जाति-धर्म की राजनीति: ई 'गोला' पर ही कउनो 'फिरकी' ले रहा है
लखनऊ। जाति और धर्म पर उंगलियां उठाते हुए ई गोला पर कउनो फिरकी ले रहा है। कउनों भिड़ाने की कोशिश कर रहा है। वो किसी अउर गोला से नहीं, इसी गोला से है। अब कउन है ये आप समझो। हालांकि है आपके आस-पास ही, हुई सकत है हम और आप ही फिरकी लई रहे हों..या फिर ई सफेद कपड़ा वाला हम लोगन का अपनी उंगलिया मा नचा रहा हो। संभलने की जरूरत है। ऊ गॉड हमको नहीं सिखाया कि हम किस जाति का, किस धर्म का हैं।
बड़ी खबर: गुजरात के 94 प्रतिशत हिंदू चाहते हैं धर्म-परिवर्तन?

वो हमको नहीं बोला कि ये फलाने धर्म का है तो ई तुम्हारा दुश्मन है। सब कुछ यहीं सिखाया जा रहा है अउर हम सीख भी मन लगाकर रहे हैं। इत्ते सारे माध्यम जो हैं हमरे पास। सोशल मी़डिया पर कउनो ब्राहम्मणों को गरिया रहा है, तो कउनो दलितों के लिए अफसोस जता रहा है। बड़का वाला माइक थाम कर पूंछ रहे हैं कि मरने वाला हिंदू था या मुसलमान, कहीं हिंदू तो नहीं था, अच्छा मुसलमान था क्या। मारने वाला किस मजहब से था। अरे साहेब इंसान हैं सब। सबके अंदर खून एकै रंग का है। मौत होती है तो तकलीफ सबका एक जईसन ही होत है। पर का समझाएं, किसको समझाएं। चलिए आगे देखत हैं।
ई 'गोला' पर ही कउनो 'फिरकी' ले रहा है..
हम, आप और पूरा समाज हो रहा है प्रभावित
कोई धर्म पर सवाल खड़े करता है तो कोई जाति पर। जिसके बाद भावनाएं आहत होती हैं। आपसी टकराव होता है। टकराव से हिंसा होती है और हिंसा से मातम। सिर्फ यहीं पर नहीं रूकता पूरा प्रकृम। मातम पर सियासत और सियासत से तैयार किया जाता है वोट बैंक। फिर वोट बैंक से सत्ता हासिल की जाती है। सत्ता से दौलत और दौलत की खातिर भ्रष्टाचार किया जाता है।
भ्रष्टाचार के कारण देश की आर्थिक स्थिति प्रभावित होती है, विकास प्रभावित होता है, साथ ही प्रभावित होता है पूरा का पूरा समाज। मैं ये नहीं कह रहा कि इसमें महज सियासी ताकतें ही भूमिका अदा कर रही हैं बल्कि मीडिया के अलग अलग माध्यमों का भी किरदार बेहद अहम है। आम से खास लोगों का भी योगदान है।
संवेदनशील है जाति, धर्म जैसे मुद्दे
बहरहाल मूल सवाल है मजहब पर सवाल खड़े करने का, सवाल ये भी है कि क्यों लोग जाति के आधार पर अपराध तय करने लगे हैं। क्योंकि कहीं न कहीं लोगों को पता चल चुका है कि अपनी जाति को लेकर, अपने मजहब को लेकर लोग बेहद संवेदनशील हैं। यदि इस पर प्रहार किया जाता है तो देश की शांति भंग निश्चित तौर पर होगी।
रोहित वेमुला के लिए इंसाफ नहीं, दलित के लिए इंसाफ की गुहार
इस साल जनवरी में हैदराबाद यूनिवर्सिटी के रोहित वेमुला नामक छात्र द्वारा आत्महत्या करने का मामला देश भर में दलित की हवा के साथ पहुंच गया। न्याय की गुहार रोहित वेमुला के नाम पर नहीं बल्कि दलित के तमगे के लिए की जा रही थी और है। जबकि इस बात की पुष्टि हो चुकी है कि रोहित वेमुला दलित खेमे से नहीं आता। रोहित की मां को दलित प्रमाण-पत्र देने वाले गंटूर जिले के स्थानीय प्रशासन से जब इस बाबत पूछताछ हुई तो उन्होंने भी अपनी गलती स्वीकार करते हुए यह मान लिया है कि रोहित वेमुला दलित परिवार से नहीं आता है।
राहुल गांधी के इशारे पर भारत दौरे पर निकले कन्हैया कुमार?
हालांकि मुद्दा ये नहीं कि रोहित वेमुला दलित था या नहीं। असल मुद्दा तो ये है कि क्या न्याय को महज किसी जाति धर्म के आधार पर सीमित कर दिया जाए। जाति के लबादे से ढ़का किसी व्यक्ति विशेष को मजबूती देने के लिए उसे खुलेआम हथियार थमा दिए जाएं कि तुम फलां फलां हो इसलिए तुम्हें आजादी है। निश्चित तौर पर आपका जवाब न में होगा। माना कि रोहित वेमुला ने आत्महत्या की, अब किन कारणों में की ये जांच का विषय है। लेकिन दलित के स्टीकर के साथ उसे कुछ खास तरह से पेश करना वास्तव में ये जनता के मुताबिक देश की संप्रभुता से खिलवाड़ है।
अखलाक की हत्या पर मजहबी आरोप
बीते साल 28 सितंबर को दिल्ली से सटे दादरी जो कि उत्तर प्रदेश के अंतर्गत आता है उस मामले को हत्या के साथ धर्म का नाम देकर अखबारों की, टेलीविजन की, सोशल मीडिया की प्रमुख खबर बना दिया गया। न्याय की गुहार बाया मजहबी के नाते लगाई गई। हत्या करने वालों को बाकायदा एक नाम दिया गया। फिर बांट दिया गया कल तक आपस में प्यार मुहब्बत से रहने वाले धर्मों की उन तमाम कहानियों को, जो देश पर नाज का कारण हुआ करती थीं।
ताजा मजहबी मामला डॉ0 नारंग
एक दादरी हादसे को लेकर सेक्युलर बिरादरी जिस तरह से सोशल मीडिया पर एक्टिव हुई थी और मोमबत्ती मार्च निकाल रही थी, ये सब करने की उसने डा.नारंग के कत्ल के बाद जरूरत नहीं समझी। सवाल उठता है आखिर क्यों? यहीं नहीं, इन्होंने संघ के कार्यकर्ताओं के केरल और असम में इस्लामिक कट्टरपंथियों और उग्र वामपंथियों द्वारा लगातार कत्ल की घटनाओं पर कभी स्यापा नहीं किया।
ये कभी असम या पूर्वोत्तर राज्यों में हिन्दी भाषियों के मारे जाने पर भी विचलित नहीं हुए। क्या महज इसलिए क्योंकि केंद्र में मौजूद सरकार को वो मारे जाने वालों का कुछ ज्यादा ही हिमायती समझने की गफलत पाले हुए हैं। अरे साहब ये सरकार है, जिसे करीबन हर धर्म के लोगों ने चुना है। फिर ये किसी एक के साथ न्याय कैसे कर सकती है। न्याय तो इसकी नजर में समान होगा न। पर माइक, कैमरा, टीआरपी की भीड़ ने एक खेमे को खास और दूसरे को बेचारा सा दिखा दिया है। जिसके बाद मतभेद की स्थिति का उबरना लाजमी है।
जबरदस्ती चमकाये जाने वाले मुद्दों की फेहरिस्त काफी लंबी
सिर्फ यही नहीं बल्कि मतभेद की खातिर चमकने वाले या कहिए जबरदस्ती चमकाये जाने वाले मुद्दों की फेहरिस्त काफी लंबी है, लाउड स्पीकर से लेकर लव जिहाद तक। बीफ से स्लाटर हाउस तक। तो समझ में आया न कि धर्म, मजहब के बीच टकराव कराते हुए फायदा तलाशने की कोशिशों में कई दल सक्रिय हैं। सोशल मीडिया पर यह बहस अब ब्राह्म्मण बनाम.....तैयार की जाने लगी है।
कौन था महिषासुर, क्यों मनाते हैं जेएनयू वाले उसका शहादत दिवस?
आस्थाओं के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है। महिषासुर को पूजने वाले नजर आने लगे हैं, इंसानियत का कत्लेआम करने की दबे होठों के जरिए कसम खाने लगे हैं। सच कउनो ई गोला में ही फिरकी ले रहा है। धमाका कहीं भी हो मजहब पहचान कर मौत का चुनाव नहीं करता। हाल ही में पाकिस्तान के लाहौर में इकबाल टाउन के पास गुलशन ए पार्क में आत्मघाती हमला हुआ। जिसमें न जाने कितने लोगों की मौत हो गई। कोई पूछे जाकर उन मरने वालों से कि तुम्हारा धर्म क्या था। लोगों की इल्तजा है कि भारत के मतलब को मत बदलने की कोशिश कीजिए।












Click it and Unblock the Notifications