कैसे लड़कियों की शादी की उम्र बढ़ाने वाले बिल से विपक्ष को चित करना चाहती है मोदी सरकार ? जानिए
नई दिल्ली, 22 दिसंबर: मोदी सरकार ने जिस अंदाज में संसद के दोनों सदनों से आधार-वोटर कार्ड लिंक कराने वाला बिल पास कराया, उतना उतावलापन लड़कियों की शादी की उम्र बढ़ाने वाले कानून के लिए नहीं दिखाया है। इसके पीछे भाजपा सरकार के पूरे सियासी गणित को समझा जा सकता है। शायद सरकार इस मसले को अभी और गरम होने देना चाहती है। इसलिए उसने फिलहाल इसे संसद की स्थाई समिति में भेजकर अधिकतर विपक्ष की बात मान ली है। अगर इस मुद्दे को सामाजिक-आर्थिक और स्वास्थ्य के दायरे से बाहर निकलकर समझने की कोशिश करें तो अंदाजा लग सकता है कि विधेयक को जल्द पास ना कराना भी सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी सरकार की एक रणनीति का हिस्सा लग रहा है।

शादी की उम्र बढ़ाने वाला बिल स्थाई समिति में भेजने में रणनीति!
जिस प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने विपक्ष के भारी विरोध के बावजूद वोटर आई कार्ड को आधार से लिंक करने वाला विधेयक दोनों सदनों से आसानी से पास करा लिया, उसने लड़कियों की शादी की आयु 18 से 21 साल करने वाले बिल को संसद की स्थाई समिति में आसानी से भेज दिया! विपक्ष को लग रहा होगा कि यह उसके दबाव का असर है। लेकिन, राजनीति के धुरंधर भाजपा सरकार का नेतृत्व लगता है कि इसके जरिए अपना एक बड़ा सियासी हित साधने की ताक में लग चुका है। सरकार इसे फिर से बजट सत्र में संसद में ला सकती है, लेकिन उसने आने वाले पांच विधानसभा चुनावों के लिए अपनी ओर से इसके जरिए संदेश देने की कोशिश की है। वह चाहती तो इसे भी साथ के साथ शीतकालीन सत्र में ही निपटना सकती थी, लेकिन वह बिना किसी दबाव के इसे स्थाई समिति में मंथन के लिए भेजने को तैयार हुई है।

पीएम मोदी का इस बिल को लेकर इशारा समझिए!
बीजेपी सरकार लड़कियों की शादी की उम्र बढ़ाने के मामले को अभी सियासी तौर पर और पकने देना चाहती है। क्योंकि, पीएम मोदी ने मंगलवार को लगभग सदन से इसे स्थाई समिति में भेजने के समय ही, उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में सरकारी योजनाओं की हजारों महिला लाभार्थियों के बीच में यह कहकर कि 'हर कोई देख सकता है कि इससे (लड़कियों की शादी की उम्र 21 करने के बिल से) किसको समस्या है?' उन्होंने बिना किसी दल या समूह का नाम लिए बहुत बड़े महिला वोट बैंक को इस मुद्दे पर साधने की शुरुआत कर दी है। क्योंकि, कुछ सर्वे आए हैं, जिसमें आम महिलाओं में इसको समर्थन मिल रहा है। पीएम मोदी ने भले ही इशारों में बात की हो, लेकिन तीन-चार दिन पहले ही उनके कैबिनेट के सहयोगी मुख्तार अब्बास नकवी ने इस विधेयक की आलोचना करने वालों को 'तालिबानी मानसिकता वाले पेशेवर प्रदर्शनकारी' कहकर संबोधित किया था। उन्होंने यहां तक बताया कि कैसे उन्हीं लोगों ने तीन तलाक खत्म करने का भी विरोध किया था।

शादी की उम्र बढ़ाने पर विपक्ष की दलील
इस मामले में विपक्ष को दोधारी तलवार का सामना करना पड़ रहा है। इसलिए कांग्रेस और उसकी कुछ सहयोगी जैसे कि वामपंथी दल, डीएमके और एनसीपी इसकी सिरे से आलोचना करने को लेकर बहुत ही सतर्क हैं। वह सामाजिक-लैंगिक असमानता का मुद्दा उठाकर इसपर तमाम स्टेकहोल्डर्स से चर्चा कराने की बात कह रही हैं। सोनिया गांधी की बेटी प्रियंका गांधी वाड्रा तो यहां तक दावा कर रही हैं कि उन्होंने महिला सशक्तिकरण पर जो जोर दिया है, इसी वजह से मोदी सरकार यह बिल लाने को मजबूर हुई है। इसलिए, बीजेपी सरकार इस मसले पर अभी विपक्ष और विरोधियों को और समय देना चाहती है।
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मुस्लिम नेताओं का तर्क
भाजपा के लिए उत्तर प्रदेश विधानसभा का चुनाव बहुत महत्वपूर्ण है और पीएम मोदी ने जो कुछ कहा है, वह समाजवादी पार्टी के कम से कम दो मुस्लिम सांसदों की ओर से इस विधेयक का विरोध करने के बाद कहा है। सपा के ये सांसद हैं- शफीकुर्रहमान बर्क और एसटी हसन। इनकी दलील है कि 'महिलाओं को इतनी ज्यादा आजादी' क्यों देना? उन्होंने लड़कियों की शादी की उम्र बढ़ाने पर सवाल उठाया है। बीजेपी का पहला निशाना तो यहीं पर लगा है कि सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव ने अपनी पार्टी को 'प्रगतिशील पार्टी' बताकर अपने सांसदों के नजरिए से खुद को दूर कर लिया है और उनके बयानों को उनका 'निजी बयान' बताया है। कांग्रेस की सहयोगी मुस्लिम लीग इसे मुस्लिम पर्सनल लॉ का अपमान बता रही है तो एआईएमआईएम चीफ असदुद्दीन ओवैसी जोरदार तरीके से इसका विरोध कर रहे हैं।
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मुस्लिम समूहों का विरोध
जाहिर है कि अगर लड़कियों की शादी की उम्र 18 साल से 21 साल की गई तो इसका आधार पूरी तरह से 'धर्मनिरपेक्ष' होना है। यानी यह भारत की बेटियों के लिए कानून बन रहा है, जिसमें 'सभी धर्म की लड़कियों के लिए एक मापदंड' होगा। लेकिन, ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने कहा है कि केंद्र सरकार को शादी की उम्र तय करने से बचना चाहिए और इसे एक व्यस्क नागरिक की निजी आजादी में दखलअंदाजी करार दिया है। बोर्ड ने कहा कि सरकार को ऐसे 'बेकार' और हानिकारक कानून' बनाने से बचना चाहिए। बीजेपी शायद यही आकलन कर चाहती है कि मुसलमानों में यह विरोध किस कदर मुखर होता है? क्योंकि, विपक्ष को चित करने के लिए उसके लिए यह बड़ा हथियार साबित हो सकता है! जहां तक इसे संसद से मुहर लगवाने का सवाल है तो फिलहाल इसमें उसे कोई परेशानी नजर नहीं आ रही है। (अंतिम तस्वीर-फाइल)












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