी सरकार ने लिए कई अहम फैसले
हालांकि, विरोध ट्रिपल तलाक खत्म करने का भी खूब हो चुका है। लेकिन, फिर भी उसे गैर-कानूनी घोषित कर दिया गया है। इसी तरह से मोदी सरकार हज यात्रा पर जाने वाली अकेली मुस्लिम महिला के लिए महरम की अनिवार्यता भी खत्म कर चुकी है। इसके तहत पहले मुस्लिम महिलाएं बिना नजदीकी पुरुष रिश्तेदार के हज पर नहीं जा सकती थीं।
मुस्लिम महिलाओं पर राजनीतिक पकड़ मजबूत बनाने की कोशिश
बीजेपी का मानना है कि मुस्लिम महिलाओं के बीच इन पहलों से पार्टी की पकड़ मजबूत हुई है। क्योंकि, ट्रिपल तलाक हो या चार शादियों की व्यवस्था, भुगतना आखिरकार महिलाओं को ही पड़ता है। यही वजह है कि बीजेपी इस बार समान नागरिक संहिता लागू करने की ओर सक्रिय नजर आ रही है।
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