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Online Gaming या साइलेंट किलर! डिजिटल एडिक्शन कैसे युवाओं के लिए बना खतरा, मॉर्डन पैरेंटिंग पर क्यों उठे सवाल?

Online Gaming Addiction: गाजियाबाद के ट्रिपल सुसाइड केस ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है। तीन नाबालिग बहनों की दर्दनाक मौत के बाद सबसे पहले सवाल ऑनलाइन गेमिंग और कथित डिजिटल एडिक्शन पर उठे। शुरुआती जानकारी में इसे किसी ऑनलाइन टास्क गेम या डिजिटल चैलेंज से जोड़कर देखा गया, लेकिन अब पुलिस जांच में बड़ा खुलासा सामने आया है।

पुलिस इसके पीछे किसी ऑनलाइन गेम या कोरियन गेम' की सीधी भूमिका नहीं हो मान रही है। यह आशंका जरूर हो सकती है कि मोबाइल फोन बंद किए जाने, डिजिटल दुनिया से अचानक कटने पर गंभीर मानसिक दबाव बताया जा रहा है।

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विस्तार से जानिए कैसे ऑनलाइन गेमिंग और फोन की लत बच्चों और युवाओं को सोसाइटी से अलग-थलग कर रही है, मानसिक तौर पर किस तरह से इसका गलत प्रभाव पड़ रहा है...

Digital Addiction Disorder: एक बार फिर निशाने पर डिजिटल दुनिया का काला सच?

मोबाइल, इंटरनेट और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) ने जिंदगी को आसान और तेज जरूर बनाया है। आज पढ़ाई, काम, खरीदारी और मनोरंजन सब कुछ एक क्लिक पर हमारे सामने हाजिर है। लेकिन इसी जगमगाती दुनिया का एक डरावना और खौफनाक पहलू भी है।

देश के युवाओं में लगातार बढ़ती डिजिटल एडिक्शन को लेकर एक्सपर्ट्स बार-बार चेतावनी दे रहे हैं। किस तरह बच्चों और युवाओं की इंटरनेट, सोशल मीडिया और ऑनलाइन गेमिंग पर बढ़ती निर्भरता मानसिक स्वास्थ्य के लिए बड़ा खतरा बनती जा रही है।

गाजियाबाद की भारत सिटी सोसाइटी में 9वीं मंजिल से छलांग लगाकर तीन बहनों की मौत के बाद यह सवाल उठा कि क्या ऑनलाइन गेमिंग या किसी डिजिटल चैलेंज ने उन्हें ऐसा कदम उठाने के लिए मजबूर किया। यह मामला डिजिटल लत, भावनात्मक दबाव और सामाजिक अलगाव से भी जुड़ा हो सकता है। गाजियाबद की घटना कोई पहला मामला नहीं जहां परिवार, समाज और स्कूली शिक्षा अपनी बेसिक रिस्पॉन्सिबिलिटी से चूक गई हो। इससे पहले भी इस तरह के कई ऐसे गंभीर मामले देखने को मिले हैं।

ऑनलाइन गेमिंग कैसे Youth Mental Health पर डाल रहा असर?

मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ मानते हैं कि ऑनलाइन गेम्स अब सिर्फ मनोरंजन का साधन नहीं रह गए हैं। PUBG, Free Fire और अन्य बैटल गेम्स कई युवाओं के लिए गंभीर लत बन चुके हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने Gaming Disorder को मानसिक स्वास्थ्य समस्या के रूप में पेश किया है। इसमें व्यक्ति गेमिंग में इतना डूब जाता है कि अपना पूरा नियंत्रण खो देता है और पढ़ाई, काम, रिश्तों और सेहत की अनदेखी करने लगता है।

भारत में किए गए कई सर्वे बताते हैं कि किशोर और युवा रोजाना कई-कई घंटे ऑनलाइन गेमिंग में बिता रहे हैं। इसका असर उनकी नींद, व्यवहार और इमोशनल बैलेंस पर साफ दिख रहा है। साल 2023 के NCRB डेटा के अनुसार, देश में 85 से अधिक आत्महत्या के मामले सीधे तौर पर ऑनलाइन गेमिंग से जुड़े पाए गए।

ब्लू व्हेल, मोमो और किकी चैलेंज ने मौत की ओर ढ़केला

ऑनलाइन गेमिंग और डिजिटल चैलेंज के खतरे नए नहीं हैं। साल 2016-17 में रूस से शुरू हुआ ब्लू व्हेल चैलेंज दुनिया भर में चर्चा का विषय बना। भारत समेत कई देशों में इससे जुड़े आत्महत्या के मामले सामने आए। यह कोई ऐप नहीं था, बल्कि सोशल मीडिया और मैसेजिंग प्लेटफॉर्म्स के जरिए चलने वाला टास्क-बेस्ड चैलेंज था, जिसमें 50 दिनों तक खतरनाक टास्क दिए जाते थे।

इसी तरह 2018 में किकी चैलेंज और मोमो चैलेंज भी सामने आए, जिनमें लोगों ने जान जोखिम में डालकर स्टंट किए या मानसिक दबाव झेला। हालांकि हर मामले में मौत की पुष्टि नहीं हुई, लेकिन इन ट्रेंड्स ने यह साफ कर दिया कि डिजिटल दुनिया किस तरह युवाओं को प्रभावित कर सकती है।

दिमाग पर कैसे असर डालती है Online Gaming?

नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ की एक रिपोर्ट के अनुसार, अधिक गेमिंग दिमाग के "रिवार्ड सिस्टम" को प्रभावित करती है। गेम जीतने, लेवल अप करने और वर्चुअल रिवॉर्ड मिलने से दिमाग में डोपामिन रिलीज होता है, जो कुछ देर के लिए आनंद देता है। लेकिन यही आनंद धीरे-धीरे दिमाग में इसकी आदत डाल देता है।

जब परिवार की ओर से गेम खेलने से रोका जाता है या गेम में हार का सामना करना पड़ता है, तो चिड़चिड़ापन, गुस्सा और डिप्रेशन, एनजाइटी जैसी समस्याएं बढ़ सकती हैं। कुछ मामलों में देखा गया है कि पेरेंट्स द्वारा मोबाइल छीने जाने या गेम खेलने से रोके जाने पर बच्चों ने खुद को नुकसान पहुंचाया, यहां तक कि आत्महत्या जैसे कदम भी उठाए।

Modern Parenting Challenges: मॉडर्न पैरेंटिंग पर क्यों उठे सवाल

मेंटल हेल्थ एक्सपर्ट्स की मानें तो यह सिर्फ गेम की ल" का मामला नहीं है, बल्कि मॉडर्न पैरेंटिंग और पारिवारिक माहौल पर भी सवाल उठाता है। आज कई माता-पिता बच्चों को चुप रखने या व्यस्त रखने के लिए उन्हें ऑउटडोर गेम या अन्य एक्टिविटि की जगह नन्हे हाथों में मोबाइल थमा देते हैं। लेकिन उनके डिजिटल बिहेवियर पर नजर नहीं रखते। पारिवारिक बातचीत, समय और समझ की कमी बच्चों को अकेलापन महसूस करा सकती है।

मनोचिकित्सकों के मुताबिक, ऑनलाइन गेम्स बच्चों की पहचान और आत्मसम्मान को जीत-हार से जोड़ देते हैं। हार या असफलता की स्थिति में बच्चे खुद को 'फेल' मानने लगते हैं, जिससे आत्मग्लानि और अवसाद बढ़ता है।

इसका समाधान क्या हो सकता है?

विशेषज्ञ मानते हैं कि डिजिटल दुनिया को पूरी तरह से बंद करना संभव नहीं है, लेकिन इस पर संतुलन जरूरी है। बच्चों के लिए स्क्रीन टाइम की सीमा तय करना, उनसे खुलकर बात करना और उनके मानसिक हालात को समझना बेहद जरूरी है। साथ ही स्कूलों, समाज और सरकार को मिलकर ऑफलाइन गतिविधियों, खेल और सुरक्षित डिजिटल स्पेस को बढ़ावा देना होगा।

गाजियाबाद की यह घटना कई सवाल खड़े करती है। क्या समाज और माता-पिता इस खतरे को गंभीरता से लेंगे, या अगली खबर फिर किसी दर्दनाक त्रासदी की होगी?

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