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कोरोना मरीजों के लिए कितनी ऑक्सीजन जरूरी है ? क्या ऑक्सीजन कंसंट्रेटर पर्याप्त है ?

नई दिल्ली, 3 मई: मास्क कोरोना वायरस से बचाता है। वैक्सीन कोविड बीमारी की गंभीरता से सुरक्षित करती है। मेडिकल ऑक्सीजन मरीजों को शरीर के अंदर कोविड के खिलाफ जंग लड़ने में मदद करके जीवनदान देती है। इसका उत्पादन औद्योगिक ऑक्सीजन को 93 फीसदी तक शुद्ध करके किया जाता है और जो मरीज प्राकृतिक तौर पर खुद से ऑक्सीजन ले पाने में असमर्थ होने लगते हैं, उन्हें यह कृत्रिम रूप से दिया जाता है। कोविड के गंभीर मरीज आज देशभर में इसी गंभीर संकट का सामना कर रहे हैं। किस मरीज को प्रति मिनट या प्रति घंटे कितनी मेडिकल ऑक्सीजन की जरूरत है, यह उस रोगी की बीमारी की गंभीरता से तय होती है। औसतन कोविड-19 के 10 फीसदी से भी कम मरीजों को ही मेडिकल ऑक्सीजन सपोर्ट की आवश्यकता पड़ती है। इनमें से भी कुछ मरीजों का मर्ज ज्यादा गंभीर होता है, तो उन्हें हाई फ्लो नेजल कैनुला (एचएफएनसी) की दरकार होती है, जिसकी व्यवस्था आमतौर पर अस्पतालों में ही हो पाती है।

कोरोना मरीजों को मेडिकल ऑक्सीजन की जरूरत क्यों पड़ती है?

कोरोना मरीजों को मेडिकल ऑक्सीजन की जरूरत क्यों पड़ती है?

औसतन एक सामान्य स्वस्थ व्यस्क इंसान आराम करने की अवस्था में प्रति मिनट 7 से 8 लीटर हवा सांस के तौर पर अंदर लेता और वापस छोड़ देता है। इस तरह से 24 घंटे में उसे 11,000 लीटर हवा की जरूरत होती है। वातावरण से हम सांस के रूप में जो हवा अंदर लेते हैं उसमें प्राकृतिक तौर पर 21 फीसदी मात्रा ऑक्सीजन की होती है और हम फिर उसमें से 15 फीसदी ऑक्सीन सांस के साथ ही बाहर भी छोड़ देते हैं। यानी स्वस्थ व्यस्क का फेफड़ा 6 फीसदी ऑक्सीजन को अपने अंदर सोख लेता लेता है। अगर इसमें कमी होगी तो बाहर से ऑक्सीजन देने की नौबत आ जाएगी। कोरोना यही करता है कि वह फेफड़ों के खुद से ऑक्सीजन को अवशोषित करने की क्षमता को कम कर देता है।

किन कोरोना मरीजों को मेडिकल ऑक्सीजन देना जरूरी है?

किन कोरोना मरीजों को मेडिकल ऑक्सीजन देना जरूरी है?

कोविड-19 का इलाज करने वाले डॉक्टरों का कहना है कि जब ऑक्सीजन का लेवल 90 फीसदी से भी कम हो जाए तो मेडिकल ऑक्सीजन देने की आवश्यकता होती है। ऑक्सीजन लेवल चेक करने के लिए वो 6 मिनट चलने की भी सलाह देते हैं। कोरोना मरीज को 6 मिनट वॉक करके ऑक्सीजन लेवल जांचना चाहिए। पहले वॉक शुरू करने से पहले जांचें और फिर 6 मिनट चलने के बाद ऑक्सीमीटर से दोबारा जांच करें। अगर ऑक्सीजन लेवल बढ़ने की बजाए घटता है और वह भी 3 फीसदी से ज्यादा हो तो इसे चेतावनी समझनी चाहिए। यही नहीं अगर मरीज के लिए 6 मिनट चलना भी मुश्किल हो और वह सांस की कमी महसूस करने लगे तो समझ लीजिए कि उसके शरीर में ऑक्सीजन की कमी हो रही है। अब उसे डॉक्टर की देखरेख में मेडिकल ऑक्सीजन सपोर्ट देने की जरूरत है।

कोविड मरीज को कितनी ऑक्सीजन की जरूरत पड़ती है?

कोविड मरीज को कितनी ऑक्सीजन की जरूरत पड़ती है?

किस मरीज को कितनी ऑक्सीजन चाहिए, यह उसकी बीमारी की गंभीरता पर निर्भर है। किसी को प्रति मिनट एक से दो लीटर मेडिकल ऑक्सीजन सपोर्ट की जरूरत होती है। लेकिन, ऑक्सीजन सप्लाई में होने वाली बर्बादी और फेफड़े की क्षमता पर निर्भर करता है कि ऐसे मरीजों पर भी तीन से चार लीटर प्रति मिनट ऑक्सीजन की खपत हो सकती है। लेकिन, कुछ मरीजों को ऑक्सीजन सिलेंडर से भी काम नहीं चलता और उन्हें हाई फ्लो नेजल कैनुला (एचएफएनसी) की सपोर्ट की जरूरत पड़ सकती है। उसकी ऑक्सीजन जरूरत 60 लीटर प्रति मिनट या 3,600 लीटर प्रति घंटे तक हो सकती है। डॉक्टरों का कहना है कि कुछ मामलों में एक दिन में एक मरीज पर 86,000 लीटर तक मेडिकल ऑक्सीजन की आवश्यकता हो सकती है।

क्या ऑक्सीजन कंसंट्रेटर पर्याप्त है ?

क्या ऑक्सीजन कंसंट्रेटर पर्याप्त है ?

जिन मरीजों को हाई फ्लो नेजल कैनुला (एचएफएनसी) की दरकार है, उन्हें एक सामान्य ऑक्सीजन सिलेंडर का सपोर्ट दिया जाए तो यह मुश्किल से 4 घंटे तक काम कर सकता है। यही वजह है कि ऑक्सीजन सिलेंडरों और अस्पतालों में ऑक्सीजन बेड को लेकर इतना त्राहिमाम मचा हुआ है। ऐसी स्थिति में ही ऑक्सीजन कंसंट्रेटर की मांग अप्रत्याशित रूप से बढ़ गई है। इसकी किल्लत और कालाबाजारी की खबरें भी आ रही हैं। इस मशीन की खासियत ये है कि यह वातावरण में मौजूद ऑक्सीजन को शुद्ध करके कैनुला के जरिए मरीजों को दी जा सकती है। मतलब, इसका इस्तेमाल होम आइसोलेशन में रह रहे कोरोना मरीज भी आसानी से कर सकते हैं। लेकिन,डॉक्टरों का कहना है कि यह उन्हीं मरीजों के लिए कारगर है, जिन्हें हर मिनट दो से तीन लीटर मेडिकल ऑक्सीजन की ही जरूरत पड़ती है। अगर, इसके बाद भी सांस में कमी रहती है तो उसे अस्पताल में ही भर्ती कराना चाहिए। डॉक्टर ये भी कहते हैं कि जिन मरीजों को ज्यादा ऑक्सीजन चाहिए, उनमें ऑक्सीजन लेवल के अलावा कई और पैरामीटर भी देखने पड़ते हैं, इसीलिए ऐसे लोगों को अस्पतालों में भर्ती करवाना जरूरी है।

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