रामविलास पासवान की राजनीतिक विरासत पर चिराग का दावा कितना मज़बूत

चिराग पासवान
Parwaz Khan/Hindustan Times via Getty Images
चिराग पासवान

रामविलास पासवान की राजनीतिक विरासत पर अपना दावा मज़बूत करने के लिए उनके बेटे चिराग पासवान इन दिनों बिहार में आशीर्वाद यात्रा पर निकले हुए हैं.

आशीर्वाद यात्रा के नौवें चरण में शनिवार को चिराग पासवान भोजपुर के आरा और बक्सर ज़िले में थे. इससे एक दिन पहले उन्होंने आरा में जनसभा की थी.

इससे पहले अपनी यात्रा के आठवें चरण में वे औरंगाबाद, सासाराम और कैमूर ज़िले में जनसभाओं को संबोधित कर रहे थे. इसी साल पाँच जुलाई को अपने पिता के जन्मदिन के मौक़े पर उन्होंने ये यात्रा शुरू की थी.

इसके तहत पिछले दो महीनों में हर सप्ताह चिराग पासवान बिहार में अपनी इस यात्रा के लिए निकलते रहे हैं और अब तक लगभग पूरा बिहार घूम चुके हैं.

विधानसभा चुनाव में सीटों के लिहाज से नाकामी के बाद चिराग जब तक संभलते तब उनके चाचा पशुपति कुमार पारस ने पाँच सांसदों को अपने पाले में कर पार्टी तोड़ दी.

पारस अब केंद्र सरकार में कैबिनेट रैंक के मंत्री हैं जबकि चिराग पासवान के सामने अपने पिता की राजनीतिक विरासत संजोने की चुनौती है.

इस कोशिश के तहत चिराग इन दिनों कहीं अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं और बीते विधानसभा चुनाव में प्रत्याशी रहे नेताओं के घर पहुंचते दिखते हैं, तो कहीं आंबेडकर-गांधी और बाबा चौहरमल के साथ ही सहजानंद सरस्वती की मूर्तियों पर माल्यार्पण करते हुए नज़र आते हैं.

इस यात्रा के दौरान गया ज़िले में पासवान चौक पर चिराग पासवान को देखने पहुंची नगीना देवी के सामने पशुपति पारस का नाम उछालने पर वह कहती हैं, "हम ख़ाली दो ही नाम सुने हैं. रामविलास और चिराग. उनके भाई को नहीं जानते. वोट बंगला छाप को देंगे. जात को वोट नहीं देंगे तो किसको देंगे? पूरी दुनिया जात के लिए मर रही है."

उनके साथ ही आई सरवन देवी भी कुछ-कुछ ऐसी ही बातें कहती हैं.

पशुपति कुमार पारस
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पशुपति कुमार पारस

पार्टी के नाम और चिन्ह पर किसकी दावेदारी मज़बूत?

साल 2000 में रामविलास पासवान ने लोक जनशक्ति पार्टी की नींव रखी.

उन्हें देश में एक ऐसे राजनेता के तौर पर देखा जाता है, जिन्होंने देश के छह प्रधानमंत्रियों की सरकारों में मंत्रिपद संभाला. वे वीपी सिंह से लेकर, एचडी देवगौड़ा, आईके गुजराल, अटल बिहारी वाजपेयी, मनमोहन सिंह और नरेंद्र मोदी की सरकार में अपनी मज़बूत दखल के साथ हिस्सेदार रहे.

अपने अंतिम दिनों तक वे राज्यसभा के सदस्य रहे. सूबे के कई बाहुबली छवि के नेताओं को अपने साथ रखने के बावजूद वे सियासी तौर पर प्रासंगिक बने रहे.

कहा जाता है कि रामविलास पासवान को देश और प्रदेश की राजनीति में चल रही हवा का रुख़ भांपने में महारत हासिल थी.

वे सिर्फ़ एक बार चूके. जब साल 2009 में वे यूपीए से अलग होकर लालू प्रसाद यादव के साथ आए और हाजीपुर की उसी सीट से हार गए जहाँ, कभी उन्हें रिकॉर्ड वोट मिले थे. हालांकि वे जल्द ही लालू प्रसाद यादव की मदद से राज्य सभा के सदस्य बन गए थे.

अलग-अलग समय पर देश में बनने वाली सरकारों में अपना मंत्रिपद सुनिश्चित करने के कौशल पर कटाक्ष करते हुए राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद ने उन्हें 'राजनीति का मौसम वैज्ञानिक' तक कहा था.

ऐसे में सवाल उठने लाज़मी हैं कि आखिर 'लोक जनशक्ति पार्टी' का नाम और सिंबल (बंगला छाप) किसके साथ रहेगा? चूंकि अब तक तो दोनों गुटों को पार्टी के सिंबल और नाम के साथ ही कार्यक्रम करते देखा जा रहा है. दोनों गुटों की अपनी-अपनी दावेदारियां भी हैं.

https://www.youtube.com/watch?v=ckpFlCtJvno

चिराग पासवान अपने चाचा पशुपति नाथ पारस (सबसे बाएं), चाचा राम चंद्र पारस (बीच में), सांसद वीणा देवी और महबूब अली कैसर (सबसे दाएं) के साथ
HINDUSTAN TIMES / CONTRIBUTOR
चिराग पासवान अपने चाचा पशुपति नाथ पारस (सबसे बाएं), चाचा राम चंद्र पारस (बीच में), सांसद वीणा देवी और महबूब अली कैसर (सबसे दाएं) के साथ

चिराग पासवान पार्टी के नाम और पार्टी चिन्ह के सवाल पर कहते हैं, "देखिए आज की तारीख़ में चुनाव आयोग के पास लोक जनशक्ति पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष के तौर पर चिराग पासवान का ही नाम दर्ज है. यह सूचना आप आरटीआई के ज़रिए भी ले सकते हैं."

"चुनाव आयोग ही एक ऐसी संस्था है जो तय करती है कि पार्टी को रजिस्टर और अधिकृत करने की ज़िम्मेदारी किसकी है. हाल फ़िलहाल तक भी चुनाव आयोग के साथ हमारा पत्राचार चलता रहा है. सब कुछ वैसे ही चल रहा है. रही बात पार्टी चिन्ह की तो उसे लेकर कोई विवाद नहीं है."

पार्टी के नाम पर अपनी दावेदारी जताने के साथ ही पार्टी चिन्ह को लेकर किसी भी तरह के विवाद से भले ही चिराग इनकार कर रहे हों, लेकिन मामला कोर्ट और चुनाव आयोग के दरवाज़े तक पहुंच तो ज़रूर गया है.

पार्टी के नाम और चिन्ह की दावेदारी के सवाल पर पशुपति पारस गुट के लोजपा के प्रदेश अध्यक्ष सांसद प्रिंस राज कहते हैं, "पशुपति कुमार पारस ही सदन में हमारे नेता हैं. लोकसभा स्पीकर ने भी इस बात पर मुहर लगाई है. एनडीए की बैठकों में भी वे ही शामिल हो रहे हैं. सभी मिलकर उनके नेतृत्व में आगे बढ़ रहे हैं. जबकि कोर्ट ने उन्हें (चिराग पासवान को) इस मामले में फटकार भी लगाई है. उन्हें निराशा हाथ लगी. रही बात पार्टी चिन्ह की तो इस पर किसी का जन्मजात अधिकार नहीं. अभी यह मामला चुनाव आयोग में लंबित है और हर तरह का फ़ैसला हमें मान्य होगा."

चिराग़ पासवान और उनके भाई प्रिंस राज पासवान
TWITTER@ICHIRAGPASWAN
चिराग़ पासवान और उनके भाई प्रिंस राज पासवान

'आशीर्वाद यात्रा' का असर

चिराग पासवान की 'आशीर्वाद यात्रा' को कवर करने वाले इंडियन एक्सप्रेस के पत्रकार और 'रूल्ड ऑर मिसरूल्ड' के लेखक संतोष सिंह कहते हैं, "हाजीपुर में मैंने चिराग की आशीर्वाद यात्रा देखी और मैंने पाया कि लोग घंटों उनका इंतजार कर रहे थे. पशुपति पारस की स्वीकार्यता उनके अपने ही लोकसभा क्षेत्र में वैसी नहीं है. वे सिर्फ़ इसलिए जीते क्योंकि वे रामविलास पासवान के भाई हैं."

"पशुपति पारस 'पासवानों' के नेता नहीं हो सकते. पासवानों का नेता बनने की क्षमता चिराग में ही है लेकिन इसके लिए उन्हें ख़ुद को और मज़बूत करना होगा. अब तक उनकी छवि एक ऐसे नेता की रही है जो अपने पिता और पीएम मोदी के दम पर राजनीति में आए. रही बात चिराग की तो वे अभी सही रास्ते पर हैं. उनके पास पर्याप्त समय है और चिराग को इस यात्रा से जो हासिल होगा वो उनका अपना होगा."

बिहार में दलित राजनीति के नए और पुराने चेहरों की सक्रियता और प्रासंगिकता के सवाल पर संतोष सिंह कहते हैं, "बिहार के भीतर दलित राजनीति में एक वैक्यूम तो है और उस स्लॉट में फिट होने की क्षमता पशुपति पारस के बजाय चिराग में दिखती है, लेकिन इसके लिए चिराग को केंद्र की राजनीति से निकलकर बिहार की राजनीति में सक्रिय होना होगा."

"एक दौर में बाबू जगजीवन राम बिहार में दलित राजनीति का चेहरा थे, लेकिन वे अपने जातीय आधार को अधिक विस्तार नहीं दे सके. जगजीवन राम के बाद उनकी बेटी मीरा कुमार भी दलित राजनीति का चेहरा नहीं बन सकीं. रमई राम भी एक क्षेत्र विशेष से बाहर नहीं निकल सके. बाकी लोजपा की मज़बूती के पीछे अगड़ी जाति, दलित (पासवान) और मुस्लिमों का गठजोड़ हमेशा से काम करता रहा है."

चिराग पासवान की इस यात्रा में जगह-जगह युवाओं की भी अच्छी खासी संख्या देखी जा रही है. "देखो-देखो कौन आया, शेर आया-शेर आया" की नारेबाजी के साथ ही "चिराग तुम संघर्ष करो, हम तुम्हारे साथ हैं" के नारे गूंज रहे हैं.

जहानाबाद की जनसभा में हमारी मुलाक़ात 21 वर्षीय अमर सिंह रावत से हुई जो कुछ ऐसी ही नारेबाज़ी कर रहे थे.

हमसे बातचीत में अमर ने कहा, "ख़बर मिली कि चिराग पासवान जिले में आ रहे हैं. हम चले आए. हम चिराग के साथ हैं. हमारा पासवान समाज उनके साथ है. उनके पिता रामविलास पासवान बिहार में दलित राजनीति का प्रमुख चेहरा थे. उनका हर जगह सम्मान था. पशुपति पारस जी ने तो धोखेबाजी किया. वो गार्जियन का फर्ज नहीं निभाए. रामविलास जी के विरासत के असल हक़दार चिराग भैया ही हैं. "

ज़ाहिर तौर पर ऐसी यात्राओं का फायदा नेताओं को होता है, यदि वे सचेत और ईमानदार कोशिश करें.

यात्राओं के समाजशास्त्र पर राजनीतिक विश्लेषक महेन्द्र सुमन कहते हैं, "देखिए राजनीतिक या किसी भी तरह की यात्राओं का तात्कालिक या दीर्घकालिक उद्देश्य नए और पुराने लोगों से संपर्क साधना और अपने आधार को विस्तार देना होता है. इसके ज़रिए नए गठजोड़ों का निर्माण होता है. चूंकि बिहार की तमाम क्षेत्रीय पार्टियों में पीढ़ीगत बदलाव हो रहे हैं, और इन नेताओं को ऊपर से लादा गया है. तो ऐसी यात्राओं की इन्हें सख्त जरूरत है. चिराग ने इस यात्रा को भी इसी मक़सद के साथ शुरू किया है."

अकेले लड़कर 'लोजपा' ने क्या खोया और क्या पाया?

2020 के विधानसभा चुनाव में अकेले लड़ने के फ़ायदे और नुक़सान पर चिराग पासवान ने कहा, "एक बात तो स्पष्ट है कि लोजपा ने अकेले लड़कर छह फीसदी मत हासिल किए. बाकी पार्टियां तीन-चार झंडों वाले गठबंधन में लड़ीं. लोग कहते थे कि हम अकेले चुनाव नहीं लड़ सकते. हमने यह कर दिखाया."

"यदि हम 243 सीटों पर लड़ते तो हमें 12 से 14 फ़ीसदी मत मिलते. आज 15 फ़ीसदी मत हासिल करने वाले राज्य के मुख्यमंत्री बने हुए हैं. मैं अपने संगठन को आगामी मध्यावधि चुनाव के लिए तैयार कर रहा हूँ. देश में लोकसभा के चुनाव से पहले बिहार में विधानसभा के चुनाव होंगे."

लोजपा के लिहाज से बीता विधानसभा चुनाव इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि चिराग पासवान एनडीए में रहते हुए सीएम नीतीश कुमार के प्रति हमलावर थे.

उन्होंने 135 सीटों पर लोजपा उम्मीदवार उतारे. भले ही वो महज 1 सीट जीते लेकिन उन्होंने अपने मत फ़ीसदी में इज़ाफा तो ज़रूर किया. उन्हें 5.66 फीसदी मत मिले लेकिन यदि वे जद(यू) के उम्मीदवारों के ख़िलाफ़ अपने उम्मीदवार नहीं उतारते तो जद(यू) को 28 सीटों का घाटा नहीं होता. जद(यू) महज 43 सीटों तक न सिमटती.

राजनीतिक हलकों में यह बात भी सामने आयी है कि जनता दल यूनाइटेड ने इसका बदला चिराग पासवान की पार्टी को तोड़कर ले लिया है. अब चिराग पासवान के सामने चुनौती अपना आधार बचाए रखने और उसे बढ़ाने की है.

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