गवर्नर की नियुक्ति कैसे होती है, इनकी भूमिका अक्सर विवादों में क्यों रहती है ?
राज्यों में गवर्नर का पद ऐसा होता है, जो एक संवैधानिक पद है, लेकिन इसपर नियुक्ति पूरी तरह से राजनीतिक होती है। जबतक केंद्र सरकार की इच्छा है, तभी तक एक व्यक्ति इस पद पर रह सकता है।

केंद्र सरकार ने 6 राज्यों में नए राज्यपालों की नियुक्ति की है और 6 गवर्नरों के राजभवन बदल दिए गए हैं। लद्दाख में भी नए लेफ्टिनेंट गवर्नर की नियुक्ति की गई है। कुछ राज्यों के राज्यपाल के बदलने की चर्चाएं काफी पहले से चल रही थीं। कुछ प्रदेशों में राजभवन पिछले कुछ समय से बड़े राजनीतिक विवाद की वजह बने हुए थे, जिनमें से महाराष्ट्र के राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी भी शामिल हैं, जो सार्वजनिक तौर पर इस पद को छोड़ने की इच्छा जता चुके थे और अब आखिरकार उन्होंने इस्तीफा दे दिया है। छत्तीसगढ़ के मौजूदा राज्यपाल रमेश बैस को सीधे रायपुर से मायानगरी मुंबई तबादला कर दिया गया है।

राज्यों में केंद्र के प्रतिनिधि होते हैं राज्यपाल
आमतौर पर गवर्नर या राज्यपाल का पद केंद्र और राज्य सरकारों के बीच में एक पुल की तरह होता है। या यह भी कह सकते हैं कि राज्यपाल राज्यों में अपने संवैधानिक जिम्मेदारियों को निपटाने के साथ-साथ केंद्र सरकार के प्रतिनिधि के तौर पर कार्य करते हैं। लेकिन, पिछले कुछ समय में राजभवन की भूमिका अक्सर विवादों में रही है। खासकर जब केंद्र और राज्यों में अलग विचारधाराओं वाली सरकारें रहती हैं तो गवर्नर का पद अक्सर विवादों में आ जाता है या संबंधित राज्य सरकारें राज्यपालों को मोहरा बनाकर राजनीति करती दिखाई देती हैं। या कई बार केंद्र सरकार पर भी आरोप लगते हैं कि वह राजभवनों के माध्यम से प्रदेश की सरकारों के कामकाज में दखल देने की कोशिश करती है। अभी हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राज्यसभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव के जवाब के दौरान कहा है कि सिर्फ पूर्व पीएम इंदिरा गांधी की सरकार के दौरान 50 बार राज्यों में आर्टिकल-356 का इस्तेमाल किया गया। केंद्र द्वारा राजभवनों के दुरुपयोग का यह बहुत बड़ा उदाहरण माना जा सकता है।

6 राज्यों में नए राज्यपालों की नियुक्ति
राज्यपाल का पद एक बार फिर से सुर्खियों में इसलिए आया है कि रविवार को यानि 12 फरवरी, 2023 को केंद्र सरकार द्वारा 12 राज्यों में नए राज्यपालों को नियुक्त की गई है। इनमें से कुछ नए नाम हैं, जबकि कुछ को एक राजभवन से दूसरे राजभवन में ट्रांसफर किया गया है। इसके साथ ही केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख को भी नए उपराज्यपाल मिले हैं। राष्ट्रपति भवन की ओर से जारी प्रेस रिलीज के मुताबिक राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने लेफ्टिनेंट जनरल (रिटायर्ड) केटी परनायक को अरुणाचल प्रदेश, लक्ष्मण प्रसाद आचार्य को सिक्किम, सीपी राधाकृष्णन को झारखंड, शिव प्रताप शुक्ला को हिमाचल प्रदेश, गुलाब चंद कटारिया को असम और जस्टिस (रिटायर्ड) एस अब्दुल नजीर को आंध्र प्रदेश का नया गवर्नर नियुक्त किया है। (एस अब्दुल नजीर की तस्वीर सौजन्य विकिपीडिया)

6 गवर्नरों का तबादला
जिन राज्यपालों का ट्रांसफर किया गया है, उनमें आंध्र प्रदेश के गवर्नर बिस्व भूषण हरिचंदन को छत्तीसगढ़,छत्तीसगढ़ की गवर्नर अनुसुइया उइके को मणिपुर, मणिपुर के गवर्नर ला. गणेशन को नागालैंड, बिहार के राज्यपाल फागु चौहान को मेघालय, हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ आर्लेकर को बिहार, झारखंड के राज्यपाल रमेश बैस को महाराष्ट्र का गवर्नर नियुक्त किया गया है। जबकि, अरुणाचल प्रदेश के राज्यपाल ब्रिगेडियर (रिटायर्ड) बीडी मिश्रा को लद्दाख का लेफ्टिनेंट गवर्नर नियुक्त किया गया है।

गवर्नर की नियुक्ति कैसे होती है ?
संविधान के आर्टिकल 153 के मुताबिक, 'प्रत्येक राज्य के लिए एक राज्यपाल होगा।' 1956 में संविधान में संशोधन करके यह व्यवस्था बनाई गई कि एक ही व्यक्ति को दो या दो से ज्यादा राज्यों का राज्यपाल नियुक्त किया जा सकता है। संविधान के आर्टिकल 155 के अनुसार, 'गवर्नर की नियुक्ति राष्ट्रपति वारंट जारी करके अपने हस्ताक्षर और मुहर द्वारा करेगा।' वहीं, आर्टिकल 156 कहता है कि 'गवर्नर राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत पद पर रहेगा।' लेकिन, राज्यपाल का सामान्य कार्यकाल 5 वर्षों का होगा। यदि राष्ट्रपति 5 साल से पहले ही चाहता है तो राज्यपाल को अपना पद छोड़ना पड़ता है। लेकिन, क्योंकि राष्ट्रपति केंद्रीय मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह से कार्य करता है, इसलिए राज्यपालों की नियुक्ति, उसे हटाने या फिर ट्रांसफर का कार्य प्रभावी तौर पर केंद्र सरकार ही करती है।

राज्यपालके लिए योग्यता क्या है ?
संविधान के आर्टिकल 157 और 158 में राज्यपाल की योग्यता और शर्तों के बारे में बताया गया है। इसके तहत गवर्नर को भारत का नागरिक होना चाहिए और कम से कम 35 साल की आयु होनी आवश्यक है। ना ही वह दिवालिया हो या ना ही मानसिक तौर पर बीमार व्यक्ति हो। राज्यपाल को संसद या प्रदेश विधायिका के किसी सदन का भी सदस्य नहीं होना चाहिए और ना ही उसे लाभ के किसी पद पर होना चाहिए।
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राज्यपालों की भूमिका अक्सर विवादों में क्यों रहती है ?
मौजूदा समय में देश के कई राज्यों में राज्यपालों/उपराज्यपालों और प्रदेश/केंद्र शासित प्रदेशों की सरकारों के बीच तकरार और तनाव की स्थिति देखने को मिली हैं। इसमें महाराष्ट्र, केरल, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, झारखंड, छत्तीसगढ़, राजस्थान और दिल्ली जैसे राज्य शामिल हैं। इन राज्यों में जहां कई बार राज्य सरकारों ने केंद्र के इशारे पर राज्यपालों पर राजनीति करने और प्रदेश के शासन में दखल देने के आरोप लगाए हैं तो दूसरी तरफ राज्य सरकार पर संवैधानिक व्यवस्था की धज्जिया उड़ाने के आरोप लगे हैं। दो-ढाई दशक पहले तक जब केंद्र और ज्यातर राज्यों में एक पार्टी की सरकारें होती थीं, जो इस तरह के विवाद के मौके कम ही देखने को मिलते थे। इसलिए पहले की तरह आर्टिकल-356 का इस्तेमाल अब दुर्लभ हो चुका है और अदालतें भी इसको लेकर अब सजग हो चुकी हैं।












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