हार दर हार के बावजूद बीएसपी ने कैसे बचाया अपना राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा? जानें पूरा गणित
लगातार मिल रही हार के बाद भी बीएसपी अपना नेशनल पार्टी का स्टेट्स बचाए हुए हैं। बसपा का नेशनल पार्टी का दर्जा बरकार रहने के पीछे की सबसे बड़ी वजह उसका कई राज्यों में मौजूद वोट प्रतिशत है।

चुनाव आयोग ने सोमवार को देश की सभी राष्ट्रीय स्तर और राज्य स्तर पर पार्टियों की लिस्ट जारी की है। इस लिस्ट के मुताबिक देश में अब बीजेपी, कांग्रेस, बीएसपी, माकपा, एनपीपी और आम आदमी नेशनल समेत कुल छह नेशनल पार्टियां हैं। कई दलों से नेशनल पार्टी का दर्जा वापस ले लिया गया है।
चुनाव आयोग ने ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस, शरद पवार की पार्टी एनसीपी और सीपीआई को नेशनल पार्टी की लिस्ट से बाहर कर दिया है। वहीं आम आदमी पार्टी को नेशनल पार्टी का दर्जा दिया है।

राष्ट्रीय पार्टी के मानक
इन तीनों ही पार्टियों का वोट शेयर देश भर में 6 प्रतिशत से कम हो गया है जिस वजह से इन तीनों ही पार्टियों को इस लिस्ट से बाहर का रास्ता दिखाया गया है। लेकिन लोगों के मन में सवाल उठ रहा है कि, बहुजन समाज पार्टी लगातार चुनावों में खराब प्रदर्शन कर रही है। इसके बाद भी कैसे उसका नेशनल पार्टी का दर्जा बरकरार है।
बसपा का नेशनल पार्टी का दर्जा बरकार रहने के पीछे की सबसे बड़ी वजह उसका कई राज्यों में मौजूद वोट प्रतिशत है। बता दें कि नेशनल पार्टी होने के लिए पहला मानक यह है कि किसी पार्टी को कम से कम चार राज्यों के विधानसभा चुनाव में 6 फीसदी वोट हासिल हुए हों।

उत्तर प्रदेश
इस लिहाज से बीएसपी यूपी, राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तराखंड और पंजाब में अच्छा खासा वोट शेयर रखती है। यूपी की बात करें तो बीएसपी को यूपी विधानसभा चुनाव 2022 में 1993 के बाद सबसे कम मत (वोट) मिले हैं। उसका वोट शेयर सिर्फ 13 फीसदी रह गया है।
हालांकि, 2019 लोकसभा चुनाव में वोट प्रतिशत में इजाफा नहीं हुआ लेकिन एसपी के साथ गठबंधन का फायदा मिला। 10 लोकसभा सीटें पार्टी ने जीती थीं। इस चुनाव में बीएसपी का वोट शेयर 12.5% रहा। जो 2014 के आम चुनावों में 19.77% था, लेकिन एक भी सीट नहीं जीत पाई थी।

राजस्थान
नेशनल पार्टी का दर्जा हासिल करने की दूसरी शर्त 4 राज्यों में क्षेत्रीय दल का दर्जा मिला होना चाहिए। बीएसपी यूपी के अलावा राजस्थान और पंजाब में अच्छा खासा दखल रखती है। 2018 के विधानसभा चुनावों में बीएसपी ने राजस्थान में 6 सीटों पर जीत दर्ज की थी।
राजस्थान में 2018 के चुनाव में बहुजन समाज पार्टी किंग मेकर बन कर उभरी थी। इस चुनाव में कांग्रेस पार्टी को 96 सीट पर जीत मिली थी और भारतीय जनता पार्टी को 78 सीटों पर जीत मिली थी।
कांग्रेस को बहुमत के लिए 5 विधायकों की जरूरत थी लेकिन मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने बसपा के सभी 6 विधायकों का कांग्रेस में विलय करवा लिया था। 2018 में बीएसपी का वोट प्रतिशत 4 फीसदी रहा था। जिसमें करीब 0.63 फीसदी का इजाफा हुआ था।

पंजाब
वहीं अगर पंजाब की बात करें तो बीएसपी का उस उत्तर भारत के राज्य में काफी दबदवा माना जाता है। 2022 में बीएसपी पंजाब में अकाली दल के साथ मिलकर चुनाव लड़ी थी। इस चुनाव में बीएसपी लगभग 26 वर्ष के लंबे अंतराल के बाद एक सीट के साथ खाता खोलने में सफल रही है।
बसपा एक मात्र सीट नवांशहर की जीतने में सफल रही। पूरे राज्य में बसपा के खाते में 1.83 प्रतिशत वोट आए हैं। 2017 की बात करें तो उस चुनाव में बसपा को पंजाब में 1.5% वोट मिले थे। पहले दोनों पार्टियों ने 1996 में साथ मिलकर लोकसभा का चुनाव लड़ा था। उस समय गठबंधन ने राज्य की 13 लोकसभा सीटों में से 11 पर जीता था।

उत्तराखंड
बीएसपी पहाड़ी राज्य उत्तराखंड में भी दखल रखती है। पार्टी का राज्य में क्षेत्रीय दल का दर्जा प्राप्त है। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2022 में बहुजन समाज पार्टी का प्रदर्शन यूपी की तुलना में बेहतर रहा।
यूपी में एक सीट जीतने वाली बीएसपी उत्तराखंड में दो सीटों पर जीत हासिल करने में सफल रही। बीएसपी भले ही राज्य में दो सीटें जीत गई हो, लेकिन उसके वोट शेयर में गिरावट आई थी। 2017 में बीएसपी का राज्य में वोट प्रतिशत 6.98 प्रतिशत था। जो 2022 में घटकर 4.82 के आसपास पहुंच गया।

मध्य प्रदेश
बहुजन समाज पार्टी का मध्य प्रदेश में अच्छा खासा वोट वैंक है। पार्टी लगभग हर चुनाव में अपने जमकर प्रत्याशी उतारती रही है। 2018 के विधानसभा चुनावों बसपा को 5.1 प्रतिशत वोट मिले थे। 2020 में 28 विस सीटों के उपचुनाव में बसपा का खाता नहीं खुला, लेकिन 5.75 प्रतिशत वोट मिले थे।
बसपा के प्रभाव का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि 2003, 2008 और 2013 के विस चुनावों में औसतन 69 सीट पर पार्टी का वोट शेयर 9 फीसदी से अधिक रहा था। 2008 में बसपा ने सात सीटें जीती थीं और उसने नौ प्रतिशत वोट प्राप्त किए थे।












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