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कश्मीरी केसर को जीआई टैगिंग से कितना फ़ायदा हुआ?

कश्मीरी केसर
Majid Jahangir
कश्मीरी केसर

जम्मू कश्मीर में बीते दो दशक के दौरान केसर के उत्पादन में लगातार हो रही गिरावट ने यह संकट पैदा कर दिया था कि आने वाले दिनों में 'कश्मीर का सोना' कहलाने वाला केसर लुप्त ही ना हो जाए.

इस चिंता के चलते ही दो साल पहले यानी 2020 में जम्मू-कश्मीर के कृषि विभाग ने इंडिया इंटरनेशनल कश्मीर सैफ्रान ट्रेडिंग सेटर (आईआईकेएसटीसी) की शुरुआत की.

इसका उद्देश्य केसर किसानों को प्रोत्साहित करना और उन्हें बेहतर क़ीमत दिलाना था.

इस मुहिम का कितना असर हुआ है, क्या केसर की खेती में इसके चलते कोई बदलाव देखने को मिला है?

अपने खेत से केसर के फूल लेकर कश्मीर के लेथपुरा पंपोर के रहने वाले हिलाल अहमद पहली बार जीआई टैगिंग के लिए इंडिया इंटरनेशनल कश्मीर सैफ्रान ट्रेडिंग सेंटर (आईआईकेएसटीसी) आए हैं.

इन्हें बेहतरी की उम्मीद भी है, लेकिन हल्का सा डर भी है. उम्मीद इसलिए है कि उन्हें अच्छे दाम मिलेंगे और डर इसलिए कि कहीं उनके केसर की गुणवत्ता को कम तो नहीं आंका जाए, जिससे कम क़ीमत भी मिल सकती है.

इस उहापोह के बावजूद हिलाल जीआई टैगिंग को अच्छा क़दम मान रहे हैं.

हिलाल बताते हैं, "सेंटर आने से पहले उन्हें एक दो किसानों ने बताया था कि सेंटर पर जमा किये जाने वाले केसर के वज़न में कमी आती है. लेकिन, इसके बाद भी मैं यहां आया हूं."

कश्मीरी केसर
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बाज़ार से दोगुनी क़ीमत

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पंपोर में केसर संगठन के अध्यक्ष अब्दुल मजीद वाणी बीते दो वर्षों से जीआई टैगिंग सेंटर पर अपना केसर जमा करा रहे हैं. वो बताते हैं कि बाज़ार की क़ीमतों से उन्हें सेंटर में दोगुनी क़ीमत मिल चुकी है.

उन्होंने बताया, "जीआई टैगिंग से न सिर्फ़ हमें पैसा ज़्यादा मिला है, बल्कि कश्मीर के केसर को एक नई पहचान भी मिल रही है. कश्मीर का केसर अब कश्मीर के नाम से बिक रहा है."

"पहले यहां का किसान बिचौलियों के ज़रिए अपनी फसल बेचते थे. अब खुद ख़रीददार को उत्पाद बेचते हैं. नाम और दाम, दोनों चीज़ें उन्हें मिलती हैं."

वह बताते हैं " बीते साल हमने क़रीब पैंसठ किलो केसर जीआई टैगिंग के लिए दिए थे."

"इस वर्ष ट्रेडिंग सेंटर पर दो सौ किलो हमने जमा कराया है. जीआई टैगिंग के बाद हमें प्रति किलो 2 लाख 40 हज़ार से 2 लाख 50 हज़ार तक क़ीमत मिल रही है."

वाणी के मुताबिक़, पहले एक किलोग्राम केसर के लिए उन्हें 80 हज़ार से एक लाख 10 हज़ार रुपये तक मिलते थे, लेकिन अब ज़्यादा पैसा मिल रहा है.

आईआईकेएसटीसी के अधिकारियों का कहना है कि जीआई टैगिंग के बाद ख़रीददार को पूरा भरोसा मिलता है कि ये असली केसर है और इस पर जीआई टैग लगा है, उन्हें इस बात का भी यक़ीन हो जाता है कि ये किसी और देश का केसर नहीं है.

वाणी बताते हैं कि अभी जीआई टैगिंग के साथ कम ही किसान जुड़े हैं. उन्होंने बताया, "अभी लोगों में ज़्यादा जागरूकता नहीं है. अभी आधे ही किसान जुड़े हैं. किसानों को आहिस्ता-आहिस्ता इस बारे में मालूम हो रहा है. पहले साल किसानों के मन में ये बात था कि पता नहीं उन्हें पैसा किस रूप में मिलेगा. पैसे के लिए भागना तो नहीं पड़ेगा. कैसे क्या करना है. लेकिन ये बातें अब स्पष्ट हैं."

दरअसल जीआई टैगिंग ने कश्मीरी केसर को पहचान दी है और उसकी पहचान को सुनिश्चित भी किया है. इससे पहले बाज़ार में कश्मीर के नाम पर दूसरे देश का केसर बेचा जाता था और ये मुश्किल काम था कि असली और नक़ली को परखा जा सकता.

हालांकि कश्मीर के सैकड़ों किसानों को अभी भी जीआई टैगिंग के बारे में मालूम नहीं है. पंपोर के केसर के खेत में केसर के फूल तोड़ते अज़ान मुश्ताक़ रेशी ने बताया कि उन्हें जीआई टैगिंग के बारे में कोई जानकारी नहीं है.

वज़न कम तौलने की शिकायत

अज़ान बताते हैं कि अगर उन्हें जीआई टैगिंग के फ़ायदों की जानकारी मिलेगी, तो वे ज़रूर सेंटर से जुड़ना चाहेंगे. आईआईकेएसटीसी के इंचार्ज तारिक़ अहमद बताते हैं कि किसानों तक जानकारी पहुंचाने की मुहिम जारी है.

एक दूसरे किसान मास्टर अब्दुल अज़ीज़ जीआई टैगिंग को बेहतर मानने के लिए तैयार नहीं हैं. अज़ीज़ कहते हैं, "ट्रेडिंग सेंटर पर फूल ले जाना एक मुश्किल काम है. ट्रेडिंग सेंटर को जितने केसर की एक साल ज़रूरत रहती है, उसे अधिक वो लेते नहीं हैं."

अब्दुल अज़ीज़ के दावे पर कृषि विभाग के निदेशक कश्मीर चौधरी इक़बाल सही नहीं मानते. उन्होंने बताया कि, 'फसल कटाई के बाद हर एक प्रोसेस सेंटर ही करता है और फूल दोबारा न लेने का इलज़ाम ग़लत है.'

एक अन्य किसान मुज़फ्फर गुल ने बताया कि बीते वर्ष उन्होंने जो फसल सेंटर को दी थी, उसकी वज़न कम हो गई थी.

सेंटर के इंचार्ज तारिक़ अहमद ने बताया कि किसानों को साइंटफ़िक तकनीक की जानकारी नहीं है, जिसकी वजह से उन्हें वज़न कम होने की बात समझ नहीं आती है.

उन्होंने बताया, "किसान जिस तरह घर में केसर के फूलों को सुखाते हैं, हम उस तरह से नहीं सुखाते हैं. हमारा तरीक़ा कुछ अलग है. किसानों को मॉइस्चरिंग मापने के साइंटिफ़िक तरीक़े के बारे में जानकारी नहीं है."

आईआईकेएसटीसी के अधिकारियों का दावा है कि अब तक क़रीब दस हज़ार किसानों ने पंजीयन कराया है.

कश्मीरी केसर
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कश्मीरी केसर की पहचान से ख़तरा टला

पंपोर में केसर उत्पादक संगठन के अध्यक्ष अब्दुल मजीद वाणी बीते दो वर्षों से जीआई टैगिंग सेंटर पर अपना केसर जमा करा रहे हैं. वो बताते हैं कि बाज़ार की क़ीमत से उन्हें सेंटर में दोगुनी क़ीमत मिल चुकी है.

उन्होंने बताया, "जीआई टैगिंग से न सिर्फ़ हमें पैसा ज़्यादा मिला है, बल्कि कश्मीर के केसर को एक नई पहचान भी मिल रही है. कश्मीर का केसर अब कश्मीर के नाम से बिक रहा है. पहले यहां का किसान बिचौलियों के ज़रिए अपनी फसल बेचते थे. अब खुद ख़रीददार को उत्पाद बेचते हैं. नाम और दाम, दोनों चीज़ें उन्हें मिलती हैं."

वह बताते हैं, "बीते साल हमने क़रीब 65 किलो केसर जीआई टैगिंग के लिए दिए थे. इस वर्ष ट्रेडिंग सेंटर पर 200 किलो हमने जमा कराया है. जीआई टैगिंग के बाद हमें 2.4 लाख रुपये से 2.50 लाख रुपये तक प्रति किलो क़ीमत मिल रही है."

वाणी के मुताबिक़, पहले एक किलोग्राम केसर के लिए उन्हें 80 हज़ार से 1.10 लाख रुपये तक मिलते थे, लेकिन अब ज़्यादा पैसा मिल रहा है.

कश्मीरी केसर
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जीआई टैगिंग

आईआईकेएसटीसी के अधिकारियों का कहना है कि जीआई टैगिंग के बाद ख़रीददार को पूरा भरोसा मिलता है कि ये असली केसर है और इस पर जीआई टैग लगा है, उन्हें इस बात का भी यक़ीन हो जाता है कि ये किसी और देश का केसर नहीं है.

वाणी बताते हैं कि अभी जीआई टैगिंग के साथ कम ही किसान जुड़े हैं. उन्होंने बताया, "अभी लोगों में ज़्यादा जागरूकता नहीं है. अभी आधे ही किसान जुड़े हैं. किसानों को आहिस्ता-आहिस्ता इस बारे में मालूम हो रहा है. पहले साल किसानों के मन में ये बात था कि पता नहीं उन्हें पैसा किस रूप में मिलेगा. पैसे के लिए भागना तो नहीं पड़ेगा. कैसे क्या करना है. लेकिन ये बातें अब स्पष्ट हैं."

दरअसल जीआई टैगिंग ने कश्मीरी केसर को पहचान दी है और उसकी पहचान को सुनिश्चित भी किया है. इससे पहले बाज़ार में कश्मीर के नाम पर दूसरे देश का केसर बेचा जाता था और ये मुश्किल काम था कि असली और नक़ली को परखा जा सकता.

हालांकि कश्मीर के सैकड़ों किसानों को अभी भी जीआई टैगिंग के बारे में मालूम नहीं है. पंपोर के केसर के खेत में केसर के फूल तोड़ते अज़ान मुश्ताक़ रेशी ने बताया कि उन्हें जीआई टैगिंग के बारे में कोई जानकारी नहीं है.

केसर उत्पादक
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केसर उत्पादक

कश्मीर चैम्बर ऑफ़ कॉमर्स एंड इंडस्ट्रीज (केसीसीआई) के अध्यक्ष शेख आशिक़ हुस्सियन ने बीबीसी को बताया कि केसर की जीआई टैगिंग से कश्मीरी केसर की पहचान ख़तरे में पड़ने से बच गई.

उन्होंने बताया, "जीआई टैगिंग से क़ीमत अच्छी मिल रही है. अंतराष्ट्रीय बाज़ार में भी क़ीमत बढ़ जाती है. जीआई टैगिंग के बाद केसर की क़ीमतें बढ़ चुकी हैं.अब इस में नक़ली केसर बेचने की गुंजाइश बाक़ी नहीं रही. सबसे बड़ी बात ये हुई कि किसी दूसरे देश का आप अब मार्केट में कश्मीर के नाम पर बेच नहीं सकते. जीआई टैग के बाद अब ये मुमकिन नहीं."

जम्मू कश्मीर के कृषि विभाग के निदेशक चौधरी इक़बाल का कहना है कि जीआई टैगिंग के बाद अब ईरान के केसर को कश्मीर के केसर के नाम पर बेचना मुमकिन नहीं है.

बीते वर्षों में कश्मीर के केसर किसानों ने बार -बार ये आवाज़ उठाई थी कि ईरान के केसर को सस्ते दामों पर कश्मीर में और कश्मीर से बाहर भी कश्मीर के केसर के नाम पर बेचा जाता है.

आईआईकेएसटीसी के साथ रजिस्टर्ड एक किसान इरफ़ान रशीद ने बताया कि जीआई टैगिंग में जो सबसे अच्छी बात ई-ऑक्शनिंग है. किसान को ये हक़ हासिल है कि वो पोर्टल पर अपने प्रोडक्ट को बेचे या सेंटर के पास ही रखे.

कश्मीरी केसर
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असली केसर की पहचान

जीआई टैगिंग होने के बाद प्रोडक्ट को पोर्टल पर ई-ऑक्शन करके पंजीकृत ख़रीददारों को ख़रीदने के लिए पेश किया जाता है.

किसान को अगर पोर्टल पर दाम मुनासिब लगे तो वो बेच सकता है, वरना अच्छे दामों के लिए किसान इंतज़ार कर सकता है.

सेंटर के अधिकारियों ने बताया कि पोर्टल के साथ पूरे भारत में अभी तक 300 ख़रीददार रजिस्टर्ड हो चुके हैं.

किसानों को सेंटर के पास केसर के कच्चे फूल जमा कराने पड़ते हैं और जिसके बाद सेंटर खुद प्रोडक्ट को अंतिम रूप से तैयार करता है.

केसर को (आईआईकेएसटीसी में) जब बोतल में पैक किया जाता है तो बोतल पर एक 3-D होलोग्राम लगाया जाता है.

सेंटर के अधिकारियों ने बताया कि बोतल पर जो लेबल लगाया जाता है उनका नक़ल तो बनाया जा सकता है, लेकिन असली लेबल पर सेंटर का एलॉट नंबर दर्ज होता है.

वैसे एक आम ख़रीददार के लिए असली और नकली केसर की पहचान हमेशा एक मसला रहा है.

लेथपुरा के केसर किसान और दुकानदार मुज़फ्फर गुल ने बताया, "केसर को पानी के गिलास में डालकर देखना होता है. अगर केसर असली ही तो वो आहिस्ता -आहिस्ता रंग देना शुरू करता है. और जो नकली होगा वो एकदम रंग देना शुरू करेगा."

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केसर किसानों की समस्याएं और भी हैं

पंपोर में कई किसानों ने उनके केसर के खेतों में पानी की समस्या का ज़िक्र किया और बताया कि खेतों में पानी के लिए दस वर्ष पहले जो पाइप और ट्यूबवेल लगाए गए थे, वे अब ठीक से काम नहीं करते.

सरकार ने 2010 में पंपोर में "सैफ्रान मिशन" का एक प्रोजेक्ट शुरू किया था.

उस प्रोजेक्ट में केसर के खेतों तक पानी पहुंचाने का वादा भी शामिल था. किसानों का कहना है कि वो प्रोजेक्ट बिलकुल नाकाम हो चुका है.

लेकिन कृषि विभाग के निदेशक चौधरी इक़बाल कहते हैं कि उनके विभाग ने तो अपनी तरफ से पूरी ज़िम्मेदारी निभाई और किसानों की पाइप चोरी की वजह से ये योजना कामयाब नहीं हो पायी.

वैसे केसर किसान इरफ़ान रशीद को उम्मीद है कि आने वाले दिनों में केसर का उत्पादन बढ़ेगा.

लेकिन वे ये भी कहते हैं कि ये सरकार की वजह से नहीं, बल्कि किसानों की वजह से संभव हो पाएगा.

हालांकि जीआई टैगिंग सिर्फ़ केसर की क्वालिटी को बेहतर बनाने के लिए शुरू किया गया है, इसका उद्देश्य फसल की पैदावार बढ़ानी नहीं है.

2010 के डाटा के मुताबिक़, जम्मू कश्मीर में 3,715 हेक्टर ज़मीन पर केसर की फसल उगाई जाती है .

जम्मू क्षेत्र के किश्तवार में 50 हेक्टेयर और कश्मीर में 3,665 हेक्टेयर ज़मीन पर केसर उगाया जाता है.

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केसर की इंडोर खेती

कश्मीर का पंपोर इलाका केसर का सबसे बड़ा प्रोडूसर माना जाता है. लेकिन कश्मीर के दूसरे ज़िलों ने भी अब केसर उगना शुरू किया गया है.

कृषि विभाग के निदेशक के मुताबिक बारामुला और कुपवाड़ा में भी केसर उगाने का कामयाब प्रयोग किया गया है.

इतना ही नहीं कुछ किसानों ने केसर की इंडोर खेती भी शुरू की है. पिछले एक साल से ये प्रयोग देखने को मिल रहा है.

पंपोर में केसर संगठन के अध्यक्ष अब्दुल मजीद वाणी खुद इंडोर खेती कर रहे हैं.

उन्होंने कहा, "जिनके पास खेती के लिए ज़मीन नहीं हो, वो भी इसे कर सकता है.

इसके लिए तीन महीने तक प्लास्टिक के पॉट्स में केसर के बीज रखे जाते हैं. लेकिन ध्यान रहे उस फूल को फिर ज़मीन में लगाना होता है."

केसर की एक फसल को तैयार होने में छह से सात महीने का वक्त लगता है.

इस लिहाज से देखें तो कम से कम तीन चार महीने के लिए खेती के लिए ज़मीन की ज़रूरत इंडोर खेती में भी बनी रहेगी.

लेकिन जिनके पास ज़मीन है, वो इंडोर के रास्ते उत्पादन ज़रूर बढ़ा सकते हैं. इंडोर और ज़मीन की मदद से वे ज़मीन पर चार बार फसल उगा सकते हैं, लेकिन अभी ये प्रयोग शुरुआती दौर में ही है.

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