'आप' को विश्वास अमेठी में राहुल का डब्बा गोल करेंगे कुमार

दिल्ली में 28 सीटें जीतने के बाद आम आदमी पार्टी व्यवस्था परिवर्तन और भ्रष्टाचार दूर करने का मंत्र लेकर लोकसभा चुनाव में उतरने जा रही है। जिसमें उसने कांग्रेस के मजबूत गढ़ अमेठी में अपने लोकप्रिय और धुंआधार अंदाज में बोलने वाले नेता कुमार विश्वास को राहुल गांधी के खिलाफ चुनाव में उतारने का फैसला किया है। अब जब केजरीवाल नई दिल्ली सीट पर शीला दीक्षित को हरा चुके हैं और 'आप' को दिल्ली की जनता ने व्यापक जनसमर्थन दिया है ऐसी स्थिति में इसे लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के लिए खतरे की घंटी माना जा रहा है।
राहुल गांधी की शिक्षा और राजनीतिक अनुभव
भारत के एक प्रभावशाली परिवार से संबंध रखने वाले राहुल गांधी ने दुनिया के कई प्रसिद्ध संस्थानों में पढ़ाई की है जिसमें सेंट कोलंबिया इंस्टीट्यूट और सेंट स्टीफेंस कॉलेज हैं। हालांकि सुरक्षा कारणों से उन्हें कई बार अपने कालेज बदलने पड़े। पहला साल सेंट स्टीफेंस में गुजारने के बाद राहुल हावर्ड विश्वविद्यालय पढ़ने चले गये। 1991 में पिता राजीव गांधी की हत्या के बाद राहुल रोलिंग कालेज गये, जहां उन्होने बी ए पूरा किया। जिसके बाद उन्होने ट्रिनिटी कॉलेज, कैब्रिज से दर्शन शास्त्र और वैश्विक संबंधों में एम फिल की। जबकि कुमार विश्वास जाने माने खासकर युवाओं में लोकप्रिय एक कवि हैं जो कि 1994 से राजस्थान के एक कॉलेज में प्रोफेसर हैं।
यह सच है कि व्यवस्था परिवर्तन के आंदोलन की शुरूआत आम आदमी से ही हुई है, लेकिन देश को ऐसे नेताओं की जरूरत है जिनमें राजनीतिक परिपक्वता, विपक्ष का दबाव झेलने की क्षमता और आम जनता की जरूरतों को समझने की योग्यता हो। राहुल गांधी को अभी भी राजनीति में एक कच्चे खिलाड़ी के तौर पर देखा जाता है लेकिन वह कांग्रेस की युवा शाखा इंडियन यूथ कांग्रेस और नेशनल स्टूडेंट्स यूनियन आफ इंडिया के अध्यक्ष रह चुके है, वह अमेठी से सांसद होने के अलावा कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव भी हैं। राहुल 2007 से राजनीति में हैं। उनके मुकाबले कुमार विश्वास, अन्ना हजारे द्वारा 2011 में किये गये आंदोलन से चर्चा में आये और 2012 में उन्हें आम आदमी पार्टी की कोर कमेटी का सदस्य बनाया गया।
दिल्ली में 'आप' की सफलता को हल्के में नहीं लिया जा सकता है, वहीं कुमार विश्वास की लोकप्रियता और राहुल गांधी द्वारा रैलियों में दिये गये विवादास्पद बयान यह इशारा करते हैं कि कांग्रेस को अपने ही गढ़ में कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ेगा।












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